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कुण्‍डलियां छंद की परिभाषा उदाहरण सहित

कुण्‍डलियां छंद-

कुण्‍डलियां छंद की परिभाषा  उदाहरण सहित
कुण्‍डलियां छंद की परिभाषा उदाहरण सहित

कुंडलियां छंद एक विषम मात्रिक छंद है । जिसमें 6 पद 12 चरण होते हैं । यद्यपि सभी 6 पदों में 24-24 मात्राएं होती हैं किन्‍तु प‍हले दो पदों में 13,11 यति से चौबीस मात्राएं होती हैं जबकि शेष चारों पदों में 13,11 यति पर चौबीस मात्राएं होती हैं । वास्‍तव में कुंडलियां छंद दोहा और रोला दो छंदों के मेल से बनता है । कुंडिलयां में पहले दोहा फिर रोला आता है । दोहा में 13,11 के यति से 24 मात्राएं होती हैं जबकि रोला में 11,13 यति पर 24 मात्राएं होती हैं ।

कुण्‍डलियां छंद में कुण्‍डलियां छंद की परिभाषा-

दोहा रोला जोड़कर, रच कुण्‍डलियां छंद ।
 सम शुरू अंतिम शब्द हो, प्रारंभ अंतिम बंद ।।
 प्रारंभ अंतिम बंद, शब्द तो एकही होते ।
 दोहा का पद अंत, प्रथम पद रोला बोते ।।
 तेरह ग्यारह भार, छंद रोला में सोहा ।
 ग्यारह तेरह भार, धरे रखते हैं दोहा ।।

कुण्‍डलियां की विशेषताएं-

उपरोक्‍त परिभाषा से कुंडलियां के निम्‍न लक्षण या विशेषताएं कह सकते हैं-

  1. कुण्‍डलियां में 6 पद अर्थात 6 पंक्ति होती है ।
  2. पहले दो पद दोहा के होते हैं ।
  3. शेष चार पद रोला के होते हैं ।
  4. दोहा का अंतिम (चौथा) चरण ज्‍यों का त्‍यों रोला का प्रथम चरण होता है ।
  5. कुण्‍डलियां के पांचवें पद के पहले चरण में कवि का नाम आता है ।
  6. कुण्‍डलियां जिस शब्‍द या शब्‍द समूह से प्रारंभ हुआ है उसी से उसका अंत होता है ।

दोहा छंद-

दोहा एक विषम मात्रिक छंद है । इसमें दो पद और चार चरण होते हैं । इनके विषम चरणों 13 मात्राएं और सम चरणों 11 मात्राएं कुल 24 मात्राएं होती हैं । चारों चरणों की ग्‍यारहवीं मात्रा निश्चित रूप से लघु होना चाहिये । विषम चरण का प्रारंभ जगण अर्थात लघु-गुरू-लघु से नहीं किया जाता है । सम चरण का अंत गुरू-लघु से समतुक से होता है ।

दोहा छंद की परिभाषा दोहा छंद में –

चार चरण दो पंक्ति में, होते दोहा छंद ।
तेरह ग्‍यारह भार भर, रच  लो हे मतिमंद ।।

ग्‍यारहवीं मात्रा होय जी, नि‍श्चित ही लघु भार ।
 आदि जगण तो त्‍याज्‍य है, आखिर गुरू-लघु डार ।

कुण्‍डलियां छंद में दोहा का गुणधर्म-

भरिये दोहा छंद में, ग्यारह तेरह भार ।
 चार चरण दो पंक्ति में, आखिर गुरू लघु डार ।।
 आखिर गुरू लघु डार, चरण सम ग्यारह होवे ।
 विशम चरण में भार अधि, भार तेरह को ढोवे ।
 सुन लो कहे ‘रमेश’, ध्यान धरकर मन धरिये ।
 सभी ग्यारवीं भार, मात्र लघु मात्रा भरिये ।।

