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रमेश चौहान के ‘चिंतन के 25 दोहे’

आजादी रण शेष है

आजादी रण शेष है-

आजादी रण शेष है, हैं हम अभी गुलाम ।
आंग्ल मुगल के सोच से, करे प्रशासन काम ।।

मुगलों की भाषा लिखे, पटवारी तहसील ।
आंग्लों की भाषा रटे, अफसर सब तफसील ।।

लोकतंत्र में देश का, अपना क्या है काम ।
भाषा अरू ये कायदे, सभी शत्रु के नाम ।।

ना अपनी भाषा लिये, ना ही अपनी सोच ।
आक्रांताओं के जुठन, रखे यथा आलोच ।।

लाओं क्रांति विचार में, बनकर तुम फौलाद ।
निज चिंतन संस्कार ही, करे हमें आजाद ।

बढ़े महंगाई-

निर्भरता व्यवसाय पर, प्रतिदिन बढ़ती जाय ।
ये उपभोक्ता वाद ही, भौतिकता सिरजाय ।।

मूल्य नीति व्यवसाय का, हमें समझ ना आय ।
दस रूपये के माल को, सौं में बेचा जाय ।।

कभी व्यपारी आंग्ल के, लूट लिये थे देश ।
बढ़े विदेशी माल फिर, बांट रहे हैं क्लेश ।।

अच्छे दिन के स्वप्न को, ढूंढ रहे हैं लोग ।
बढ़े महंगाई कठिन, जैसे कैंसर रोग ।।

टेक्स हटाओं तेल से, सस्ता कर दो दाम ।
जोड़ो टेक्स शराब पर, चले बराबर काम ।।

प्रकृति और विज्ञान-

प्रकृति और विज्ञान में, पहले आया कौन ।
खोज विज्ञान कर रहा, सत्य प्रकृति है मौन ।।

समय-समय पर रूप को, बदल लेत विज्ञान ।
कणिका तरंग जान कर, मिला द्वैत का ज्ञान ।।

सभी खोज का क्रम है, अटल नही है एक ।
पहले रवि था घूमता, अचर पिण्ड़ अब नेक ।।

नौ ग्रह पहले मान कर, कहते हैं अब आठ ।
रंग बदल गिरगिट सदृश, दिखा रहे हैं ठाठ ।।

जीव जन्म लेते यथा, आते नूतन ज्ञान ।
यथा देह नश्वर जगत, नश्वर है विज्ञान ।।

सेवक है विज्ञान तो, इसे न मालिक मान ।
साचा साचा सत्य है, प्रकृति पुरुष भगवान ।।

कोटि कोटि है देवता, कोटि कोटि है संत ।
केवल ईश्वर एक है, जिसका आदि न अंत ।।

पंथ प्रदर्शक गुरु सभी, कोई ईश्वर तुल्य ।
फिर भी ईश्वर भिन्न है, भिन्न भिन्न है मूल्य ।।

आँख मूंद कर बैठ जा, नही दिखेगा दीप ।
अर्थ नही इसका कभी, बूझ गया है दीप ।।

बालक एक अबोध जब, नही जानता आग ।
क्या वह इससे पालता, द्वेष या अनुराग ।।

मीठे के हर स्वाद में, निराकार है स्वाद ।
मीठाई साकार है, यही द्वैत का वाद ।।

जिसको तू है मानता, गर्व सहित तू मान ।
पर दूजे के आस को, तनिक तुच्छ ना जान ।।

कितने धार्मिक देश हैं, जिनका अपना धर्म ।
एक देश भारत यहां, जिसे धर्म पर शर्म ।।
-रमेश चौहान
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करें मुकाबला चीन से अब

दोहे-

तोड़ें उसके दंभ को, दिखा रहा जो चीन ।
चीनी हमें न चाहिये, खा लेंगे नमकीन ।।

सरसी छंद-

सुनो सुनो ये भारतवासी, बोल रहा है चीन ।
भारतीय बस हल्ला करते, होतें हैं बल हीन ।।

कहां भारतीयों में दम है, जो कर सके बवाल ।
घर-घर तो में अटा-पड़ा है, चीनी का हर माल ।।

कहां हमारे टक्कर में है, भारतीय उत्पाद ।
वो तो केवल बाते करते, गढ़े बिना बुनियाद ।।

कमर कसो अब वीर सपूतो, देने उसे जवाब ।
अपना तो अपना होता है, छोड़ो पर का ख्वाब ।।

नही खरीदेंगे हम तो अब, कोई चीनी माल ।
सस्ते का मोह छोड़ कर हम, बदलेंगे हर चाल ।।

भारत के उद्यमियों को भी, करना होगा काम ।
करें चीन से मुकाबला अब, देकर सस्ते दाम ।।
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हिन्‍दी दिवस पर छंदमाला

