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प्रेम के दोहे

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दुनिया की यह रीत है, होते सबको प्रीत ।
समझे जिसको हार तू, होती तेरी जीत ।।
मेहंदी तेरे नाम की, रचा रखी है हाथ ।
जीना मरना है मुझे, अब तो तेरे साथ ।।
रूठी हुई थी भाग्य जो, मोल लिया अब शूल ।
तेरे कारण जगत को, मैंने समझी धूल ।।
तेरे मीठे बोल से, हृदय गई मैं हार ।
तेरे निश्चल प्रीत पर, तन मन जाऊँ वार ।।
देखा जब से मैं तुझे, सुध-बुध गई विसार ।
मीरा बन मैं श्याम पर, सब कुछ किया निसार ।।
खोले सारे भेद को, मेरे दोनों नैन ।
नहीं नुपुर भी मौन है, बोले मीठी बैन ।
प्रिये तुझे मैं क्या दूॅ , नित नूतन उपहार ।
सौंप दिया मैं तो तुझे, निज जीवन पतवार ।।
मूरत प्यारी चांद सम, श्याम मेघ सम केश ।
अधर पुष्प की पंखुड़ी, आंखों पर संदेश ।
अफसाना ये प्यार का, जाने ना बेदर्द ।
हम हँस हँस सहते रहे, बांट रही वह दर्द।।
लम्हा लम्हा इश्क में, बहाते रहे अश्क ।
इश्‍क इश्‍क है बेखुदी, इसमें कैसा रश्क ।।
वो तो खंजर घोपने, मौका लेती खोज ।
उनकी लंबी आयु की, करूं दुवा मैं रोज ।।
अश्क दिये आश्की सदा, तन्हा जीवन यार ।
जिगर लगे जब मोम का, कभी न करना प्यार ।।
-रमेश चौहान
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देशभक्ति कविता- ‘तन मन माँ को कर दो अर्पण’

(चौपाई)

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शहिदों का बलिदान पुकारे ।
यक्ष प्रश्न वे एक विचारे ।।
जन्म-जन्म का मेरा नाता ।
आज दुखी क्यों भारत माता ।।
जागो मेरे जवान बेटो ।
भारत माता का दुख मेटो ।
सोते क्यों हो पैर पसारे
जब छलनी है सीने हमारे ।
कफन बांध हम तो थे रण पर ।
कमर कसो तुम भी इस पल पर ।
तब बैरी अंग्रेज अकेले ।
आज शत्रुओं के दिखते मेले । ।
सीमा के अंदर बाहर हैं ।
बैरी तो सारे कायर हैं ।।
कहीं नक्सली आतंकी हैं ।
कहीं पाक के पातंकी हैं ।।
चीन पाक नापाक इरादे ।
अंदर बाहर इनके प्यादे ।।
आस राजनेता का छोड़ो ।
खुद बैरी के मुख को तोड़ो ।।
वक्त कहां है अब सोने का ।
नहीं वक्त अवसर खोने का ।
धरा तुम्हारी देश तुम्हारे ।
तुम ही माली अरू रखवारे ।।
नश्वर जीवन, शाश्वत कर लो ।
माँ की मिट्टी माथे भर लो ।।
समय नहीं जो देखो दर्पण ।
तन मन माँ को कर दो अर्पण ।
-रमेश चौहान
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गणेश चालीसा

दोहा

प्रथम पूज्य गणराज को, प्रथम नमन कर जोर ।
जिनकी करूणामय दया, करते हमें सजोर ।।
श्रद्धा और विश्वास से, पूजे जो गणराज ।
करते वे निर्विघ्न सब, पूरन अपने काज ।।

चौपाई

हे गौरा गौरी के लाला । हे लंबोदर दीन दयाला
सबसे पहले तेरा सुमरन । करते है हम वंदन पूजन

हे प्रभु प्रतिभा विद्या दाता । भक्तों के तुम भाग्य विधाता
वेद पुराण सभी गुण गाये। तेरी महिमा भक्त सुनाये

सकल सृष्टि का करने फेरा । मात-पिता को करके डेरा
प्रदक्षिणा प्रभुवर आप किये । सकल सृष्टि को नव ज्ञान दिये

