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गणेशजी की आरती

श्रीशमी गणेश, नवागढ़

(‘ओम जय जगदीश हरे’ के तर्ज पर)

Singer-Dileep Jaiswal
Singer-Naina Thaukur
ओम जय श्री गणराजा, स्वामी जय श्री गणराजा ।
बंधु षडानन पितु शिव, मातु हिंगुलाजा ।।
रिद्धि सिद्धि के स्वामी,  सुत शुभ अरु लाभे  ।
सकल संपदा के दाता, हमरे भाग जागे ।
मूषक वाहन साजे, कर मुद्रा धारी ।
मोदक भोग सुहाये, भगतन शुभकारी ।।
प्रथम पूज्य गणनायक, गौरी सुत प्यारे ।
विकटमेव भालचंद्र, अतिप्रिय नाम तुम्हारे ।।
वक्रतुंड धूम्रवर्ण, गजमुख इकदंता ।
गजानन श्री लंबोदर, विघ्नहरण सुखकंता ।।
विघ्न-विनाशक वर सुखदायक, ज्ञान ज्योति दाता ।
सकल कुमति के नाशक, सुमति सुख लाता ।
अष्टविनायक अति जीवंता, हिन्द भूमि राजे ।
श्रद्धा सहित पुकारत, भगतन हिय साजे ।।
तनमन करके अर्पण, श्रद्धा सहित  ध्‍यावो ।
कहत भक्‍त कवि 'रमेशा, मनवांछित फल पावो
-रमेश चौहान
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गणेश चालीसा

दोहा

प्रथम पूज्य गणराज को, प्रथम नमन कर जोर ।
जिनकी करूणामय दया, करते हमें सजोर ।।
श्रद्धा और विश्वास से, पूजे जो गणराज ।
करते वे निर्विघ्न सब, पूरन अपने काज ।।

चौपाई

हे गौरा गौरी के लाला । हे लंबोदर दीन दयाला
सबसे पहले तेरा सुमरन । करते है हम वंदन पूजन

हे प्रभु प्रतिभा विद्या दाता । भक्तों के तुम भाग्य विधाता
वेद पुराण सभी गुण गाये। तेरी महिमा भक्त सुनाये

सकल सृष्टि का करने फेरा । मात-पिता को करके डेरा
प्रदक्षिणा प्रभुवर आप किये । सकल सृष्टि को नव ज्ञान दिये

गगन पिता सम माता धरती । दिये ज्ञान प्रभु तुम इस जगती
जनक शंभु शिव प्रसन्न हो अति । बना दिये तुम को गणाधिपति

तबसे पहले पूजे जाते । हर पूजन में पहले आते
गौरी गणेश साथ विरोजे । शुभता में अरू शुभता साजे

तुमको सुमरन कर भक्त सभी । करते कारज शुरूआत जभी
सकल काम निर्विघ्न होत है । दया सिंधु की दया जोत है

वक्रतुण्ड़ हे देव गजानन । हे लंबोदर हे जग पावन
मूषक वाहन बैठ गजानन । भोग लहै मोदक मन भावन

रूप मनोहर सबको भाये । भादो महिना भवन बिठाये
जन्मोत्सव तब भक्त मनाते । जयकारा कर महिमा गाते

माँ की ममता तोहे भावे । तोहे मोदक भोग रिझावे
बाल रूप बच्चों को भाये । मंगल मूरत हृदय बिठाये

एकदन्त प्रभु कृपा कीजिये । सद्विचार सद्बुद्धि दीजिये
विकटमेव प्रभु विघ्न मिटाओ । बिगड़े सारे काज बनाओ

गौरी नंदन शिव सुत प्यारे । तुहरी महिमा जग में न्यारे
ज्ञान बुद्धि के अधिपति तुम हो । मति मति में पावन मति तुम हो

ज्ञान बुद्धि के तुम हो दाता । अज्ञानी के भाग्य विधाता
सकल वेद के लेखनकर्ता । अज्ञान तमस के तुम हर्ता

धुम्रवर्ण तेरो तन सोहे । तेरो गज मुख जग को मोहे
रिद्धी-सिद्धी के आपहिं स्वामी । है शुभ-लाभ तनय अनुगामी

रिद्धी-सिद्धी अरू शुभता पाते । कृपा तुम्हारी भक्त हर्षाते
विघ्नों के प्रभु तुम हो हर्ता । पाप कर्म के तुम संहर्ता

प्रभुवर अपनी पुनित भक्ति दें । विमल गंग सम बुद्धि शक्ति दें
मातु-पिता की सेवा कर लें । उनके सब दुख अपने सिर लें

देश भक्ति में कमतर न रहें । मातृभूमि हित हम पीर सहें
मातृभूमि के चरणकमल पर । करूँ कर्म निज प्राण हाथ धर

शक्ति दीजिये इतनी प्रभुवर । कृपा कीजिये गणपित हम पर
मानवता पथ हम सभी चलें । प्राणीमात्र से हम गले मिलें

सभी पापियों के पाप हरो। ज्ञान पुँज उनके भाल भरो
दोषी पापी नहीं पाप है । लोभ मोह का विकट श्राप है