Hindi Diwas
Hindi diwas

दोहे-

हिन्दी भाषी भी यहां, देवनागरी छोड़ ।
रोमन में हिन्दी लिखें, अपने माथा फोड़ ।।
देश मनाये हिन्दी दिवस, जाने कितने लोग ।
जाने सो माने नहीं, कैसे कहें कुजोग।।
देवनागरी छोड़ के, रोमन लिखे जमात ।
माॅं के छाती पर यथा, मार रहे हों लात ।।
दफ्तर दफ्तर देख लो, या शिक्षण संस्थान ।
हिन्दी कहते हैं किसे, कितनों को पहचान ।।
घाल मेल के रोग से, हिन्दी है बीमार ।
अँग्रेजी आतंक से, कौन उबारे यार ।।
हिन्दी की आत्मा यहाँ, तड़प रही दिन रात ।
देश हुये आजाद है, या है झूठी बात ।।
पहले हिन्दी हिन्द को, आप दीजिये मान ।
फिर भाषा निज प्रांत की, बोले आप सुजान ।।
प्रांत प्रांत से देश है, प्रांत देश का मान ।
ऊपर उठकर प्रांत से, रखें देश का भान ।।

दोहा मुक्तक-

फँसी हुई है जाल में, हिन्दी भाषा आज ।
अँग्रेजी में रौब है, हिन्दी में है लाज ।।
लोकतंत्र के तंत्र सब, अंग्रेजी के दास ।
अपनी भाषा में यहां, करे न कोई काज ।।

कुण्डलियां-

हिन्दी बेटी हिन्द की, ढूंढ रही सम्मान ।
ग्राम नगर व गली गली, धिक् धिक् हिन्दुस्तान ।
धिक् धिक् हिन्दुस्तान, दासता छोड़े कैसे ।
सामंती पहचान, बेड़ियाँ तोड़े कैसे।।
कह ‘रमेश‘ समझाय, करें माथे की बिन्दी ।
बन जा धरतीपुत्र, बड़ी ममतामय हिन्दी ।।
हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, लोक मन हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
मातृभाषा की बोल, खिले जस माथे बिन्दी ।।
भाषा-बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।

त्रिभंगी छंद-

भाषा यह हिन्दी, बनकर बिन्दी, भारत मां के, माथ भरे ।
जन मन की आशा, हिन्दी भाषा, जाति धर्म को, एक करे ।।
कोयल की बानी, देव जुबानी, संस्कृत तनया, पूज्य बने ।
एक दिवस ही क्यों, पर्व लगे ज्यों, निशदिन निशदिन, कंठ सने ।।
-रमेश चौहान
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शिक्षक दिवस पर कुछ दोहे

दोहे-

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लगते अब गुरूपूर्णिमा, बिते दिनों की बात ।
मना रहे शिक्षक दिवस, फैशन किये जमात ।

शिक्षक से जब राष्ट्रपति, हुये व्यक्ति जब देश।
तब से यह शिक्षक दिवस, मना रहा है देश ।

कैसे यह शिक्षक दिवस, यह नेताओं का खेल ।
किस शिक्षक के नाम पर, शिक्षक दिवस सुमेल ।।

शिक्षक अब ना गुरू यहां, वह तो चाकर मात्र ।
उदर पूर्ति के फेर वह, पढ़ा रहा है छात्र ।

‘बाल देवो भव‘ है लिखा, विद्यालय के द्वार ।
शिक्षक नूतन नीति के, होने लगे शिकार ।

शिक्षक छात्र न डाटिये, छात्र डाटना पाप ।
सुविधाभोगी छात्र हैं, सुविधादाता आप ।।

कौन उठाये अब यहां, कागजात के भार ।
शिक्षक करे पुकार है, कैसे हो उद्धार ।।

हुये एक शिक्षक यहां, देश के प्रेसिडेंट ।
मना रहे शिक्षक दिवस, तब से यहां स्टुडेंट ।।

सारे शिक्षक साथ में, करें व्यवस्था देख ।
आज मनाने टीचर्स डे, नेता आये एक ।।

क्षिक्षा एक व्यपार है, शिक्षक कहां सुपात्र ।
प्रायवेट के नाम पर, शिक्षक नौकर मात्र ।।
-रमेश चौहान
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प्रेम के दोहे