गगन पिता सम माता धरती । दिये ज्ञान प्रभु तुम इस जगती
जनक शंभु शिव प्रसन्न हो अति । बना दिये तुम को गणाधिपति

तबसे पहले पूजे जाते । हर पूजन में पहले आते
गौरी गणेश साथ विरोजे । शुभता में अरू शुभता साजे

तुमको सुमरन कर भक्त सभी । करते कारज शुरूआत जभी
सकल काम निर्विघ्न होत है । दया सिंधु की दया जोत है

वक्रतुण्ड़ हे देव गजानन । हे लंबोदर हे जग पावन
मूषक वाहन बैठ गजानन । भोग लहै मोदक मन भावन

रूप मनोहर सबको भाये । भादो महिना भवन बिठाये
जन्मोत्सव तब भक्त मनाते । जयकारा कर महिमा गाते

माँ की ममता तोहे भावे । तोहे मोदक भोग रिझावे
बाल रूप बच्चों को भाये । मंगल मूरत हृदय बिठाये

एकदन्त प्रभु कृपा कीजिये । सद्विचार सद्बुद्धि दीजिये
विकटमेव प्रभु विघ्न मिटाओ । बिगड़े सारे काज बनाओ

गौरी नंदन शिव सुत प्यारे । तुहरी महिमा जग में न्यारे
ज्ञान बुद्धि के अधिपति तुम हो । मति मति में पावन मति तुम हो

ज्ञान बुद्धि के तुम हो दाता । अज्ञानी के भाग्य विधाता
सकल वेद के लेखनकर्ता । अज्ञान तमस के तुम हर्ता

धुम्रवर्ण तेरो तन सोहे । तेरो गज मुख जग को मोहे
रिद्धी-सिद्धी के आपहिं स्वामी । है शुभ-लाभ तनय अनुगामी

रिद्धी-सिद्धी अरू शुभता पाते । कृपा तुम्हारी भक्त हर्षाते
विघ्नों के प्रभु तुम हो हर्ता । पाप कर्म के तुम संहर्ता

प्रभुवर अपनी पुनित भक्ति दें । विमल गंग सम बुद्धि शक्ति दें
मातु-पिता की सेवा कर लें । उनके सब दुख अपने सिर लें

देश भक्ति में कमतर न रहें । मातृभूमि हित हम पीर सहें
मातृभूमि के चरणकमल पर । करूँ कर्म निज प्राण हाथ धर

शक्ति दीजिये इतनी प्रभुवर । कृपा कीजिये गणपित हम पर
मानवता पथ हम सभी चलें । प्राणीमात्र से हम गले मिलें

सभी पापियों के पाप हरो। ज्ञान पुँज उनके भाल भरो
दोषी पापी नहीं पाप है । लोभ मोह का विकट श्राप है

लोभ मोह का प्रभु नाश करें । सकल सुमति प्रभु हृदय भरें
हे प्रभुवर शुभ मंगलदाता । तुहरि कृपा अमोघ विख्याता

नारद शारद महिमा गाये । गवाँर ‘रमेश’ क्या बतलाये
भूल-चूक प्रभु आप विसारें । हम सबके प्रभु भाग सवारें

दोहा

भक्त शरण जब जब गहे, सकल क्लेश मिट जात ।
किये गजानन जब कृपा, सब संभव हो जात ।।
करे मनोरथ पूर्ण सब, मंगल मूर्ति गणेश ।
चरण षरण तन मन धरे, सब विधि दीन ‘रमेश’ ।।
-रमेश चौहान
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घनाक्षरी छंद का संपूर्ण परिचय, घनाक्षरी छंद लिखना सीखें

घनाक्षरी छंद का परिचय-

हिन्दी साहित्य के स्वर्णयुग में जहाँ भावों में भक्ति और अध्यात्म का वर्चस्व था वहीं काव्य शिल्‍प छंद का सर्वत्र प्रभाव था । इस समय दोहा छंद के बाद सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय छंद घनाक्षरी रहा । इतने समय बाद आज भी घनाक्षरी छंद का प्रभाव यथावत बना हुआ है । केवल उसके कथ्य और कहन में अंतर आया है किन्तु शिल्‍प विधान और महत्व यथावत बने हुये हैं । आज ऐसा कोई कवि सम्मेलन शायद ही होते होंगे जिसमें घनाक्षरी छंद नहीं पढ़े जाते होंगे । इसी बात से इस छंद का महत्व का पता चलता है ।

