Posted in नवगीत, साहित्‍य रत्‍न

नवगीत-घुला हुआ है वायु में मीठा-सा विष गंध

घुला हुआ है
वायु में,
मीठा-सा विष गंध

जहां रात-दिन धू-धू जलते,
राजनीति के चूल्हे
बाराती को ढूंढ रहे हैं,
घूम-घूम कर दूल्हे
बाँह पसारे
स्वार्थ के
करने को अनुबंध
भेड़-बकरे करते जिनके,
माथ झुका कर पहुँनाई
बोटी - बोटी करने वह तो
सुना रहा शहनाई
मिथ्या- मिथ्या
प्रेम से
बांध रखे इक बंध
हिम सम उनके सारे वादे
हाथ रखे सब पानी
चेरी, चेरी ही रह जाती
गढ़कर राजा -रानी
हाथ जले हैं
होम से
फँसे हुये हम धंध।
-रमेश चौहान