कुछ मुक्‍तक

तुम समझते हो तुम मुझ से दूर हो ।
जाकर वहां अपने में ही चूर हो ।।
तुम ये लिखे हो कैसी पाती मुझे,
समझा रहे क्यों तुम अब मजबूर हो ।।

चंद मुक्‍तक

तुझे जाना कहां है जानता भी है ।
चरण रख कर डगर को मापता भी है ।।
यहां बैठे हुये क्यों बुन रहे सपने,
निकल कर ख्वाब से तू जागता भी है ।

गज़ल-या र‍ब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नहीं

लगता मुझे तो खुद का इबादत ही ढोंग सा
अपना भी कोई खास निशाना तो है नहीं