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आलेख रत्‍न धर्म-कर्म-अध्‍यात्‍म

संत तिरूवल्‍लुवर के अमृत वचन

अमृत वचन

संत तिरूवल्‍लुवर के अमृत वचन
संत तिरूवल्‍लुवर के अमृत वचन

1.नम्रता और स्‍नेहार्द्र वक्‍तृता केवल यही मनुष्‍य के आभूषण हैं और कोई नहीं ।

2. अधर्म द्वारा एकत्र की हुई सम्‍पत्‍ती की अपेक्षा तो सदाचारी पुरूष की दरिद्रता कहीं अच्‍छी है ।

3. जिन कर्मो में असफलता अवश्‍यसंभावी है, उसे संभव कर दिखाना और विध्‍न-बाधाओं से न डर कर अपने कर्तव्‍य पर डटे रहना प्रतिभा शक्ति के लिये दो प्रमुख सिद्धांत हैं ।

4. लोगों को रूलाकर जो सम्‍मपत्‍ती इकट्ठी की जाती है, वह क्रन्‍दन ध्‍वनि के साथ ही विदा हो जाती है, मगर जो धर्म द्वारा संचित की जाती है, वह बीच में ही क्षीण हो जाने पर भी अंत में खूब फलती-फूलती है ।

5. यदि तुम्‍हारे विचार शुद्ध और पवित्र है और तुम्‍हारी वाणी में सहृदयता है, तो तुम्‍हारी पाप वृत्ति का स्‍वयमेव क्षय हो जायेंगे ।

6. सत्‍पुरूषों की वाणी ही वास्‍तव में सुस्निग्‍ध होती है । क्‍योंकि दयार्द्र कोमल और बनावट से रहित होती है ।

7. लक्ष्‍मी ईर्ष्‍या करने वालों के पास नहीं रह सकती । वह उसको अपनी बड़ी बहन दरिद्रता के हवाले कर देती है ।

8. मीठे शब्‍दों के रहते हुए भी जो मनुष्‍य कड़वे शब्‍द का प्रयोग करता है, वह मानों पक्‍के फल को छोडकर कच्‍चा फल खाना चाहता है ।

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छंद साहित्‍य रत्‍न

पढ़ा-लिखा खुद को कैसे बतलाऊँ

चौपाई छंद

 पढ़ा-लिखा खुद को कैसे बतलाऊँ
पढ़ा-लिखा खुद को कैसे बतलाऊँ
पढ़-लिख कर मैंने क्‍या पाया । 
डिग्री ले खुद को भरमाया ।।
काम-धाम मुझको ना आया ।
केवल दर-दर भटका खाया ।।


 फेल हुये थे जो सहपाठी । 
 आज धनिक हैं धन की थाती । 
सेठ बने हैं बने चहेता । 
अनपढ़ भी है देखो नेता ।।


श्रम करने जिसको है आता । 
दुनिया केवल उसको भाता  ।। 
बचपन से मैं बस्‍ता ढोया । 
काम हुुुुनर मैं हाथ न बोया ।।


ढ़ूढ़ रहा हूँ कुछ काम मिले ।
दो पैसे से परिवार खिले ।।
पढ़ा-लिखा मैं तनिक अनाड़ी । 
घर में ना कुछ खेती-बाड़ी ।।


दुष्‍कर लागे  जीवन मेरा ।
निर्धनता ने डाला डेरा ।। 
दो पैसे अब मैं कैसे पाऊँ । 
पढ़ा-लिखा खुद को बतलाऊँ ।। 


-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

प्रभाती दोहे

जागरण के दोहे-

प्रभाती दोहे
चीं-चीं चिड़िया चहकती, मुर्गा देता बाँग ।
शीतल पवन सुगंध बन, महकाती सर्वांग ।।

पुष्पकली पुष्पित हुई, निज पँखुडियाँ प्रसार ।
उदयाचल में रवि उदित, करता प्राण संचार ।।