दोहा छंद की विशेषताएं-

  1. दोहा छंद में चार चरण और दो पद होते हैं ।
  2. पहले और तीसरे चरण को विषम चरण कहते हैं, दूसरे और चौथे चरण को समचरण कहते हैं ।
  3. विषम चरण में 13-13 मात्राएं होती हैं ।
  4. सम चरण में 11-11 मात्राएं होती हैं ।
  5. चारों चरणों की ग्‍यारहवी मात्रा निश्चित रूप से लघु होना चाहिये ।
  6. विषम चरण के आदि में जगण वर्जित है ।
  7. सम चरण का अंत गुरू-लघु से होना अनिवार्य है ।
  8. सम चरण के अंत के गुरू-लघु का समतुकांत होना भी अनिवार्य है ।

रोला छंद-

रोला छंद भी एक विषम मात्रिक छंद है । इसमें आठ चरण और चार पद होते हैं । विषम चरणों में 11-11 मात्राएं और सम चरणों में 13-13 मात्राएं होती हैं । दोहा के मात्रा के उलट मात्रा रोला में होने के कारण कई लोग इसे दोहा का विलोम भी कह देते हैं जो सही नहीं है । दोहा का विलोम सोरठा होता है रोला नहीं । दोहा के चरणों को उलट देने से सोरठा बनता है ।

रोला छंद में रोला छंद की परिभाषा-

आठ चरण पद चार, छंद रोला में भरिये ।
ग्‍यारह तेरह भार,  विषम सम  चरणन धरिये ।
विषम चरण का अंत, भार गुरू-लघु ही आवे । 
त्रिकल भार सम आदि, अंत  चौकल को  भावेे।। 

कुण्‍डलियां छंद में रोला छंद का गुणधर्म-

रोला दोहा के उलट, ग्यारह तेरह भार ।
 भेद चरण में होत है, आठ चरण पद चार ।
 आठ चरण पद चार, छंद रोला में भावे ।
 विषम चरण के अंत, दीर्घ लघु निश्चित आवे ।।
 सुन लो कहे ‘रमेश’, त्रिकल सम के शुरू होला ।
 चौकल सम के अंत, बने तब ना यह रोला ।।

रोला छंद की विशेषताएं-

  1. रोला में चार पद और आठ चरण होते हैं ।
  2. विषम चरणों 11-11 मात्राएं और सम चरणों में 13-13 मात्राएं होती हैं ।
  3. विषम चरण का अंत गुरू-लघु होना चाहिये । कहीं-कहीं विषम चरण के अंत में नगण भी देखा गया है किन्‍तु गुरू लघु को श्रेष्‍ठ माना जाता है ।
  4. सम चरण का प्रारंभ त्रिकल अर्थात 3 मात्रा भार से होना चाहिये ।
  5. सम चरण का अंत चौकल अर्थात चार मात्रा से होना चाहिये । अंत में दो गुरू को श्रेष्‍ठ माना जाता है ।
  6. अंत के इस चौकल में समतुकांतता होना चाहिये ।

कुण्‍डलियां छंद की रचना-

पहले दोहा लेना-

भारत मॉं वीरों की धरा, जाने सकल जहान ।
 मातृभूमि के लाड़ले, करते अर्पण प्राण  ।।

दोहा के अंतिम चरण का रोला का प्रथम चरण होना-

उपरोक्‍त दोहा में अंतिम चरण ‘करते अर्पण प्राण’ आया है इसलिये रोला इसी से शुरू होगा-

करते अर्पण प्राण, पुष्‍प सम शिश हाथ धरे ।
 बन शोला फौलाद,शत्रु दल पर वार करे ।  
 सुनलो कहे ‘रमेश‘, देश में लिखे इबारत ।
 इस धरती का नाम, पड़ा क्यों आखिर भारत ।।

पांचवें पद में कवि का नाम आना-

करते अर्पण प्राण, पुष्‍प सम शिश हाथ धरे ।
 बन शोला फौलाद,शत्रु दल पर वार करे ।  
 सुनलो कहे ‘रमेश‘, देश में लिखे इबारत ।
 इस धरती का नाम, पड़ा क्यों आखिर भारत ।।

