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भजन-‘संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी’

सार छंद-

प्रस्‍तुत भजन सार छंद में लिखि गई है । भारतीय संस्‍कृति और साहित्‍य का विशेष महत्‍व है । हिन्‍दी साहित्‍य स्‍वर्ण युग के कवि तुलसीदास, सूरदास, कबीर दास जैसे संतों ने अपनी रचनायें छंदों में ही लिखी हैं । इसके बाद भी छंदों का प्रचलन बना हुआ है । ‘सार छंद में चार पद होते हैं, प्रत्‍येक पद में 16,12 पर यति होता है । दो-दो पदों के अंत में समतुकांत होता है ।‘ सार छंद गीत और भजन लिखने के लिये सर्वाधिक प्रयोग में लाई जाती है ।

भजन का भवार्थ-

प्रस्‍तुत भजन में भगवान कृष्‍ण के मनोहर लालित्‍यमयी बालचरित्र का वर्णन सहज सुलभ और सरल भाषा में व्‍यक्‍त किया गया है । भगवान कृष्‍ण अपने बाल्‍यकाल में कैसे अपने भक्‍त गोपियों के साथ वात्‍सल्‍य भाव प्रदर्शित करते हुये उनके घर माखन खाते तो ओ भी चोरी-चोरी । भगवान के बालचरित्र की चर्चा हो और माखन चोरी की बात न हो, ऐसा कहॉं संभव है । प्रस्‍तुत भजन में भगवान के इन्‍हीं माखन चोरी लीला का चित्रात्‍मक अभिव्‍यक्ति प्रस्‍तुत किया गया है ।

बाल कृष्‍ण का माखन चोरी
बाल कृष्‍ण

माखन चोरी की कथा-

मूलरूप से श्रीमद्भागवत के दशम् स्‍कन्‍ध में भगवान के बाल चरित्र के साथ माखन चोरी का मनोहारी चित्रण किया गया है । इसे ही आधार मानकर हिन्‍दी साहित्‍य आदिकालिन कवियों से लेकर हम जैसे आज के कवि उसी भाव को अपने शब्‍दों में अपनी भावना को व्‍यक्‍त करते आ रहे हैं ।

मूल कथा के अनुसार भगवान कृष्‍ण अपने बाल्‍यकाल में अपने ग्‍वाल सखाओं के साथ खेल-खेल में गोकुल के ग्‍वालिनीयों के यहाँ माखन चुराने जाये करते थे । उनके सखा मानव पिरामिड बना कर कृष्‍ण को अपने कंधों में उठा लिया करते थे । भगवान कृष्‍ण ऊपर टांगे गये शिके (रस्सी में बंधे हुये मटके, जिसमें माखन रखा जाता था) को उतार लेते थे और स्‍वयं माखन तो खाते ही थे साथ-साथ ही हँसी-ठिठोली के साथ अपने बाल सखाओं को भी माखन खिलाते थे ।

अचरज की बात है इस माखन चोरी से वे ग्‍वालिनीयें आत्‍मीय रूप से बहुत आनंदीत होती थी जिनके यहॉं माखन चोरी होता था, वे ग्‍वालिनी बाहर से कृष्‍ण को डांटती थी किन्‍तु मन ही मन अपने भाग्‍य को सराहती थी कि कृष्‍ण उनके हाथों से बनाये माखन को खा रहे हैं ।

इससे अधिक अचरज की बात यह थी कि जिस ग्‍वालिन के घर माखन चोरी नहीं होता था, वह ग्‍वालिन बहुत दुखी हो जाती थी, उनके मन में एक हिनभावना आ जाता था कि उसकी सखी के यहॉं माखन चोरी हुआ किन्‍तु स्‍वयं उनके यहॉं नही हुआ और वे मन ही भगवान कृष्‍ण से प्रार्थना करने लगती कि हे माखन चोर, मेरे माखन का भी भोग लगाइये, मेरे घर को भी पावन कीजिये ।

इन्‍हीं भावनाओं को मैनें अपने इस काव्‍य भजन में पिरोने का प्रयास किया है-

संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
मेरो घर कब आयेंगे वो, राह तके सब छोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
मेरो घर कब आयेंगे वो, राह तके सब छोरी ।
सुना-सुना घर वो जब देखे, पहुँचे होले-होले ।
शिका तले सब ग्वाले ठाँड़े, पहुँचे खिड़की खोले ।।
ग्वाले कांधे लिये कृष्ण को, कृष्णा पकड़े डोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
माखन मटका हाथ लिये प्रभु, बिहसी माखन खाये ।
कछुक कौर ग्वालों पर डारे, ग्वालों को ललचाये ।।
माखन मटका धरे धरा पर, लूटत सब बरजोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
ग्वालन छुप-छुप मुदित निहारे, कृष्ण करे जब लीला ।
अंतस बिहसी डांट दिखावे, गारी देत चुटीला ।।
कृष्ण संग गोपी ग्वालन, करते जोरा-जोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
-रमेश चौहान
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घनाक्षरी छंद का संपूर्ण परिचय, घनाक्षरी छंद लिखना सीखें

