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छंद साहित्‍य रत्‍न

शिक्षक दिवस पर कुछ दोहे

दोहे-

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लगते अब गुरूपूर्णिमा, बिते दिनों की बात ।
मना रहे शिक्षक दिवस, फैशन किये जमात ।

शिक्षक से जब राष्ट्रपति, हुये व्यक्ति जब देश।
तब से यह शिक्षक दिवस, मना रहा है देश ।

कैसे यह शिक्षक दिवस, यह नेताओं का खेल ।
किस शिक्षक के नाम पर, शिक्षक दिवस सुमेल ।।

शिक्षक अब ना गुरू यहां, वह तो चाकर मात्र ।
उदर पूर्ति के फेर वह, पढ़ा रहा है छात्र ।

‘बाल देवो भव‘ है लिखा, विद्यालय के द्वार ।
शिक्षक नूतन नीति के, होने लगे शिकार ।

शिक्षक छात्र न डाटिये, छात्र डाटना पाप ।
सुविधाभोगी छात्र हैं, सुविधादाता आप ।।

कौन उठाये अब यहां, कागजात के भार ।
शिक्षक करे पुकार है, कैसे हो उद्धार ।।

हुये एक शिक्षक यहां, देश के प्रेसिडेंट ।
मना रहे शिक्षक दिवस, तब से यहां स्टुडेंट ।।

सारे शिक्षक साथ में, करें व्यवस्था देख ।
आज मनाने टीचर्स डे, नेता आये एक ।।

क्षिक्षा एक व्यपार है, शिक्षक कहां सुपात्र ।
प्रायवेट के नाम पर, शिक्षक नौकर मात्र ।।
-रमेश चौहान