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छंद साहित्‍य रत्‍न

दोहे

सुबह सवेरे जागिए
सुबह सवेरे जागिए

दोहे- सुबह सवेरे जागिए

सुबह सवेरे जागिए, जब जागे हैं भोर ।
समय अमृतवेला मानिए, जिसके लाभ न थोर ।।

जब पुरवाही बह रही, शीतल मंद सुगंध ।
निश्चित ही अनमोल है, रहिए ना मतिमंद ।।

दिनकर की पहली किरण, रखता तुझे निरोग ।
सूर्य दरश तो कीजिए, तज कर बिस्तर भोग ।।

दीर्घ आयु यह बांटता,  काया रखे निरोग ।
जागो जागो मित्रवर, तज कर मन की छोभ ।।

दोहे चिंतन के-

शांत हुई ज्योति घट में, रहा न दीपक नाम ।
 अमर तत्व निज पथ चला, अमर तत्व से काम ।।

धर्म कर्म धर्म, कर्म का सार है, कर्म धर्म का सार ।
 करें मृत्‍यु पर्यन्‍त जग, धर्म-कर्म से प्‍यार ।।

दुनिया भर के ज्ञान से, मिलें नहीं संस्‍कार ।
 अपने भीतर से जगे, मानवता उपकार ।।

डाली वह जिस पेड़ की, उससे उसकी बैर ।
 लहरायेगी कब तलक, कबतक उसकी खैर ।

जाति मिटाने देश में, अजब विरोधाभास ।
 जाति जाति के संगठन, करते पृथ्‍क विलास ।।

सकरी गलियां देखकर, शपथ लीजिये एक ।
 बेजाकब्‍जा छोड़कर, काम करेंगे नेक ।।

शिक्षक निजि स्कूल का, दीन-हीन है आज ।
 भूखमरी की राह पर, चले चले चुपचाप ।।

-रमेश चौहान