Posted in मुक्‍तक, साहित्‍य रत्‍न

कुछ मुक्‍तक

1. लफंगे

काया कपड़े विहीन नंगे होते हैं ।
झगड़ा कारण रहीत दंगे होते हैं।।
जिनके हो सोच विचार ओछे दैत्यों सा
ऐसे इंसा ही तो लफंगे होते हैं ।।

2. प्यार में मजबूर

तुम समझते हो तुम मुझ से दूर हो ।
जाकर वहां अपने में ही चूर हो ।।
तुम ये लिखे हो कैसी पाती मुझे,
समझा रहे क्यों तुम अब मजबूर हो ।।

3. औकात

कोई सुने ना सुने राग अपना सुनाना है ।
रह कर अकेले भी अपना ये महफिल सजाना है ।
परवाह क्यों कर किसी का करें इस जमाने में
औकात अपनी भी तो इस जहां को दिखाना है ।।

4. किसान

खून पसीना सा जो बहाते, वीर ऐसा नही देखा ।
पेट भरे जो तो दूसरो का, धीर ऐसा नही देखा ।
अन्न उगाते जो चीर कर धरती, कृषक कहाते हैं ।
विष भी पचाते है जो धरा में, हीर ऐसा नही देखा ।
(हीर-शंकर जी)

5. प्यार करना पड़ता है

अनदेखे अनसुने से हो जाये प्यार ऐसा नही देखा ।
आये ना सामने उससे हो तकरार ऐसा नही देखा ।।
तुझको करना पड़े है पहले से प्यार हो तो नही जाता ।
खुद-बा-खुद जल उठे तीली बेगार ऐसा नही देखा ।।

6. साजिश

साजिशों के दौर में किसे कहें हम सच्चा
आदमी ही आदमी को दे रहे हैं गच्चा
स्वार्थ अपनों से ही है दूसरों का क्या
देख लो घर में लोभ में बाजार जाता बच्चा
-रमेश चौहान
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चंद मुक्‍तक

1. चिंता

बड़े बड़े महल अटारी और मोटर गाड़ी उसके पास
यहां-वहां दुकानदारी और खेती-बाड़ी उसके पास ।
बिछा सके कहीं बिछौना इतना पैसा गिनते अपने हाथ,
नहीं कहीं सुकुन हथेली, चिंता कुल्हाड़ी उसके पास ।।

ख्‍वाब

तुझे जाना कहां है जानता भी है ।
चरण रख कर डगर को मापता भी है ।।
यहां बैठे हुये क्यों बुन रहे सपने,
निकल कर ख्वाब से तू जागता भी है ।

आदमी से वास्‍ता

ऊंचाई छूता हुआ खजूर, छाँव नहीं देता ।
तेजी से बहता हुआ झकोर, ठाँव नही देता ।।
जो दौलत में चूर है उसे क्या आदमी से वास्ता ।
ऊंची कोठी झोपड़ी को देख, भाव नहीं देता ।।

आदमी

ऊंचाई छूता हुआ खजूर, छाँव नहीं देता ।
तेजी से बहता हुआ झकोर, ठाँव नही देता ।।
जो दौलत में चूर है उसे क्या आदमी से वास्ता ।
ऊंची कोठी झोपड़ी को देख, भाव नहीं देता ।।

क्रोध

क्रोध में जो काँपता, कोई उसे भाते नहीं ।
हो नदी ऊफान पर, कोई निकट जाते नहीं ।
कौन अच्छा औ बुरा को जांच पाये होष खो
हो घनेरी रात तो साये नजर आते नहीं।

कौन हो तुम

कहो ना कहो ना मुझे कौन हो तुम ,
सता कर सता कर मुझे मौन हो तुम ।
कभी भी कहीं का किसी का न छोड़े,
करे लोग काना-फुँसी पौन हो तुम ।।
(पौन=प्राण)
-रमेश चौहान
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गज़ल-या र‍ब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नहीं

या रब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नहीं
क्यों फिर भी कहते तेरा ठिकाना तो है नहीं

कण कण वजूद है तो तुम्हारा सभी कहे
माने भी ऐसा कोई सयाना तो है नहीं

सुख में भुला पुकारे तुझे दुख में आदमी
नायाब उनका कोई बहाना तो है नहीं

भटके रहे जो माया के पीछे यहीं कहीं
कोई भला खुदा का दिवाना तो है नहीं

लगता मुझे तो खुद का इबादत ही ढोंग सा
अपना भी कोई खास निशाना तो है नहीं

-रमेश चौहान