जाग उठे हैं नींद से, सकल सृष्टि संसार ।
जागो जागो हे मनुज, बनों नहीं लाचार ।।

बाल समय यह दिवस का, अमृत रहा है बाँट ।
आँख खोल कर पान कर, भरकर अपनी माँट ।।
(माँट-मिट्टी का घड़ा)

वही अभागा है जगत, जो जागे ना प्रात ।
दिनकर दिन से कह रहा, रूग्ण वही रह जात ।।

सुबह सवेरे जागिए, जब जागे हैं भोर ।
समय अमृतवेला मानिए, जिसके लाभ न थोर ।।

जब पुरवाही बह रही, शीतल मंद सुगंध ।
निश्चित ही अनमोल है, रहिए ना मतिमंद ।।

दिनकर की पहली किरण, रखता तुझे निरोग ।
सूर्य दरश तो कीजिए, तज कर बिस्तर भोग ।।

दीर्घ आयु यह बांटता,  काया रखे निरोग ।
जागो जागो मित्रवर, तज कर मन की छोभ ।।

-रमेश  चौहान
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अतुकांत कविता साहित्‍य रत्‍न

अतुकांत कविता- मेरे अंतस में

मेरे अंतस में (अतुकांत कविता)

अतुकांत कविता- मेरे अंतस में
अतुकांत कविता- मेरे अंतस में
आज अचानक
मैंने अपने अंत: पटल में झांक बैठा
देखकर चौक गया
काले-काले वह भी भयावह डरावने
दुर्गुण फूफकार रहे थे
मैं खुद को एक सामाजिक प्राणी समझता था
किंतु यहां मैंने पाया
समाज से मुझे कोई सरोकार ही नहीं
मैं परिवार का चाटुकार
केवल बीवी बच्चे में भुले बैठा
मां बाप को भी साथ नहीं दे पा रहा
बीवी बच्चों से प्यार
नहीं नहीं यह तो केवल स्वार्थ दिख रहा है
मेरे अंतस में

-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

पंच दिवसीय दीपपर्व की छंदमय शुभकामनाऍं

धनतेरस पर्व की शुभकामना-

पंच दिवसीय दीपपर्व की छंदमय शुभकामनाऍं
पंच दिवसीय दीपपर्व की छंदमय शुभकामनाऍं

आयुश प्रभु धनवंतरी (कुण्‍डलियां छंद)-

आयुष प्रभु धनवंतरी, हमें दीजिए स्वास्थ्य  ।
 आज जन्मदिन आपका,   दिवस परम परमार्थ ।।
 दिवस परम परमार्थ,  पर्व यह धनतेरस का ।
 असली धन स्वास्थ्य, दीजिए वर सेहत का ।।
 धन से बड़ा "रमेश", स्वास्थ्य पावन पीयुष ।
 आयुर्वेद का पर्व, आज बांटे हैं आयुष ।।

नरकचतुर्दशी की शुभकामना-

शक्ति-भक्ति प्रभु हमें दीजिये (सार छंद)-

पाप-पुण्य का लेखा-जोखा, प्रभुवर आप सरेखे ।
 सुपथ-कुपथ पर कर्म करे जब, प्राणी प्राणी को देखे ।
 शक्ति-भक्ति प्रभु हमें दीजिये,  करें कर्म हम जगहित ।
 प्राणी-प्राणी मानव-मानव, सबको समझें मनमित ।।

दीपावली की शुभकामना-

ज्ञान लौ दीप्‍त होकर (रूपमाला छंद)-

दीप की शुभ ज्‍योति पावन,  पाप तम को  मेट ।
 अंधियारा को हरे है,  ज्‍यों करे आखेट ।
 ज्ञान लौ से दीप्‍त होकर,  ही करे आलोक ।
 आत्‍म आत्‍मा प्राण प्राणी,  एक सम भूलोक ।।