दोहा के पहले शब्‍द या शब्‍द समूह से रोला का अंत होना-

दोहा का प्रथम शब्‍द ‘भारत’ है, इसलिये रोला का अंत ‘भारत’ से ही होगा ।

करते अर्पण प्राण, पुष्‍प सम शिश हाथ धरे ।
 बन शोला फौलाद,शत्रु दल पर वार करे ।  
 सुनलो कहे ‘रमेश‘, देश में लिखे इबारत ।
 इस धरती का नाम, पड़ा क्यों आखिर भारत ।।

संपर्ण कुण्‍डलियां-

भारत मॉं वीरों की धरा, जाने सकल जहान ।
 मातृभूमि के लाड़ले, करते अर्पण प्राण  ।।
करते अर्पण प्राण, पुष्‍प सम शिश हाथ धरे ।
 बन शोला फौलाद,शत्रु दल पर वार करे ।  
 सुनलो कहे ‘रमेश‘, देश में लिखे इबारत ।
 इस धरती का नाम, पड़ा क्यों आखिर भारत ।।
-रमेश चौहान
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दोहे

सुबह सवेरे जागिए
सुबह सवेरे जागिए

दोहे- सुबह सवेरे जागिए

सुबह सवेरे जागिए, जब जागे हैं भोर ।
समय अमृतवेला मानिए, जिसके लाभ न थोर ।।

जब पुरवाही बह रही, शीतल मंद सुगंध ।
निश्चित ही अनमोल है, रहिए ना मतिमंद ।।

दिनकर की पहली किरण, रखता तुझे निरोग ।
सूर्य दरश तो कीजिए, तज कर बिस्तर भोग ।।

दीर्घ आयु यह बांटता,  काया रखे निरोग ।
जागो जागो मित्रवर, तज कर मन की छोभ ।।

दोहे चिंतन के-

शांत हुई ज्योति घट में, रहा न दीपक नाम ।
 अमर तत्व निज पथ चला, अमर तत्व से काम ।।

धर्म कर्म धर्म, कर्म का सार है, कर्म धर्म का सार ।
 करें मृत्‍यु पर्यन्‍त जग, धर्म-कर्म से प्‍यार ।।

दुनिया भर के ज्ञान से, मिलें नहीं संस्‍कार ।
 अपने भीतर से जगे, मानवता उपकार ।।

डाली वह जिस पेड़ की, उससे उसकी बैर ।
 लहरायेगी कब तलक, कबतक उसकी खैर ।

जाति मिटाने देश में, अजब विरोधाभास ।
 जाति जाति के संगठन, करते पृथ्‍क विलास ।।

सकरी गलियां देखकर, शपथ लीजिये एक ।
 बेजाकब्‍जा छोड़कर, काम करेंगे नेक ।।

शिक्षक निजि स्कूल का, दीन-हीन है आज ।
 भूखमरी की राह पर, चले चले चुपचाप ।।

-रमेश चौहान
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इंडिया के कैद में भारत

चौपाई छंद

इंडिया के कैद में भारत
इंडिया के कैद में भारत
देव भूमि गांवों का भारत । भरत वंश का गौरव धारक
प्रतिक इंड़िया अंग्रेजो का । स्वाभिमान छिने पूर्वजों का

भौतिकता में हम फंसे हैं । गांव छोड़ कर शहर बसे हैं
अपना दामन मैला लगता । दाग शहर का कुछ ना दिखता

ढोल दूर के मोहित करते। निज बॉंसुरी बेसुरे लगते
कोयल पर कौआ भारी है । गरल सुधा सम अब प्यारी है

दिवस दिवाने अब रात जगे । उल्लू भी अब हैं ठगे-ठगे
पूरब का सूरज भटका है । पश्चिम में जैसे अटका है

दादा परदादा भारत वंशी । बेटा पोता विसरे बंशी
गुलाम हो वो आजाद रहे । हम अंग्रेजो के चरण गहे