घनाक्षरी छंद का उद्भव-

हिन्दी साहित्य में घनाक्षरी छंद का प्रयोग कब से हो रहें यह ठीक-ठीक कह पाना संभवन नहीं किन्तु हिन्दी साहित्यके स्वर्णिम युग में घनाक्षरी छंद न केवल परिचय होता अपितु प्रचुरता में भी उपलब्ध होता है। घनाक्षरी या कवित्त के नाम से उस समय के प्रायः सभी कवियों ने इस विधा पर अपनी कवितायें लिखी हैं । कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार है :-

जगन्ननाथ प्रसाद ‘रत्नाकर’ की घनाक्षरी रचना –

कोऊ चले कांपि संग कोऊ उर चांपि चले
कोऊ चले कछुक अलापि हलबल से ।
कहै रतनाकर सुदेश तजि कोऊ चलै
कोऊ चले कहत संदेश अबिरल से ॥
आंस चले काहू के सु काहू के उसांस चले
काहू के हियै पै चंद्रहास चले हल से ।
ऊधव के चलत चलाचल चली यौं चल
अचल चले और अचले हूँ भये चल से ।।

तुलसीदास जी की घनाक्षरी रचना-

भक्तिकालिन प्रसिद्व कवि तुलसीदास जी ने हनुमान बाहुक की रचना इसी घनाक्षरी छंद के आधार मान कर किये हैं –

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन.अनुमानि सिसु.केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन.मनए क्रम को न भ्रमए कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधिए लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर.रस धीरज कैए साहस कैए तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।

घनाक्षरी क्या है ?

घनाक्षरी एक वार्णिक छंद है, जिसके चार पद होते हैं, प्रत्येक पद में चार चरण होते हैं पहले तीन चरण में 8-8 वर्ण और चौथे चरण में 7 या 8 या 9 वर्ण होते हैं । अंतिम चरण में वर्णो की संख्या के आधार पर घनाक्षरी के प्रकार का निर्माण होता है ।

घनाक्षरी छंद के प्रकार

घनाक्षरी छंद मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं-

  1. 31 वर्णी घनाक्षरी- जिस घनाक्षरी के पहले तीन चरण में 8-8 वर्ण और सातवें चरण में 7 वर्ण हो कुल प्रत्येक पद में 32 वर्ण होते हैं ।
    जैसे- मनहरण, जनहरण, और कलाधर ।
  2. 32 वर्णी घनाक्षरी- इस घनाक्षरी के चारो चरण में 8-8 वर्ण कुल 32 वर्ण होते हैं ।
    जैसे-जलहरण, रूपघनाक्षरी, डमरू घनाक्षरी, कृपाण घनाक्षरी और विजया घनाक्षरी ।
  3. 33 वर्णी घनाक्षरीः इस घनाक्षरी के पहले तीन चरण में 8-8 वर्ण और चैथै चरण में 9 वर्ण होते हैं !
    जैसे-देवघनाक्षरी

घनाक्षरी छंद की परिभाषा घनाक्षरी छंद में-

आठ-आठ आठ-सात, आठ-आठ आठ-आठ
आठ-आठ आठ-नव, वर्ण भार गिन लौ ।।
आठ-सात अंत गुरू, ‘मन’ ‘जन’ ‘कलाधर’,
अंत छोड़ सभी लघु, जनहरण कहि दौ ।
गुरू लघु क्रमवार, नाम रखे कलाधर
नेम कुछु न विशेष, मनहरण गढ़ भौ ।।
आठ-आठ आठ-आठ, ‘रूप‘ रखे अंत लघु
अंत दुई लघु रख, कहिये जलहरण ।
सभी वर्ण लघु भर, नाम ‘डमरू’ तौ धर
आठ-आठ सानुप्रास, ‘कृपाण’ नाम करण ।।
यदि प्रति यति अंत, रखे नगण-नगण
हो ‘विजया’ घनाक्षरी, सुजष मन भरण ।
आठ-आठ आठ-नव, अंत तीन लघु रख
नाम देवघनाक्षरी, गहिये वर्ण शरण ।।