घनाक्षरी छंद का परिचय-

हिन्दी साहित्य के स्वर्णयुग में जहाँ भावों में भक्ति और अध्यात्म का वर्चस्व था वहीं काव्य शिल्‍प छंद का सर्वत्र प्रभाव था । इस समय दोहा छंद के बाद सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय छंद घनाक्षरी रहा । इतने समय बाद आज भी घनाक्षरी छंद का प्रभाव यथावत बना हुआ है । केवल उसके कथ्य और कहन में अंतर आया है किन्तु शिल्‍प विधान और महत्व यथावत बने हुये हैं । आज ऐसा कोई कवि सम्मेलन शायद ही होते होंगे जिसमें घनाक्षरी छंद नहीं पढ़े जाते होंगे । इसी बात से इस छंद का महत्व का पता चलता है ।

घनाक्षरी छंद का उद्भव-

हिन्दी साहित्य में घनाक्षरी छंद का प्रयोग कब से हो रहें यह ठीक-ठीक कह पाना संभवन नहीं किन्तु हिन्दी साहित्यके स्वर्णिम युग में घनाक्षरी छंद न केवल परिचय होता अपितु प्रचुरता में भी उपलब्ध होता है। घनाक्षरी या कवित्त के नाम से उस समय के प्रायः सभी कवियों ने इस विधा पर अपनी कवितायें लिखी हैं । कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार है :-

जगन्ननाथ प्रसाद ‘रत्नाकर’ की घनाक्षरी रचना –

कोऊ चले कांपि संग कोऊ उर चांपि चले
कोऊ चले कछुक अलापि हलबल से ।
कहै रतनाकर सुदेश तजि कोऊ चलै
कोऊ चले कहत संदेश अबिरल से ॥
आंस चले काहू के सु काहू के उसांस चले
काहू के हियै पै चंद्रहास चले हल से ।
ऊधव के चलत चलाचल चली यौं चल
अचल चले और अचले हूँ भये चल से ।।

तुलसीदास जी की घनाक्षरी रचना-

भक्तिकालिन प्रसिद्व कवि तुलसीदास जी ने हनुमान बाहुक की रचना इसी घनाक्षरी छंद के आधार मान कर किये हैं –

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन.अनुमानि सिसु.केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन.मनए क्रम को न भ्रमए कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधिए लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर.रस धीरज कैए साहस कैए तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।

घनाक्षरी क्या है ?

घनाक्षरी एक वार्णिक छंद है, जिसके चार पद होते हैं, प्रत्येक पद में चार चरण होते हैं पहले तीन चरण में 8-8 वर्ण और चौथे चरण में 7 या 8 या 9 वर्ण होते हैं । अंतिम चरण में वर्णो की संख्या के आधार पर घनाक्षरी के प्रकार का निर्माण होता है ।

घनाक्षरी छंद के प्रकार

घनाक्षरी छंद मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं-

  1. 31 वर्णी घनाक्षरी- जिस घनाक्षरी के पहले तीन चरण में 8-8 वर्ण और सातवें चरण में 7 वर्ण हो कुल प्रत्येक पद में 32 वर्ण होते हैं ।
    जैसे- मनहरण, जनहरण, और कलाधर ।
  2. 32 वर्णी घनाक्षरी- इस घनाक्षरी के चारो चरण में 8-8 वर्ण कुल 32 वर्ण होते हैं ।
    जैसे-जलहरण, रूपघनाक्षरी, डमरू घनाक्षरी, कृपाण घनाक्षरी और विजया घनाक्षरी ।
  3. 33 वर्णी घनाक्षरीः इस घनाक्षरी के पहले तीन चरण में 8-8 वर्ण और चैथै चरण में 9 वर्ण होते हैं !
    जैसे-देवघनाक्षरी

घनाक्षरी छंद की परिभाषा घनाक्षरी छंद में-

आठ-आठ आठ-सात, आठ-आठ आठ-आठ
आठ-आठ आठ-नव, वर्ण भार गिन लौ ।।
आठ-सात अंत गुरू, ‘मन’ ‘जन’ ‘कलाधर’,
अंत छोड़ सभी लघु, जनहरण कहि दौ ।
गुरू लघु क्रमवार, नाम रखे कलाधर
नेम कुछु न विशेष, मनहरण गढ़ भौ ।।
आठ-आठ आठ-आठ, ‘रूप‘ रखे अंत लघु
अंत दुई लघु रख, कहिये जलहरण ।
सभी वर्ण लघु भर, नाम ‘डमरू’ तौ धर
आठ-आठ सानुप्रास, ‘कृपाण’ नाम करण ।।
यदि प्रति यति अंत, रखे नगण-नगण
हो ‘विजया’ घनाक्षरी, सुजष मन भरण ।
आठ-आठ आठ-नव, अंत तीन लघु रख
नाम देवघनाक्षरी, गहिये वर्ण शरण ।।

मनहरण घनाक्षरी-

घनाक्षरी में मनहरण घनाक्षरी सबसे अधिक लोकप्रिय है । इस लोकप्रियता का प्रभाव यहाँ तक है कि बहुत से कवि मित्र भी मनहरण को ही घनाक्षरी का पर्याय समझ बैठते हैं । इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 7 वर्ण होते हैं प्रत्येक पद का अंत गुरू से होना अनिवार्य है किन्तु अंत में लघु-गुरू का प्रचलन अधिक है । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