इंड़िया लगे अब तो भारी । सिसक रही संस्कृती हमारी
बने कुरीति रीति हमारे । आंग्ल हिन्द पर डोरा डाले

इंड़िया का कैदी भारत । घर-घर में छिड़ा महाभारत
रिश्ते नाते छूट रहे हैं । लोक लाज अब टूट रहे हैं
-रमेश चौहान
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देेेेशभक्ति का चंदन सजे, नित्‍य हमारे भाल में

देश भक्ति का चंदन सजे, नित्‍य हमारे भाल में

Desh bhakti
Desh bhakti

उल्‍लाल छंद

देश हमारा हम देश के, देश हमारा मान है ।
मातृभूमि ऊंचा स्वर्ग से, भारत का यश गान है ।।

देश एक है सागर गगन एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

धर्म हमारा हम धर्म के, जिस पर हमें गुमान है ।
धर्म-कर्म जीवन में दिखे,जो खुद प्रकाशवान है ।।

फंसे रहेंगे कब तलक हम, पाखंडियों के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

जाति हमारी हम जाति के, जिस पर हम को मान है ।।
जाति-पाति से पहले वतन, ज्यों काया पर प्राण है ।।

बटे रहेंगे कब तलक हम, जाति- पाति जंजाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

अपने का अभिमान है जब, दूजे का भी मान हो ।
अपना अपमान बुरा लगे जब, दूजे का भी भान हो ।।

फंसे रहेंगे कब तलक हम, नेताओं के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

देवनागरी लिपि में लिखें, निज हिंदी की शान में ।
मोह दूसरों का छोड़ कर, खुश रहिए निज मान में ।।

देश एक है सागर गगन एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

-रमेश चौहान
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रमेश चौहान के ‘चिंतन के 25 दोहे’

आजादी रण शेष है

आजादी रण शेष है-

आजादी रण शेष है, हैं हम अभी गुलाम ।
आंग्ल मुगल के सोच से, करे प्रशासन काम ।।

मुगलों की भाषा लिखे, पटवारी तहसील ।
आंग्लों की भाषा रटे, अफसर सब तफसील ।।

लोकतंत्र में देश का, अपना क्या है काम ।
भाषा अरू ये कायदे, सभी शत्रु के नाम ।।

ना अपनी भाषा लिये, ना ही अपनी सोच ।
आक्रांताओं के जुठन, रखे यथा आलोच ।।

लाओं क्रांति विचार में, बनकर तुम फौलाद ।
निज चिंतन संस्कार ही, करे हमें आजाद ।

बढ़े महंगाई-

निर्भरता व्यवसाय पर, प्रतिदिन बढ़ती जाय ।
ये उपभोक्ता वाद ही, भौतिकता सिरजाय ।।

मूल्य नीति व्यवसाय का, हमें समझ ना आय ।
दस रूपये के माल को, सौं में बेचा जाय ।।

कभी व्यपारी आंग्ल के, लूट लिये थे देश ।
बढ़े विदेशी माल फिर, बांट रहे हैं क्लेश ।।

अच्छे दिन के स्वप्न को, ढूंढ रहे हैं लोग ।
बढ़े महंगाई कठिन, जैसे कैंसर रोग ।।

टेक्स हटाओं तेल से, सस्ता कर दो दाम ।
जोड़ो टेक्स शराब पर, चले बराबर काम ।।

प्रकृति और विज्ञान-

प्रकृति और विज्ञान में, पहले आया कौन ।
खोज विज्ञान कर रहा, सत्य प्रकृति है मौन ।।