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दुनिया की यह रीत है, होते सबको प्रीत ।
समझे जिसको हार तू, होती तेरी जीत ।।
मेहंदी तेरे नाम की, रचा रखी है हाथ ।
जीना मरना है मुझे, अब तो तेरे साथ ।।
रूठी हुई थी भाग्य जो, मोल लिया अब शूल ।
तेरे कारण जगत को, मैंने समझी धूल ।।
तेरे मीठे बोल से, हृदय गई मैं हार ।
तेरे निश्चल प्रीत पर, तन मन जाऊँ वार ।।
देखा जब से मैं तुझे, सुध-बुध गई विसार ।
मीरा बन मैं श्याम पर, सब कुछ किया निसार ।।
खोले सारे भेद को, मेरे दोनों नैन ।
नहीं नुपुर भी मौन है, बोले मीठी बैन ।
प्रिये तुझे मैं क्या दूॅ , नित नूतन उपहार ।
सौंप दिया मैं तो तुझे, निज जीवन पतवार ।।
मूरत प्यारी चांद सम, श्याम मेघ सम केश ।
अधर पुष्प की पंखुड़ी, आंखों पर संदेश ।
अफसाना ये प्यार का, जाने ना बेदर्द ।
हम हँस हँस सहते रहे, बांट रही वह दर्द।।
लम्हा लम्हा इश्क में, बहाते रहे अश्क ।
इश्‍क इश्‍क है बेखुदी, इसमें कैसा रश्क ।।
वो तो खंजर घोपने, मौका लेती खोज ।
उनकी लंबी आयु की, करूं दुवा मैं रोज ।।
अश्क दिये आश्की सदा, तन्हा जीवन यार ।
जिगर लगे जब मोम का, कभी न करना प्यार ।।
-रमेश चौहान
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पहेलियां

परिचय

भारतीय संस्कृति में मानसिक विकास के लिए पहेली पूछना और पहेली बूझना संस्कृति विकास के प्रारंभिक काल से प्रचलन में है । किंतु इंटरनेट और सोशल मीडिया के तामझाम में नए बच्चे ऐसे खो गए हैं कि उनको इस प्रकार की संस्कृति का ज्ञान ही नहीं रह गया है । 

नए दौर में नयापन चाहिए-  

  • आज के बच्चे क्विज हल करना जानते हैं, वीडियो गेम खेलना जानते हैं, किंतुु पारंपरिक पहेलियों की ओर उनका ध्यान नहीं जाता । 
  • नया समय, नया दौर, नए बच्चे नयापन मांगते हैं । पारंपरिकता को यदि नए जमानेेेे तक पहुंचाना हो तो उसमें नयापन लाना होगा । इसी सिद्धांत के आधार पर मैंं आज प्राचीन विधा पहेली को नये परिधान में प्रस्तुत कर रहा हूं । 

पहेली कहते किसे हैं ?

इस बीच हम देखते हैं कि पहेली कहते किसे हैं ? प्रचलित पहेलियां काव्यात्म्म्मक रूप में शब्दों का ऐसा जाल होता है जिसमें उस वस्तु के प्रमुख गुणों को बुना जाता हैै जिससे उसका पहचान हो सके । 

पहेली बुझते कैसे हैं ? 

पहेली बुुझने केे लि पहले दिए गए पहेली को सावधानी पूर्वक बार-बार पढ़ते हैं और उस में उल्लेखित गुणोंं को समझने का प्रयास करते हैं । बार-बार ध्यान देने सेेे उस वस्तु की पहचान हो जाती है । 

प्रस्तुत है मेरे ही द्वारा रचित कुछ नई पहेलियांं- 

पीछा करता कौन वह, जब हों आप प्रकाश ।
तम से जो भय खात है, आय न तुहरे पास ।।
श्वेत बदन अरु शंकु सा, हरे रंग की पूंछ ।
सेहत रक्षक शाक है, सखा पहेली बूझ । 
काष्ठ नहीं पर पेड़ हूँ, बूझो मेरा नाम ।
मेरे फल पत्ते सभी, आते पूजन काम ।। 
बाहर से मैं सख्त हूँ, अंतः मुलायम खोल ।
फल मैं ऊँचे पेड़ का, खोलो मेरी पोल ।। 
कान पकड़ कर नाक पर, बैठा कौन महंत ।
दृष्टि पटल जो खोल कर, कार्य करे ज्यों संत ।। 
तरुण लड़कपन में हरी, और वृद्ध में लाल ।
छोटी लंबी तीक्ष्ण जो, करती खूब कमाल ।। 
फले कटीले वृक्ष पर, जिनकी खोल कठोर । 
बीज गुदे में है गुथे, करे कब्ज को थोर ।। 
-रमेश चौहान

जरा सोचिए, सोचने से मस्तिष्क का व्यायाम होता है । जिस प्रकार शारीरिक व्यायाम शरीर के लिए लाभदायक होता है ठीक उसी प्रकार पहेलियां भी मस्तिष्क के लिए लाभदायक होता है । अंत में इसका उत्तर दूंगा ।‌ अभी कुछ प्रयास कीजिए । ऐसे भी ये पहेलियां अत्यंत सहज सरल और सुलभ है । 

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दिए गए पहेलियों का उत्तर इस प्रकार है-

उत्तर- 1. परछाई 2. मूली 3. केला  4.नारियल 5. चश्मा (ऐनक), 6. मिर्च 7.बेल (बिल्व)