दीप पर्व पावन, लगे सुहावन (त्रिभंगी छंद)-

दीप पर्व पावन, लगे सुहावन, तन मन में यह, खुशी भरे ।
 दीपक तम हर्ता, आभा कर्ता, दीन दुखी के, ताप हरे ।।
 जन-जन को भाये, मन हर्शाये, जगमग-जगमग, दीप करे ।
 सुख नूतन लाये, तन-मन भाये, दीप पर्व जब, धरा भरे ।।

बोल रहे हैं दीयें (सार छंद)-

जलचर थलचर नभचर सारे,, शांति सुकुन से जीये ।
 प्रेमभाव का आभा दमके, बोल रहे हैं दीये ।।
 राग-द्वेश का घूप अंधेरा, अब ना टिकने पाये ।
 हँसी-खुशी से लोग सभी अब, सबको गले लगाये ।।

भाईदूज की शुभकामना-

पावन पर्व भाईदूज (राधिका छंद)-

पावन पर्व भाईदूज, दुनिया रिझावे ।
 भाई-बहनों का प्यार, जग को सिखावे ।।
 दुखिया का दोनों हाथ, बहन का भ्राता ।
 यह अति पावन संबंध, जग को सुहाता ।।
-रमेश चौहान
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दीपावली की असीम शुभकामना आपको (वर्ण पंक्ति गीतिका)

दीपावली की असीम शुभकामना आपको

गीतिका छंद-

दीपावली की असीम शुभकामना आपको
दीपावली की असीम शुभकामना आपको
दीप ऐसे हम जलायें, जो सभी तम को हरे ।
 पाप सारे दूर करके, पुण्य केवल मन भरे ।।
 क्ष उर निर्मल करे जो, सद्विचारी ही गढ़े ।
 लीन कर मन ध्येय पथ पर, नित्य नव यश शिश मढ़े ।

 कीजिये कुछ काज ऐसा, देश का अभिमान हो  ।
 श्रु ना छलके किसी का, आज नव अभियान हो ।
 सीख दीपक से सिखें हम, दर्द दुख को मेटना ।
 न पुनित आनंद भर कर, निज बुराई फेेेकना ।।

 शुभ विचारी लोग होंवे, मानवी गुण से भरे ।
 द्र होवे हर सदन अब, मान महिला का करे ।
 काम सबके हाथ में हो, भाग्य का उपकार हो । 
 द रहे ना मन किसी के, एकता संस्कार हो ।।

 नाम होवे देश का अब, देशप्रेमी लोग हो ।
पको अब सब खुशी दे, देश हित सब भोग हो ।
र्व यह दीपावली का, हर्ष सबके मन भरे । 
कोप तज कर मोह तज कर, प्रीत सबसे सब करे 

दोहे-

नाना खुशी बरसावे, जगमग करते  दीप ।
 दीप पर्व की कामना, हर्षित हो मन  मीत ।।

 अंतर मन उजास भरे, जगमग करते दीप ।
 जीवन में सुख शांति दे, दीप पर्व मन मीत ।।
-रमेश चौहान

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छंद साहित्‍य रत्‍न

देेेेशभक्ति का चंदन सजे, नित्‍य हमारे भाल में

देश भक्ति का चंदन सजे, नित्‍य हमारे भाल में

Desh bhakti
Desh bhakti

उल्‍लाल छंद

देश हमारा हम देश के, देश हमारा मान है ।
मातृभूमि ऊंचा स्वर्ग से, भारत का यश गान है ।।

देश एक है सागर गगन एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

धर्म हमारा हम धर्म के, जिस पर हमें गुमान है ।
धर्म-कर्म जीवन में दिखे,जो खुद प्रकाशवान है ।।

फंसे रहेंगे कब तलक हम, पाखंडियों के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

जाति हमारी हम जाति के, जिस पर हम को मान है ।।
जाति-पाति से पहले वतन, ज्यों काया पर प्राण है ।।

बटे रहेंगे कब तलक हम, जाति- पाति जंजाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

अपने का अभिमान है जब, दूजे का भी मान हो ।
अपना अपमान बुरा लगे जब, दूजे का भी भान हो ।।