समय-समय पर रूप को, बदल लेत विज्ञान ।
कणिका तरंग जान कर, मिला द्वैत का ज्ञान ।।

सभी खोज का क्रम है, अटल नही है एक ।
पहले रवि था घूमता, अचर पिण्ड़ अब नेक ।।

नौ ग्रह पहले मान कर, कहते हैं अब आठ ।
रंग बदल गिरगिट सदृश, दिखा रहे हैं ठाठ ।।

जीव जन्म लेते यथा, आते नूतन ज्ञान ।
यथा देह नश्वर जगत, नश्वर है विज्ञान ।।

सेवक है विज्ञान तो, इसे न मालिक मान ।
साचा साचा सत्य है, प्रकृति पुरुष भगवान ।।

कोटि कोटि है देवता, कोटि कोटि है संत ।
केवल ईश्वर एक है, जिसका आदि न अंत ।।

पंथ प्रदर्शक गुरु सभी, कोई ईश्वर तुल्य ।
फिर भी ईश्वर भिन्न है, भिन्न भिन्न है मूल्य ।।

आँख मूंद कर बैठ जा, नही दिखेगा दीप ।
अर्थ नही इसका कभी, बूझ गया है दीप ।।

बालक एक अबोध जब, नही जानता आग ।
क्या वह इससे पालता, द्वेष या अनुराग ।।

मीठे के हर स्वाद में, निराकार है स्वाद ।
मीठाई साकार है, यही द्वैत का वाद ।।

जिसको तू है मानता, गर्व सहित तू मान ।
पर दूजे के आस को, तनिक तुच्छ ना जान ।।

कितने धार्मिक देश हैं, जिनका अपना धर्म ।
एक देश भारत यहां, जिसे धर्म पर शर्म ।।
-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

करें मुकाबला चीन से अब

दोहे-

तोड़ें उसके दंभ को, दिखा रहा जो चीन ।
चीनी हमें न चाहिये, खा लेंगे नमकीन ।।

सरसी छंद-

सुनो सुनो ये भारतवासी, बोल रहा है चीन ।
भारतीय बस हल्ला करते, होतें हैं बल हीन ।।

कहां भारतीयों में दम है, जो कर सके बवाल ।
घर-घर तो में अटा-पड़ा है, चीनी का हर माल ।।

कहां हमारे टक्कर में है, भारतीय उत्पाद ।
वो तो केवल बाते करते, गढ़े बिना बुनियाद ।।

कमर कसो अब वीर सपूतो, देने उसे जवाब ।
अपना तो अपना होता है, छोड़ो पर का ख्वाब ।।

नही खरीदेंगे हम तो अब, कोई चीनी माल ।
सस्ते का मोह छोड़ कर हम, बदलेंगे हर चाल ।।

भारत के उद्यमियों को भी, करना होगा काम ।
करें चीन से मुकाबला अब, देकर सस्ते दाम ।।
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छंद साहित्‍य रत्‍न

हिन्‍दी दिवस पर छंदमाला

Hindi Diwas
Hindi diwas

दोहे-

हिन्दी भाषी भी यहां, देवनागरी छोड़ ।
रोमन में हिन्दी लिखें, अपने माथा फोड़ ।।
देश मनाये हिन्दी दिवस, जाने कितने लोग ।
जाने सो माने नहीं, कैसे कहें कुजोग।।
देवनागरी छोड़ के, रोमन लिखे जमात ।
माॅं के छाती पर यथा, मार रहे हों लात ।।
दफ्तर दफ्तर देख लो, या शिक्षण संस्थान ।
हिन्दी कहते हैं किसे, कितनों को पहचान ।।
घाल मेल के रोग से, हिन्दी है बीमार ।
अँग्रेजी आतंक से, कौन उबारे यार ।।
हिन्दी की आत्मा यहाँ, तड़प रही दिन रात ।
देश हुये आजाद है, या है झूठी बात ।।
पहले हिन्दी हिन्द को, आप दीजिये मान ।
फिर भाषा निज प्रांत की, बोले आप सुजान ।।
प्रांत प्रांत से देश है, प्रांत देश का मान ।
ऊपर उठकर प्रांत से, रखें देश का भान ।।