सुन्दर सुजान पर, मन्थ मुसकान पर, बांसुरी की तान पर, ठौरन ठगी रहै ।
मूरति विषाल पर, कंचनसी माल पर, हंसननी चाल पर, खोरन खगी रहै ।।
भीहें धनु मैन पर, लोने जुग रैन पर, षुद्व रस बैन पर, वाहिद पगी रहै ।
चंचल से तन पर, सांवरे बदन पर, नंद के नंदन पर, लगन लगी रहै ।।

जनहरण घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण होते हैं । प्रत्येक पद का 31 वां वर्ण गुरू शेष सभी वर्ण लघु होते हैं । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

यदुपति जय जय, नर नरहरि जय जय, जय कमल नयन, जल गिरधरये ।
जगपति हरि जय, जय गुरू जग जय, जय मनसिज जय, जय मन हरये ।।
जय परम सुमतिधर कुमतिन छयकर जगत तपत हर नरवरये ।
जय जलज सदृष छबि सुजन नलिन रवि पढ़त सुकवि जस जग परवे ।।

कलाधर घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण होते हैं । प्रत्येक पद में क्रमषः गुरू-लघु 15 बार आता है और अंत में 1 गुरू होता है । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

जाय के भरत्थ चित्रकूट राम पास बेगि हाथ जोरि दीन है सुप्रेम तें बिनैं करी ।
सीय तात माताा कौशिला वशिष्‍ठ आदि पूज्य लोक वेद प्रीति नीति की सुरीतिही धरी ।
जान भूप बैन धर्म पाल राम हैं सकोच धीर इे गँभीरबंधु की गलानि को हरी ।
पादुका दई पठाय औध को समाज साज देख नेह राम सीय के हिये कृपा भरी ।।

रूपघनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । 32 वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

बेर बेर बेर लै सराहैं बेर बेर बहुरसिक बिहारी देत बंधु कहँ फेर फेर ।
चाखि भाषै यह वाहु ते महान मीठो लेहु तो लखन यों बखानत हैं हेर हेर ।।
बेर बेर देबै बेर सबरी सु बेर बेर तऊ रघुबीर बेर बेर तेहि टेर टेर ।
लायो बेर बेर जनि लावो बेर बेर जनि लावो बेर लावो कहैं बेर बेर ।।

जलहरण घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । 31वां एवं 32वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये अर्थात अंत में दो लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

भरत सदा ही पूजे पादुका उते सनेम इते राम सीय बंधु सहित सिधारे बन ।
सूूूूूूपनखा कै कुरूप मारे खल झुंड घने हरी दससीस सीता राघव बिकल मन ।।
मिले हनुमान त्यों सुकंठ सों मिताई ठानि वाली हति दीनों राज्य सुग्रीवहिं जानि जन ।
रसिक बिहारी केसरी कुमार सिंधु लांघि लंक सीय सुधि लायो मोद बाढ़ो तन ।।

डमरू घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी 32वों वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये अर्थात सभी वर्ण लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

रहत रजत नग नगर न गज तट गज खल कल गर गरल तरल धर ।
न गनत गन यष सघन अगन गन अतन हतन तन लसत नखर कर ।।
जलज नयन कर चरण हरण अघ श्‍रण सकल चर अचर खचर तर ।
चहत छनक जय लहत कहत यह हर हर हर हर हर हर हर हर ।।

कृपाण घनाक्षरी –

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी चरणों में सानुप्रास होता है अर्थात समान उच्चारण समतुक होता है । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

चलह है के विकराल, महाकालहू को काल, किये दोउ दृग लाल, धाई रन समुहान ।
जहां क्रुध है महान, युद्व करि घमसान, लोथि लोथि पै लदान, तड़पी ज्यों तड़ियान ।।
जहां ज्वाला कोट भान, के समान दरसान, जीव जन्तु अकुलान, भूमि लागी थहरान ।
तहां लागे लहरान, निसिचरहूं परान, वहां कालिका रिसान, झुकि झारी किरपान ।।

विजया घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी पदो ंके अंत में लघु गुरू या नगण मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

भई हूँ अति बावरी बिरह घेरी बावरी चलत है चवावरी परोगी जाय बावरी ।
फिरतिहुं उतावरी लगत नाहीं तावरी सुबारी को बतावरी चल्यों है जात दांवरी ।।
थके हैं दोऊ पांवरी चढ़त नाहीं पांवरी पियारो नाहीं पांवरी जहर बांटि खांवरी ।
दौरत नाहीं नावरी पुकार के सुनावरी सुन्दर कोऊ नावरी डूबत राखे नावरी ।।

देवघनाक्षरी –

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 9 के क्रम में 33 वर्ण होते हैं । सभी पदो ंके अंत में नगण मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

झिल्ली झनकारैं पिक, चातक पुकारैं बन, मोरनि गुहारैं उठी, जुगुनू चमकि चमकि ।
घोर घनघोर भारे, धुरवा धुरारे धाम, धूमनि मचावैं नाचैं, दामिनी दमकि दमकि ।।
झूकनि बयार बहै, लूकान लगावैं अंक, हूकनि भभूकिन का, उर में खमकि खमिक ।
कैसे करि राखौं प्राण, प्यारे जसवन्त बिन, नान्हीं नान्हीं बूंद झरै, मेघवा झमकि झमकि ।।

