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तुकांत कविता साहित्‍य रत्‍न

अपनी कलम की नोक से

अपनी कलम की नोक से,
क्षितिज फलक पर,
मैंने एक बिंदु उकेरा है ।
भरने है कई रंग,
अभी इस फलक पर,
कुंचे को तो अभी हाथ धरा है ।
डगमगाती पांव से,
अंधेरी डगर पर,
चलने का दंभ भरा है ।
निशा की तम से,
चलना है उस पथ पर,
जिस पथ पर नया सबेरा है ।
राही कोई और हो या न सही,
अपनी आशा और विश्वास पर,
अपनो का आशीष सीर माथे धरा है ।
-रमेश चौहान
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अतुकांत कविता साहित्‍य रत्‍न

अतुकांत कविता- मैं एक अदना सा प्रायवेट स्‍कूल का टीचर

मैं एक अदना-सा
प्रायवेट स्कूल का टिचर
और वह
श्रम साधक मजदूर ।
मैं दस बजे से पांच बजे तक
चारदीवार में कैद रहता
स्कूल जाने के पूर्व
विषय की तैयारी
स्कूल के बाद पालक संपर्क
और वह
नौ बजे से दो बजे तक
श्रम की पूजा करता
इसके पहले और बाद
दायित्व से मुक्त ।
मेरे ही स्कूल में
उनके बच्चे पढ़ते हैं
जिनका मासिक शुल्क
महिने के महिना
अपडेट रहता है
मेरे बच्चे का
मासिक शुल्क
चार माह से पेंडिग है ।
मेरे बचपन का मित्र
जो मेरे साथ पढ़ता था
आठवी भी नहीं पढ़ पाया
आज राजमिस्त्री होकर
चार सौ दैनिक कमा लेता है
और इतने ही दिनों में
मैं एम.ए.डिग्री माथे पर चिपका कर
महिने में पाँच हजार कमा पाता हूँ ।
किराने के दुकान एवं राशन दुकान के
बही-खाते में मेरा नाम बना ही रहता है
शायद वह दैनिक नकद खर्च करता है
-रमेश चौहान