मनहरण घनाक्षरी-

घनाक्षरी में मनहरण घनाक्षरी सबसे अधिक लोकप्रिय है । इस लोकप्रियता का प्रभाव यहाँ तक है कि बहुत से कवि मित्र भी मनहरण को ही घनाक्षरी का पर्याय समझ बैठते हैं । इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 7 वर्ण होते हैं प्रत्येक पद का अंत गुरू से होना अनिवार्य है किन्तु अंत में लघु-गुरू का प्रचलन अधिक है । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

सुन्दर सुजान पर, मन्थ मुसकान पर, बांसुरी की तान पर, ठौरन ठगी रहै ।
मूरति विषाल पर, कंचनसी माल पर, हंसननी चाल पर, खोरन खगी रहै ।।
भीहें धनु मैन पर, लोने जुग रैन पर, षुद्व रस बैन पर, वाहिद पगी रहै ।
चंचल से तन पर, सांवरे बदन पर, नंद के नंदन पर, लगन लगी रहै ।।

जनहरण घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण होते हैं । प्रत्येक पद का 31 वां वर्ण गुरू शेष सभी वर्ण लघु होते हैं । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

यदुपति जय जय, नर नरहरि जय जय, जय कमल नयन, जल गिरधरये ।
जगपति हरि जय, जय गुरू जग जय, जय मनसिज जय, जय मन हरये ।।
जय परम सुमतिधर कुमतिन छयकर जगत तपत हर नरवरये ।
जय जलज सदृष छबि सुजन नलिन रवि पढ़त सुकवि जस जग परवे ।।

कलाधर घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण होते हैं । प्रत्येक पद में क्रमषः गुरू-लघु 15 बार आता है और अंत में 1 गुरू होता है । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

जाय के भरत्थ चित्रकूट राम पास बेगि हाथ जोरि दीन है सुप्रेम तें बिनैं करी ।
सीय तात माताा कौशिला वशिष्‍ठ आदि पूज्य लोक वेद प्रीति नीति की सुरीतिही धरी ।
जान भूप बैन धर्म पाल राम हैं सकोच धीर इे गँभीरबंधु की गलानि को हरी ।
पादुका दई पठाय औध को समाज साज देख नेह राम सीय के हिये कृपा भरी ।।

रूपघनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । 32 वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

बेर बेर बेर लै सराहैं बेर बेर बहुरसिक बिहारी देत बंधु कहँ फेर फेर ।
चाखि भाषै यह वाहु ते महान मीठो लेहु तो लखन यों बखानत हैं हेर हेर ।।
बेर बेर देबै बेर सबरी सु बेर बेर तऊ रघुबीर बेर बेर तेहि टेर टेर ।
लायो बेर बेर जनि लावो बेर बेर जनि लावो बेर लावो कहैं बेर बेर ।।

जलहरण घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । 31वां एवं 32वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये अर्थात अंत में दो लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

भरत सदा ही पूजे पादुका उते सनेम इते राम सीय बंधु सहित सिधारे बन ।
सूूूूूूपनखा कै कुरूप मारे खल झुंड घने हरी दससीस सीता राघव बिकल मन ।।
मिले हनुमान त्यों सुकंठ सों मिताई ठानि वाली हति दीनों राज्य सुग्रीवहिं जानि जन ।
रसिक बिहारी केसरी कुमार सिंधु लांघि लंक सीय सुधि लायो मोद बाढ़ो तन ।।

डमरू घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी 32वों वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये अर्थात सभी वर्ण लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

रहत रजत नग नगर न गज तट गज खल कल गर गरल तरल धर ।
न गनत गन यष सघन अगन गन अतन हतन तन लसत नखर कर ।।
जलज नयन कर चरण हरण अघ श्‍रण सकल चर अचर खचर तर ।
चहत छनक जय लहत कहत यह हर हर हर हर हर हर हर हर ।।

कृपाण घनाक्षरी –

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी चरणों में सानुप्रास होता है अर्थात समान उच्चारण समतुक होता है । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