घनाक्षरी लिखने के नियम-

  1. घनाक्षरी में चार पद होता है ।
  2. प्रत्येक पद में चार चरण या चार बार यति होता है ।
  3. पहले के तीन चरण में आठ-आठ वर्ण निश्चित रूप से होते हैं ।
  4. चौथे चरण में सात, आठ या नौ वर्ण हो सकते हैं ! इसी अंतर से घनाक्षरी का प्रकार बनता है ।
  5. चौथे चरण में सात वर्ण होने पर मनहरण, जनहरण और कलाधर नाम का घनाक्षरी बनता है ! जिसमें लघु गुरू का भेद होता है ।
  6. चौथे चरण में आठ वर्ण होने पर रूप, जलहरण, डमरू, कृपाण और विजया नाम का घनाक्षरी बनता है । जिसमें लघु गुरू का भेद होता है ।
  7. चौथे चरण में नौ वर्ण आने पर देवघनाक्षरी बनता है ।

घनाक्षरी लिखना सीखें –

घनाक्षरी उपरोक्त नियमों के आधार पर लिखा जा सकता है किन्तु इसके लिये हमें वर्ण की गणना करना और वर्ण में लघु गुरू का निर्धारण करने आना चाहिये । इसलिये सबसे पहले हम वर्ण को समझने का प्रयास करेंगे फिर वर्ण लघु-गुरू का निर्धारण करना देखेंगे तत्पष्चात षब्दों में वर्णो की गणना करना सीखेंगे अंत में घनाक्षरी लिखना जानेंगे ।

वर्ण-

‘‘मुख से उच्चारित ध्वनि के संकेतों, उनके लिपि में लिखित प्रतिकों को ही वर्ण कहते हैं ।’’ हिन्दी वर्णमाला में 53 वर्णो को तीन भागों में भाटा गया है-

  1. स्वर-
    अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ए,ऐ,ओ,औ. अनुस्वार-अं. अनुनासिक-अँ. विसर्ग-अः
  2. व्यंजनः
    क,ख,ग,घ,ङ, च,छ,ज,झ,ञ. ट,ठ,ड,ढ,ण,ड़,ढ़, त,थ,द,ध,न, प,फ,ब,भ,म, य,र,ल,व,श,ष,स,ह,
  3. संयुक्त वर्ण-
    क्ष, त्र, ज्ञ,श्र

वर्ण गिनने नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के सभी वर्ण चाहे वह स्वर हो, व्यंजन हो, संयुक्त वर्ण हो, लघु मात्रिक हो या दीर्घ मात्रिक सबके सब एक वर्ण के होते हैं ।
  2. अर्ध वर्ण की कोई गिनती नहीं होती ।

उदाहरण-

कमल=क+म+ल=3 वर्ण
पाठशाला= पा+ठ+शा+ला =4 वर्ण
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)
कंप्यूटर=कंम्प्+यू़+ट+र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

लघु-गुरू का निर्धारण करना-

वर्णो के ध्वनि संकेतो को उच्चारित करने में जो समय लगता है उस समय को मात्रा कहते हैं । यह दो प्रकार का होता है-

  1. लघु- जिस वर्ण के उच्चारण में एक चुटकी बजाने में लगे समय के बराबर समय लगे उसे लघु मात्रा कहते हैं। इसका मात्रा भार 1 होता है ।
  2. गुरू-जिस वर्ण के उच्चारण में लघु वर्ण के उच्चारण से अधिक समय लगता है उसे गुरू या दीर्घ कहते हैं ! इसका मात्रा भार 2 होता है ।

लघु गुरु निर्धारण के नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के तीन स्वर अ, इ, उ, ऋ एवं अनुनासिक-अँ लघु होते हैं और इस मात्रा से बनने वाले व्यंजन भी लघु होते हैं ।
    लघु स्वरः-अ,इ,उ,ऋ,अँ
    लघु व्यंजनः- क, कि, कु, कृ, कँ, ख, खि, खु, खृ, खँ ..इसीप्रकार
  2. इन लघु स्वरों को छोड़कर शेष स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ और अनुस्वार अं गुरू स्वर होते हैं तथा इन से बनने वाले व्यंजन भी गुरु होता है ।
    गुरू स्वरः- आ, ई,ऊ, ए, ऐ, ओ, औ,अं
    गुरू व्यंजन:- का की, कू, के, कै, को, कौ, कं,……..इसीप्रकार
  3. अर्ध वर्ण का स्वयं में कोई मात्रा भार नहीं होता,किन्तु यह दूसरे वर्ण को गुरू कर सकता है ।
  4. अर्ध वर्ण से प्रारंभ होने वाले शब्द में मात्रा के दृष्टिकोण से भी अर्ध वर्ण को छोड़ दिया जाता है ।
  5. किंतु यदि अर्ध वर्ण शब्द के मध्य या अंत में आवे तो यह उस वर्ण को गुरु कर देता है जिस पर इसका उच्चारण भार पड़ता है । यह प्रायः अपनी बाँई ओर के वर्ण को गुरु करता है ।
  6. यदि जिस वर्ण पर अर्ध वर्ण का भार पड़ रहा हो वह पहले से गुरु है तो वह गुरु ही रहेगा ।
  7. संयुक्त वर्ण में एक अर्ध वर्ण एवं एक पूर्ण होता है, इसके अर्ध वर्ण में उपरोक्त अर्ध वर्ण नियम लागू होता है ।
उदाहरण-