दोहा मुक्तक-

फँसी हुई है जाल में, हिन्दी भाषा आज ।
अँग्रेजी में रौब है, हिन्दी में है लाज ।।
लोकतंत्र के तंत्र सब, अंग्रेजी के दास ।
अपनी भाषा में यहां, करे न कोई काज ।।

कुण्डलियां-

हिन्दी बेटी हिन्द की, ढूंढ रही सम्मान ।
ग्राम नगर व गली गली, धिक् धिक् हिन्दुस्तान ।
धिक् धिक् हिन्दुस्तान, दासता छोड़े कैसे ।
सामंती पहचान, बेड़ियाँ तोड़े कैसे।।
कह ‘रमेश‘ समझाय, करें माथे की बिन्दी ।
बन जा धरतीपुत्र, बड़ी ममतामय हिन्दी ।।
हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, लोक मन हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
मातृभाषा की बोल, खिले जस माथे बिन्दी ।।
भाषा-बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।

त्रिभंगी छंद-

भाषा यह हिन्दी, बनकर बिन्दी, भारत मां के, माथ भरे ।
जन मन की आशा, हिन्दी भाषा, जाति धर्म को, एक करे ।।
कोयल की बानी, देव जुबानी, संस्कृत तनया, पूज्य बने ।
एक दिवस ही क्यों, पर्व लगे ज्यों, निशदिन निशदिन, कंठ सने ।।
-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

पाँच प्रेरक कुण्‍डलियां Five Motivational kundaliyan

पाँच प्रेरक कुण्‍डलियां Five Motivational kundaliyan
पाँच प्रेरक कुण्‍डलियां Five Motivational kundaliyan (Photo by Pexels.com)

प्रेरक कुण्‍डलियां-

कठिनाई सर्वत्र है, चलें किसी भी राह ।
भ्रम बाधा सब तोड़िये, मन में भरकर चाह ।।
मन में भरकर चाह, बढ़ें मंजिल को पाने ।
नहीं कठिन वह राह इसे निश्चित ही जाने ।।
सुनलो कहे ‘रमेश’, हौसला है चिकनाई ।
हो यदि दृढ़ संकल्प, बचे ना कुछ कठिनाई ।।

मुश्किल भारी है नही, देख तराजू तौल ।
आसमान की दूरियां, अब है नहीं अतौल ।।
अब है नहीं अतौल, नीर जितने सागर में ।
लिये हौसले हाथ, समेटे हैं गागर में ।।
कहे बात ‘चैहान’, हौसला है बनवारी ।
रखें आप विष्वास, नहीं है मुश्किल भारी ।।

पाना हो जो लक्ष्य को, हिम्मत करें बुलंद ।
ध्येय वाक्य बस है यही, कहे विवेकानंद ।।
कहे विवेकानंद, रूके बिन चलते रहिये ।
लक्ष्य साधने आप, पीर तो थोड़ा सहिये ।
विनती करे ‘रमेष‘, ध्येय पथ पर ही जाना ।
उलझन सारे छोड़, लक्ष्य को जो हो पाना ।।

एक अकेले जूझिये, चाहे जो कुछ होय ।
समय बुरा जब होत है, बुरा लगे हर कोय ।
बुरा लगे हर कोय, साथ ना कोई देते ।
तब ईश्वर भी स्वयं, परीक्षा दुश्कर लेते ।।
छोड़ें देना दोष, जगत के सभी झमेले ।
सफल वही तो होय, बढ़े जो एक अकेले ।।

होते सकल जहान में, तीन तरह के लोग ।
एक समय को भूल कर, भोग रहे हैं भोग ।।
भोग रहे हैं भोग, जगत में असफल होकर ।
कोस रहें हैं भाग्य, रात दिन केवल सो कर ।।
एक सफल इंसान, एक पल ना जो खोते ।
कुछ ही लोग महान, समय से आगे होते ।
-रमेश चौहान
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शिक्षक दिवस पर कुछ दोहे

दोहे-

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लगते अब गुरूपूर्णिमा, बिते दिनों की बात ।
मना रहे शिक्षक दिवस, फैशन किये जमात ।