चलह है के विकराल, महाकालहू को काल, किये दोउ दृग लाल, धाई रन समुहान ।
जहां क्रुध है महान, युद्व करि घमसान, लोथि लोथि पै लदान, तड़पी ज्यों तड़ियान ।।
जहां ज्वाला कोट भान, के समान दरसान, जीव जन्तु अकुलान, भूमि लागी थहरान ।
तहां लागे लहरान, निसिचरहूं परान, वहां कालिका रिसान, झुकि झारी किरपान ।।

विजया घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी पदो ंके अंत में लघु गुरू या नगण मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

भई हूँ अति बावरी बिरह घेरी बावरी चलत है चवावरी परोगी जाय बावरी ।
फिरतिहुं उतावरी लगत नाहीं तावरी सुबारी को बतावरी चल्यों है जात दांवरी ।।
थके हैं दोऊ पांवरी चढ़त नाहीं पांवरी पियारो नाहीं पांवरी जहर बांटि खांवरी ।
दौरत नाहीं नावरी पुकार के सुनावरी सुन्दर कोऊ नावरी डूबत राखे नावरी ।।

देवघनाक्षरी –

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 9 के क्रम में 33 वर्ण होते हैं । सभी पदो ंके अंत में नगण मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारो पद के अंत में समान तुक होता है ।

झिल्ली झनकारैं पिक, चातक पुकारैं बन, मोरनि गुहारैं उठी, जुगुनू चमकि चमकि ।
घोर घनघोर भारे, धुरवा धुरारे धाम, धूमनि मचावैं नाचैं, दामिनी दमकि दमकि ।।
झूकनि बयार बहै, लूकान लगावैं अंक, हूकनि भभूकिन का, उर में खमकि खमिक ।
कैसे करि राखौं प्राण, प्यारे जसवन्त बिन, नान्हीं नान्हीं बूंद झरै, मेघवा झमकि झमकि ।।

घनाक्षरी लिखने के नियम-

  1. घनाक्षरी में चार पद होता है ।
  2. प्रत्येक पद में चार चरण या चार बार यति होता है ।
  3. पहले के तीन चरण में आठ-आठ वर्ण निश्चित रूप से होते हैं ।
  4. चौथे चरण में सात, आठ या नौ वर्ण हो सकते हैं ! इसी अंतर से घनाक्षरी का प्रकार बनता है ।
  5. चौथे चरण में सात वर्ण होने पर मनहरण, जनहरण और कलाधर नाम का घनाक्षरी बनता है ! जिसमें लघु गुरू का भेद होता है ।
  6. चौथे चरण में आठ वर्ण होने पर रूप, जलहरण, डमरू, कृपाण और विजया नाम का घनाक्षरी बनता है । जिसमें लघु गुरू का भेद होता है ।
  7. चौथे चरण में नौ वर्ण आने पर देवघनाक्षरी बनता है ।

घनाक्षरी लिखना सीखें –

घनाक्षरी उपरोक्त नियमों के आधार पर लिखा जा सकता है किन्तु इसके लिये हमें वर्ण की गणना करना और वर्ण में लघु गुरू का निर्धारण करने आना चाहिये । इसलिये सबसे पहले हम वर्ण को समझने का प्रयास करेंगे फिर वर्ण लघु-गुरू का निर्धारण करना देखेंगे तत्पष्चात षब्दों में वर्णो की गणना करना सीखेंगे अंत में घनाक्षरी लिखना जानेंगे ।

वर्ण-

‘‘मुख से उच्चारित ध्वनि के संकेतों, उनके लिपि में लिखित प्रतिकों को ही वर्ण कहते हैं ।’’ हिन्दी वर्णमाला में 53 वर्णो को तीन भागों में भाटा गया है-

  1. स्वर-
    अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ए,ऐ,ओ,औ. अनुस्वार-अं. अनुनासिक-अँ. विसर्ग-अः
  2. व्यंजनः
    क,ख,ग,घ,ङ, च,छ,ज,झ,ञ. ट,ठ,ड,ढ,ण,ड़,ढ़, त,थ,द,ध,न, प,फ,ब,भ,म, य,र,ल,व,श,ष,स,ह,
  3. संयुक्त वर्ण-
    क्ष, त्र, ज्ञ,श्र

वर्ण गिनने नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के सभी वर्ण चाहे वह स्वर हो, व्यंजन हो, संयुक्त वर्ण हो, लघु मात्रिक हो या दीर्घ मात्रिक सबके सब एक वर्ण के होते हैं ।
  2. अर्ध वर्ण की कोई गिनती नहीं होती ।