रमेश=र+मे+श=लघु़+गुरू+लघु=1+2+1=4 मात्रा
सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा
तुम्हारा=तु़+म्हा+रा=लघु+गुरू+गुरू =1+2+2=5 मात्रा
कंप्यूटर=कम्‍प्‍+यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
यज्ञ=यग्+य=गुरू+लघु=2+1=3
क्षमा=क्ष+मा=लघु+गुरू =1+2=3

वर्णिक एवं मात्रिक में अंतर-

जब उच्चारित ध्वनि संकेतो को गिनती की जाती है तो वार्णिक एवं ध्वनि संकेतों के उच्चारण में लगे समय की गणना लघु, गुरू के रूप में की जाती है इसे मात्रिक कहते हैं । मात्रिक में मात्रा महत्वपूर्ण होता है वार्णिक में वर्ण महत्वपूर्ण होता है । लेकिन दोनों प्रकार के छंद रचना में इन दोनों का ज्ञान होना आवश्‍यक है ।

उदाहरण- 
रमेश=र+मे+श=4 वर्ण, रमेश=र+मे+श=लघु़+गुरू+लघु=1+2+1=4 मात्रा
कंप्यूटर=कंम्प्+यू़+ट+र=4वर्ण, कंप्यूटर=कम्‍प्‍+यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण, सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा

घनाक्षरी रचना का अभ्यास –

उपरोक्त जानकारी के पश्चात हम एक घनाक्षरी की रचना का अभ्यास करते हैं । सबसे पहले आपको एक विचार या सोच की आवश्यकता होती है । सबसे पहले इस विचार को शब्द में बदलना है फिर शब्दों का चयन ऐसे करना है कि घनाक्षरी के नियमों का पूरा-पूरा पालन हो सके ।

हम एक मनहरण घनाक्षरी लिखने का अभ्यास करते है-

विचार-

मनहरण घनाक्षरी को मनहरण घनाक्षरी में परिभाषित करना ।
मनहरण घनाक्षरी के नियमः- मनहरण घनाक्षरी में चार पद होते हैं जिसके प्रत्येक पद में चार चरण होते हैं । पहले तीन चरण 8-8 वर्ण और चैथे चरण में 7 वर्ण होता हैजिसका अंत लघु गुरू से हो । इसी कथन को घनाक्षरी में लिखने का प्रयास करते हैं-

पहला पद-
  • पहला चरण- ‘वर्ण-छंद घनाक्षरी’ (8 वर्ण)
  • दूसरा चरण- ‘ गढ़न हरणमन’ (8 वर्ण)
  • तीसरा चरण- ‘ नियम-धियम आप’ (8 वर्ण)
  • चौथा चरण- ‘धैर्य धर जानिए’ (7 वर्ण, अंत में लघु गुरू)

दूसरा पद –

  • पहला चरण- आठ-आठ आठ-सात, (8 वर्ण)
  • दूसरा चरण- चार बार वर्ण रख (8 वर्ण)
  • तीसरा चरण- चार बार यति कर, (8 वर्ण)
  • चौथा चरण- चार पद तानिए (7 वर्ण, अंत में लघु गुरू, पलिे और दूसरे पद के अंत में समान तुक)
इसी प्रकार तीसरे और चैथे पद की रचना कर लेने पर एक घनाक्षरी संपूर्णरूप् में इस प्रकार होगा-
वर्ण-छंद घनाक्षरी, गढ़न हरणमन
नियम-धियम आप, धैर्य धर जानिए ।
आठ-आठ आठ-सात, चार बार वर्ण रख
चार बार यति कर, चार पद तानिए ।।
गति यति लय भर, चरणांत गुरु धर
साधि-साधि शब्द-वर्ण, नेम यही मानिए ।
सम-सम सम-वर्ण, विषम-विषम सम,
चरण-चरण सब, क्रम यही पालिए ।।
-रमेश चौहान
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हिन्‍दी साहित्‍य में क्षेत्रीय बोली-भाषाओं का योगदान