फंसे रहेंगे कब तलक हम, नेताओं के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

देवनागरी लिपि में लिखें, निज हिंदी की शान में ।
मोह दूसरों का छोड़ कर, खुश रहिए निज मान में ।।

देश एक है सागर गगन एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

रमेश चौहान के ‘चिंतन के 25 दोहे’

आजादी रण शेष है

आजादी रण शेष है-

आजादी रण शेष है, हैं हम अभी गुलाम ।
आंग्ल मुगल के सोच से, करे प्रशासन काम ।।

मुगलों की भाषा लिखे, पटवारी तहसील ।
आंग्लों की भाषा रटे, अफसर सब तफसील ।।

लोकतंत्र में देश का, अपना क्या है काम ।
भाषा अरू ये कायदे, सभी शत्रु के नाम ।।

ना अपनी भाषा लिये, ना ही अपनी सोच ।
आक्रांताओं के जुठन, रखे यथा आलोच ।।

लाओं क्रांति विचार में, बनकर तुम फौलाद ।
निज चिंतन संस्कार ही, करे हमें आजाद ।

बढ़े महंगाई-

निर्भरता व्यवसाय पर, प्रतिदिन बढ़ती जाय ।
ये उपभोक्ता वाद ही, भौतिकता सिरजाय ।।

मूल्य नीति व्यवसाय का, हमें समझ ना आय ।
दस रूपये के माल को, सौं में बेचा जाय ।।

कभी व्यपारी आंग्ल के, लूट लिये थे देश ।
बढ़े विदेशी माल फिर, बांट रहे हैं क्लेश ।।

अच्छे दिन के स्वप्न को, ढूंढ रहे हैं लोग ।
बढ़े महंगाई कठिन, जैसे कैंसर रोग ।।

टेक्स हटाओं तेल से, सस्ता कर दो दाम ।
जोड़ो टेक्स शराब पर, चले बराबर काम ।।

प्रकृति और विज्ञान-

प्रकृति और विज्ञान में, पहले आया कौन ।
खोज विज्ञान कर रहा, सत्य प्रकृति है मौन ।।

समय-समय पर रूप को, बदल लेत विज्ञान ।
कणिका तरंग जान कर, मिला द्वैत का ज्ञान ।।

सभी खोज का क्रम है, अटल नही है एक ।
पहले रवि था घूमता, अचर पिण्ड़ अब नेक ।।

नौ ग्रह पहले मान कर, कहते हैं अब आठ ।
रंग बदल गिरगिट सदृश, दिखा रहे हैं ठाठ ।।

जीव जन्म लेते यथा, आते नूतन ज्ञान ।
यथा देह नश्वर जगत, नश्वर है विज्ञान ।।

सेवक है विज्ञान तो, इसे न मालिक मान ।
साचा साचा सत्य है, प्रकृति पुरुष भगवान ।।

कोटि कोटि है देवता, कोटि कोटि है संत ।
केवल ईश्वर एक है, जिसका आदि न अंत ।।

पंथ प्रदर्शक गुरु सभी, कोई ईश्वर तुल्य ।
फिर भी ईश्वर भिन्न है, भिन्न भिन्न है मूल्य ।।

आँख मूंद कर बैठ जा, नही दिखेगा दीप ।
अर्थ नही इसका कभी, बूझ गया है दीप ।।

बालक एक अबोध जब, नही जानता आग ।
क्या वह इससे पालता, द्वेष या अनुराग ।।

मीठे के हर स्वाद में, निराकार है स्वाद ।
मीठाई साकार है, यही द्वैत का वाद ।।

जिसको तू है मानता, गर्व सहित तू मान ।
पर दूजे के आस को, तनिक तुच्छ ना जान ।।

कितने धार्मिक देश हैं, जिनका अपना धर्म ।
एक देश भारत यहां, जिसे धर्म पर शर्म ।।
-रमेश चौहान