लोभ मोह का प्रभु नाश करें । सकल सुमति प्रभु हृदय भरें
हे प्रभुवर शुभ मंगलदाता । तुहरि कृपा अमोघ विख्याता

नारद शारद महिमा गाये । गवाँर ‘रमेश’ क्या बतलाये
भूल-चूक प्रभु आप विसारें । हम सबके प्रभु भाग सवारें

दोहा

भक्त शरण जब जब गहे, सकल क्लेश मिट जात ।
किये गजानन जब कृपा, सब संभव हो जात ।।
करे मनोरथ पूर्ण सब, मंगल मूर्ति गणेश ।
चरण षरण तन मन धरे, सब विधि दीन ‘रमेश’ ।।
-रमेश चौहान
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गणेश चालीसा

दोहा

सबले पहिले होय ना, गणपति पूजा तोर ।
परथ हवं मैं पांव गा, विनती सुन ले मोर ।।
जय गणपति गणराज जय, जय गौरी के लाल ।
बाधा मेटनहार तैं, हे प्रभु दीनदयाल ।।

चौपाई

हे गौरा-गौरी के लाला । हे प्रभू तैं दीन  दयाला 
सबले पहिली तोला सुमरँव । तोरे गुण ला गा के झुमरँव 
तही बुद्धि के देवइया प्रभु । तही विघन के मेटइया प्रभु 
तोरे महिमा दुनिया गावय । तोरे जस ला वेद सुनावय
देह रूप गुणगान बखानय । तोर पॉंव मा मुड़ी नवावय
चार हाथ तो तोर सुहावय । हाथी जइसे मुड़ हा भावय
मुड़े सूंड़ मा लड्डू खाथस । लइका मन ला खूबे भाथस
सूपा जइसे कान हलावस । सबला तैं हा अपन बनावस
चाकर माथा चंदन सोहय । एक दांत हा मन ला मोहय
मुड़ी मुकुट के साज सजे हे । हीरा-मोती घात मजे हे
भारी-भरकम पेट जनाथे । हाथ जोड़ सब देव मनाथे
तोर जनम के कथा अचंभा ।अपन देह ले गढ़ जगदम्‍बा
सुघर रूप अउ देके चोला । अपन शक्ति सब देवय तोला 
कहय दुवारी पहरा देबे । कोनो आवय डंडा देबे
गौरी तोरे हे महतारी । करत रहे जेखर रखवारी
देवन आवय तोला जांचे । तोरे ले एको ना बाचे
तोर संग सब हारत जावय । आखिर मा शिव शंकर आवय
होवन लागे घोर लड़ाई । करय सबो झन तोर बड़ाई
लइका मोरे ये ना जानय । तोरे बर त्रिसूल ल तानय
तोर मुड़ी जब काटय शंकर । मॉं के जोगे क्रोध भयंकर
देख क्रोध सब धरधर कांपे । शिव शंकर के नामे जापे
उलट-पुलट सब सृष्टि करीहँव । कहय कालिका मुंड पहिरहँव
गौरी  गुस्‍सा शंकर जानय । तोला अपने लइका मानय
हाथी मुड़ी जोड़ जीयावय । मात-पिता दूनो अपनावय
नाम गजानन तोर धरावँय । पहिली पूजा देव बनावँय
मात-पिता ला सृष्टि बताये । प्रदिक्षण तैं सात लगाये
सरग ददा  अउ धरती दाई ।तुहँर गोठ सबके मनभाई
तोर नाम ले मुहरुत करथन । जीत खुशी ला ओली भरथन
बने-बने सब कारज होथे  । जम्‍मो बाधा मुड़धर रोथे
जइसन लम्बा सूंड़ ह तोरे । लम्बा कर दव सोच ल मोर
जइसन भारी पेट ह तोरे । गहरा कर दव बुद्धि ल मोरे 
गौरी दुलार भाथे तोला । ओइसने दव दुलार मोला
गुरतुर लड्डू भाये तोला । गुरतुर भाखा दे दव मोला 
हे लंबोदर किरपा करदव । मोरे कुबुद्धि झट्टे हरदव
मनखे ला मनखे मैं मानँव । जगत जीव ला एके जानँव
नाश करव प्रभु मोर कुमति के । भाल भरव प्रभु बुद्धि सुमति ले
अपने पुरखा अउ माटी के । नदिया-नरवा अउ घाटी के
धुर्रा-चिखला मुड़ मा चुपरँव। देश-राज के मान म झुमरँव
नारद-शारद जस बगरावय । मूरख 'रमेश' का कहि गावय 
हे रिद्धी सिद्धी के दाता । अब दुख मेटव भाग्य विधाता 

दोहा

शरण परत गणराज के, मिटय सकल दुख क्‍लेश ।
सुख देवय पीरा  हरय, गणपति मोर गणेश ।।
जय जय गणराज प्रभु, रखव आस विश्‍वास ।
विनती करय 'रमेश' हा, कर लौ अपने दास ।।
-रमेश चौहान