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार -‘साहित्य जनता की चित्त-वृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब अर्थात समाज का दर्पण है।‘  जब साहित्य समाज का दर्पण है, तो समाज के सभी आयामों का प्रतिबिम्ब दर्पण में अंकित होंगी ही । जब हम भारतीय समाज के संदर्भ में अध्ययन करते हैं, तो भारतीय विविधता स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होने लगते हैं । इन्ही विविधता में भाषायिक विविधता सम्मिलित है । भाषायी विविधता के संदर्भ में कहा गया है -‘‘‘चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी‘‘ एवं इसी संदर्भ में कबीरदास की प्रसिद्ध पंक्ति है – ‘‘संस्किरित है कूप जल, भाखा बहता नीर।‘‘ इससे अनुमान लगाया जा सकता है हमारे देष में कितनी बोलियां बोली जाती हैं।  जिनका दर्पण रूपी साहित्य में प्रतिबिम्ब अंकित होना अवष्यसंभावी है । किन्तु आचार्य संजीव ‘सलील‘ मानते है -‘‘साहित्य जड़वत दर्पण नही है अपितु यह सजीव प्रतिक्रियात्मक है जो समाज को सचेत भी करता है।‘  साहित्य के प्रतिक्रियात्मक चेतना के बल पर बोली सवंर्धित-प्रवर्धित होकर साहित्य में स्थान बनाती है। साहित्य किसी भाषा का लैखिक एवं मौखिक स्वरूप का सम्मिश्रण होता है । मौखिक रूप से बोली जाने वाली भाशा लोगो के मौलिक मातृबोली से प्रभावित होती है। अतः स्पश्ट है कि-साहित्य को संपन्न बनाने में इन बोलियों की विषेश भूमिका होती है ।


जब  हम हिन्दी साहित्य में क्षेत्रीय बोलियों के योगदान पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो हमें भाषा के विकास क्रम पर चिंतन करना चाहिये । हिन्दी का विकास क्रम-संस्कृत→ पालि→ प्राकृत→ अपभ्रंश→ अवहट्ट→ प्राचीनध्प्रारम्भिक हिन्दी मानी जाती है ।  अपभ्रंष से हिन्दी उदगम पथ पर क्षेत्र विषेष के प्रभाव से विभिन्न शैलियों का जन्म हुआ विस्तृत क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ उसे हिन्दी एवं सीमित क्षेत्र में विकसित शैलियों को बोलियां कहा गया । अपने रहन-सहन, प्राकतिक वातावरण के अनुरूप विभिन्न भाशा-बोली का विकास हुआ है।


हिन्दी साहित्य का विकास आठवीं शताब्दी से माना जाता है । हांलाकि इसकी जड़े प्राचाीन भारत के प्राचीन ‘संस्कृत‘ भाशा में तलाषी जा सकती है ।  किंतु हिन्दी साहित्य की जड़े मध्ययुगीन भारत के छोटे-छोटे क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियों में पाई जाती हैं । मध्यकाल में ही हिन्दी का स्वरूप स्पष्ट हुआ तथा उसकी प्रमुख बोलियाँ विकसित हुई ।   हिन्दी के मुख्य दो भेद पूर्वी हिन्दी एवं पश्चिमी हिन्दी स्वीकार किये गये हैं । पूर्वी हिन्दी के अंतर्गत अर्धमागधी प्राकृत स्वभाव के अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी को रखा गया है। पश्चिमी हिन्दी के अंतर्गत पांच बोलियां -खड़ी बोली, बांगरू, ब्रज, कन्नौजी, और बुंदेली स्वीकार किये गये हैं । इनके अतिरिक्त बिहारी, राजस्थानी एवं पहाड़ी हिन्द प्रदेश की उपभाषएं (बोलियां) स्वीकार की गई हैं । गैर हिन्दी भाषीय क्षेत्र में बोली जानी वाली हिन्दी बोली में – बम्बईया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी एवं दक्खिनी हिन्दी भी सम्मिलित है । श्री मधूधवन ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास‘ में भूमिका देते हुये स्वीकार करते हैं कि -‘ इन सभी भाषाओं के साहित्य को हिन्दी का साहित्य माना जाता है क्योंकि ये भाषाएँ हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘अपभ्रंश’ काल से उन समस्त रचनाओं का अध्ययन किया जाता है उपर्युक्त उपभाषाओं में से भी लिखी हो।‘‘ वास्तव में ‘हिन्दी‘ शब्द भाषा विशेष का वाचक नहीं है, बल्कि यह भाषा समूह का नाम है। हिन्दी जिस भाषा समूह का नाम है, उसमें आज के हिंदी प्रदेशध्क्षेत्र की 5 उपभाषाएँ तथा 17 बोलियाँ शामिल हैं। वस्तुतः इन बोलियों या उपभाशाओं को हिन्दी भाशा की बोली या उपभाशा मानने के पीछे इन सबकी परस्पर सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनितिक एकता के साथ-साथ परस्पर बोधगम्यता, षब्द-वर्ग की समानता तथा संरचनात्मक साम्य है ।


