Posted in तुकांत कविता, साहित्‍य रत्‍न

अपनी कलम की नोक से

अपनी कलम की नोक से,
क्षितिज फलक पर,
मैंने एक बिंदु उकेरा है ।
भरने है कई रंग,
अभी इस फलक पर,
कुंचे को तो अभी हाथ धरा है ।
डगमगाती पांव से,
अंधेरी डगर पर,
चलने का दंभ भरा है ।
निशा की तम से,
चलना है उस पथ पर,
जिस पथ पर नया सबेरा है ।
राही कोई और हो या न सही,
अपनी आशा और विश्वास पर,
अपनो का आशीष सीर माथे धरा है ।
-रमेश चौहान