शिक्षक से जब राष्ट्रपति, हुये व्यक्ति जब देश।
तब से यह शिक्षक दिवस, मना रहा है देश ।

कैसे यह शिक्षक दिवस, यह नेताओं का खेल ।
किस शिक्षक के नाम पर, शिक्षक दिवस सुमेल ।।

शिक्षक अब ना गुरू यहां, वह तो चाकर मात्र ।
उदर पूर्ति के फेर वह, पढ़ा रहा है छात्र ।

‘बाल देवो भव‘ है लिखा, विद्यालय के द्वार ।
शिक्षक नूतन नीति के, होने लगे शिकार ।

शिक्षक छात्र न डाटिये, छात्र डाटना पाप ।
सुविधाभोगी छात्र हैं, सुविधादाता आप ।।

कौन उठाये अब यहां, कागजात के भार ।
शिक्षक करे पुकार है, कैसे हो उद्धार ।।

हुये एक शिक्षक यहां, देश के प्रेसिडेंट ।
मना रहे शिक्षक दिवस, तब से यहां स्टुडेंट ।।

सारे शिक्षक साथ में, करें व्यवस्था देख ।
आज मनाने टीचर्स डे, नेता आये एक ।।

क्षिक्षा एक व्यपार है, शिक्षक कहां सुपात्र ।
प्रायवेट के नाम पर, शिक्षक नौकर मात्र ।।
-रमेश चौहान
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मतगयंद सवैया-“सुंदर से अति सुंदर श्यामा”

मतगयंद सवैया-

भारतीय छंद विधा में सवैया का अपना विशेष महत्व होता है । अनेक कवियों ने सवैया में अपनी रचनाएं किये हैं । इसमें दो प्रसिद्ध रचनाओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहूंगा । एक नरोतम दास की प्रसिद्ध रचना सुदामा चरित-

शीश पगा न झगा तन में प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा

दूसरा बाबा तुलसीदास के हनुमान अष्टक-

को नहीं जानत है जग में प्रभु संकट मोचन नाम तिहारो

यह दोनों ही उदाहरण मतगयंद सवैया से हैं । मतगयंद सवैया में चार पद होते हैं, प्रत्येक पद में सात भगन (गुरु लघु लघु-211) के बाद दो गुरु आता है और चारों पद के अंत में समतुकांत होता है।

इसी मतगयंद सवैया पर मैंने भी प्रयास किया है । अपने इस प्रयास को आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए आपके सुझावों की कामना करता हूं-

सुंदर से अति सुंदर श्यामा (मत्तगयंद सवैया)

सुंदर केशव की छबि सुंदर, सुंदर केश किरीटहि सुंदर
सुंदर कर्णहि कुण्डल सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।
सुंदर मस्तक चंदन सुंदर, सुंदर घ्राण कपोलहि सुंदर ।
सुंदर लोचन भौं अति सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर मोहन का मुख सुंदर, सुंदर ओष्ठ हँसी अति सुंदर
सुंदर भाषण बोलिय सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।
सुंदर गर्दन सुंदर भूषण, सुंदर है पट अम्बर सुंदर ।
सुंदर है उर बाहुहि सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर माधव का पग सुंदर, सुंदर है चलना गति सुंदर ।
सुंदर ठाड़ भये अति सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर है मुरली मुख सुंदर, सुंदर नृत्यहि प्रीतहि सुंदर ।
सुंदर संगत रंगत सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर गोकुल ब्रज सुंदर, सुंदर है यमुना जल सुंदर ।
सुंदर गोप सखा सखि सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर हैं गउवें रज सुंदर, सुंदर पालन धावन सुंदर ।
सुंदर खेलहि मेलहि सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर कृष्णहि सृष्टिहि सुंदर, सुंदर लालन पालन सुंदर ।
सुंदर मारन धावन सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर कृष्ण दयानिधि सुंदर, सुंदर कारज मारग सुंदर ।
सुंदर है चरित्र तन सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
-रमेश चौहान