हिन्दी की विविधता उसकी शक्ति है ।  हिन्दी की बोलियां अपने साथ एक बड़ी परंपरा एवं सभ्यता को समेटे हुये हैं।   इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है ।  हिन्दी साहित्य के जिस कालखण्ड़ को ‘स्वर्ण युग‘ की संज्ञा दी गई, उस काल पर दृश्टिपात करने से हम पाते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ‘अवधी‘ में रचित ‘रामचरित मानस‘, सूरदासजी द्वारा ‘ब्रजभाषा‘ में रचित ‘सूरसागर‘ मीरा बाई का राजस्थानी एवं ब्रजभाषा में साहित्यिक उपादान ‘बरसी का मायरा‘ एवं ‘गीत गोंविंद टीका‘, विद्यापति के मैथली की रचनाएं आदि आज हमारी साहित्यिक धरोहर हैं। 
विभिन्न बोलियों एवं उपभाषाओं का हिन्दी साहित्य में आदिकाल से आज पर्यंत सतत प्रभाव बना हुआ है –
अवधी- अवधी अपने आदिकाल से ही हिन्दी की प्रमुख उप भाषा के रूप  में रही है ।  हिन्दी साहित्य अवधी साहित्य पर निर्भर रहा है । अवधी की पहली कृति मुल्ला दाउद की ‘चंद्रायन‘ या ‘लोरकहा‘ (1370 ई.) मानी जाती है। इसके उपरान्त अवधी भाषा के साहित्य का उत्तरोत्तर विकास होता गया। अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय सूफीध्प्रेममार्गी कवियों को है। कुतबन (मृगावती), जायसी (पद्मावत), मंझन (मधुमालती), आलम (माधवानल कामकंदला), उसमान (चित्रावली), नूर मुहम्मद (इन्द्रावती), कासिमशाह (हंस जवाहिर), शेख निसार (यूसुफ जुलेखा), अलीशाह (प्रेम चिंगारी) आदि सूफी कवियों ने अवधी को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। बैसवाड़ी अवधी में गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित ‘रामचरित मानस‘ ने हिन्दी साहित्य को नई ऊंचाई पर पहुॅचाया । ‘रामचरित मानस‘ के रूप में आज भी हिन्दी साहित्य के रूप में घर-घर स्थापित है ।

ब्रजभाषा-

हिंदी साहित्य के मध्ययुग में ब्रजभाषा में उच्च कोटि का काव्य निर्मित हुआ। इसलिए इसे बोली न कहकर आदरपूर्वक भाषा कहा गया। मध्यकाल में यह बोली संपूर्ण हिन्दी प्रदेश की साहित्यिक भाषा के रूप में मान्य हो गई थी। पर साहित्यिक ब्रजभाषा में ब्रज के ठेठ शब्दों के साथ अन्य प्रांतों के शब्दों और प्रयोगों को भी ग्रहण किया है। ब्रजभाषा साहित्य का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ सुधीर अग्रवाल का ‘प्रद्युम्न चरित‘(1354 ई.) है। भक्तिकाल में कृष्णभक्त कवियों ने अपने साहित्य में ब्रजभाषा का चरम विकास किया। पुष्टि मार्ग-शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के सूरदास (सूरसागर), नंददास, निम्बार्क संप्रदाय के श्री भट्ट, चैतन्य सम्प्रदाय के गदाधर भट्ट, राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित हरिवंश एवं सम्प्रदाय निरपेक्ष कवियों में रसखान, मीराबाई आदि प्रमुख कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा के साहित्यिक विकास में अमूल्य योगदान  दिया । इन भक्तों के पद आज भी पूरे हिन्दी भाशाी प्रदेषों में प्रचलित हैं ।

खड़ी बोली-


इसी बोली के आधार पर हिन्दी का आधुनिक रूप  खड़ा हुआ है । प्राचीन हिन्दी काल में रचित खड़ी बोली साहित्य में खड़ी बोली के आरम्भिक प्रयोगों से उसके आदि रूप या बीज रूप का आभास मिलता है। खड़ी बोली का आदिकालीन रूप सरहपा आदि सिद्धों, गोरखनाथ आदि नाथों, अमीर खुसरो जैसे सूफियों, जयदेव, नामदेव, रामानंद आदि संतों की रचनाओं में उपलब्ध है। इन रचनाकारों में हमें अपभ्रंश-अवहट्ट से निकलती हुई खड़ी बोली स्पष्टतः दिखाई देती है। श्रीधर पाठक की प्रसिद्व रचनाएं एकांत योगी और कश्मीर सुषमा खड़ी बोली की सुप्रसिद्ध रचनाएं हैं। रामनरेश द्विवेदी ने अपने पथिक मिलन और स्वप्न महाकाव्यों में इस बोली का विकास किया। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘ के ‘प्रिय प्रवास‘ को खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना गया है।

दक्खिनी-


हिन्दी में गद्य रचना परम्परा की शुरुआत करने का श्रेय दक्कनी हिन्दी के रचनाकारों को ही है। दक्कनी हिन्दी को उत्तर भारत में लाने का श्रेय प्रसिद्ध शायर वली दक्कनी (1688-1741) को है। वह मुगल शासक मुहम्मद शाह ‘रंगीला‘ के शासन काल में दिल्ली पहुँचा और उत्तरी भारत में दक्कनी हिन्दी को लोकप्रिय बनाया। डाॅं कुंज मेत्तर के अनुसार आधुनिक खड़ीबोली हिन्दी का विकास दक्षिण के हिन्दीतर क्षेत्रों में हुआ वे लिखते हैं -‘‘हिन्दी का जो रूप हमारे सामने है उसका पूववर्ती रूप दक्षिण में विकसित हुआ । खड़ी बोली के दक्षिण में व्यवहृत पुराने स्वरूप  को देखकर हम यह विष्वास करने को बाध्य हो जाते है कि भाशा की दृश्टि से आधुनिकता के तत्व आरंभकालिन दक्खिनी में अभिव्यक्त हुये थे ।‘‘
छत्तीसगढी- छत्तीसगढी के प्रांरभिक लिखित रूप के बारे में कहा जाता है कि वह 1703 ईस्वी के दंतेवाडा के दंतेश्वरी मंदिर के मैथिल पंडित भगवान मिश्र द्वारा शिलालेख में है ।  कबीर दास के शिष्य और उनके समकालीन (संवत 1520) धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी के आदि कवि का दर्जा प्राप्त है, जिनके पदों को आज भी कबीर अनुनायियों द्वारा गाया एवं पढ़ा जाता है । हिन्दी साहित्य में माधवराव सप्रे के जिस कहानी ‘टोकरी भर मिट्टी‘ को प्रथम सुगठित कहानी होने को श्रेय प्राप्त है, उसकी पृष्‍ठ छत्तीसगढ़ी लोकगाथा में अवलंबित है । पं. सुन्दरलाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, नरसिंह दास वैष्णव, बंशीधर पांडेय, शुकलाल पांडेय, कुंजबिहारी चैबे, गिरिवरदास वैष्णव ने राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में अपनी रचनाओं द्वारा छत्तीसगढ़ी के उत्कर्ष को नया आयाम दिया ।

बुंदेली –


हिंदी साहित्य के विकास और समृद्धि में लोक भाषा बुंदेली का महत्वपूर्ण योगदान है। इसे किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं आंका जा सकता है। इसका विकास रासो काव्य धारा के माध्यम से हुआ। जगनिक आल्हाखंड तथा परमाल रासो प्रौढ़ भाषा की रचनाएं हैं। बुंदेली के आदि कवि के रुप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं, जो बुंदेली की समस्त विशेषताओं से मंडित हैं।

छत्तीसगढ़ी-

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय सभी प्रदेश अंचल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हुये, जिससे सभी बोलियों में राश्ट्रीयता का नाद गुंजा जिससे हिन्दी साहित्य आज भी गुजिंत है ।  स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व मौखिक रूप से हिन्दी-उर्दू-क्षेत्रीय बोलियों से मिश्रित हिन्दी का उपयोग किया गया जिसे हिन्दूस्तानी के नाम से गांधी आदि नेताओं द्वारा अभिहित किया जाता था । हिन्दी, हिन्दुस्तानी भाषा के नाम से आजादी के लड़ाई का मुख्य हथियार रहा । डाॅ. श्रीलाल शुक्ल ‘‘आजादी के बाद हिन्दी‘‘ में लिखते हैं -‘‘हिन्दी स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा थी । बीसवी षताब्दी के प्रारंभ में अनेक लोगो ने बचपना में हिन्दी केवल इसीलिये सीखे ताकि वह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले सके ।‘‘  मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी बोली में अनेक काव्या की रचना की। उनकी ‘भारत भारती‘ में स्वाधीनता आंदोलन की ललकार है। राष्ट्रीय प्रेम उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर है। सभी बोलियों में आजादी का उदघोश है । ‘कोदूराम दलित‘ छत्तीसगढ़ी में कहते हैं –


अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी
कतको झिन मन चल देइन, आइस अब हमरो बारी ।

हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल‘ अवधी में कहते हैं-

मनई बन मनई का प्यार दे,
भेद जाति धर्म कै बिसार दे,
गंगा कै नीर गुन गाये
देसवा कै पीर गुन गाये।

    आदिकाल से आज पर्यंत साहित्य पर बोलियों का प्रभाव बना हुआ है भक्तिकाल भक्तिपरक तो स्वतंत्रता आंदोलन में आजादी के गीत तदुपरांत समाज के विभिन्न कुरीतियों पर कटाक्ष लोकजागरण के स्वर लोकभाशा से साहित्य तक संचरित हुये हैं ।  आजादी के पष्चात प्रचार-तंत्र टी.वी. मीडि़या, रेडि़यो, समचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाओं के विकास के साथ-साथ अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी हरियाणवी बोलियों में उच्चकोटि के रचनाएं गीत लोकगीत सामने आये । हबीब भारती की हरियाणवी रचना दृष्‍टव्य है-

हे दुनिया जिसनै हीणा समझै उसकी गैल पडै़ सै।
हे बान बैठणा ब्याह करवाणा हे बस मैं मेरै कडै़ सै।
हे ना बूज्झैं करैं सगाई, टोह कै ठोड़-ठिकाणा
हे घाल जेवड़ा गेल्यां कर दें, पडै़ लाजिमी जाणा
हे जिस दिन दे दें धक्का बेबे, आगै हुकम बजाणा
हे यो तो बेबे घर अपणा सै, आगै देश बिराणा
हे को दिन रहल्यूं मां धोरै या जितणै पार पडै़ सै

बोली और उपभाषा की अनेक ऐसी रचनाएं हैं, जिनके बल पर हिन्दी को आजअंतर्राष्‍ट्रीय पहचान प्राप्त हुआ । निष्‍कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से हिन्दी को उनके सहगामी बोलियां समृद्ध बनाने में सदा से महत्वपूर्ण योगदान देते आ रही हैं ।