उदाहरण-

कमल=क+म+ल=3 वर्ण
पाठशाला= पा+ठ+शा+ला =4 वर्ण
रमेश=र+मे+श=3 वर्ण
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण (यहां आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)
कंप्यूटर=कंम्प्+यू़+ट+र=4वर्ण (यहां भी आधे वर्ण की गिनती नहीं की गई है)

लघु-गुरू का निर्धारण करना-

वर्णो के ध्वनि संकेतो को उच्चारित करने में जो समय लगता है उस समय को मात्रा कहते हैं । यह दो प्रकार का होता है-

  1. लघु- जिस वर्ण के उच्चारण में एक चुटकी बजाने में लगे समय के बराबर समय लगे उसे लघु मात्रा कहते हैं। इसका मात्रा भार 1 होता है ।
  2. गुरू-जिस वर्ण के उच्चारण में लघु वर्ण के उच्चारण से अधिक समय लगता है उसे गुरू या दीर्घ कहते हैं ! इसका मात्रा भार 2 होता है ।

लघु गुरु निर्धारण के नियम-

  1. हिंदी वर्णमाला के तीन स्वर अ, इ, उ, ऋ एवं अनुनासिक-अँ लघु होते हैं और इस मात्रा से बनने वाले व्यंजन भी लघु होते हैं ।
    लघु स्वरः-अ,इ,उ,ऋ,अँ
    लघु व्यंजनः- क, कि, कु, कृ, कँ, ख, खि, खु, खृ, खँ ..इसीप्रकार
  2. इन लघु स्वरों को छोड़कर शेष स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ और अनुस्वार अं गुरू स्वर होते हैं तथा इन से बनने वाले व्यंजन भी गुरु होता है ।
    गुरू स्वरः- आ, ई,ऊ, ए, ऐ, ओ, औ,अं
    गुरू व्यंजन:- का की, कू, के, कै, को, कौ, कं,……..इसीप्रकार
  3. अर्ध वर्ण का स्वयं में कोई मात्रा भार नहीं होता,किन्तु यह दूसरे वर्ण को गुरू कर सकता है ।
  4. अर्ध वर्ण से प्रारंभ होने वाले शब्द में मात्रा के दृष्टिकोण से भी अर्ध वर्ण को छोड़ दिया जाता है ।
  5. किंतु यदि अर्ध वर्ण शब्द के मध्य या अंत में आवे तो यह उस वर्ण को गुरु कर देता है जिस पर इसका उच्चारण भार पड़ता है । यह प्रायः अपनी बाँई ओर के वर्ण को गुरु करता है ।
  6. यदि जिस वर्ण पर अर्ध वर्ण का भार पड़ रहा हो वह पहले से गुरु है तो वह गुरु ही रहेगा ।
  7. संयुक्त वर्ण में एक अर्ध वर्ण एवं एक पूर्ण होता है, इसके अर्ध वर्ण में उपरोक्त अर्ध वर्ण नियम लागू होता है ।
उदाहरण-

रमेश=र+मे+श=लघु़+गुरू+लघु=1+2+1=4 मात्रा
सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा
तुम्हारा=तु़+म्हा+रा=लघु+गुरू+गुरू =1+2+2=5 मात्रा
कंप्यूटर=कम्‍प्‍+यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
यज्ञ=यग्+य=गुरू+लघु=2+1=3
क्षमा=क्ष+मा=लघु+गुरू =1+2=3

वर्णिक एवं मात्रिक में अंतर-

जब उच्चारित ध्वनि संकेतो को गिनती की जाती है तो वार्णिक एवं ध्वनि संकेतों के उच्चारण में लगे समय की गणना लघु, गुरू के रूप में की जाती है इसे मात्रिक कहते हैं । मात्रिक में मात्रा महत्वपूर्ण होता है वार्णिक में वर्ण महत्वपूर्ण होता है । लेकिन दोनों प्रकार के छंद रचना में इन दोनों का ज्ञान होना आवश्‍यक है ।

उदाहरण- 
रमेश=र+मे+श=4 वर्ण, रमेश=र+मे+श=लघु़+गुरू+लघु=1+2+1=4 मात्रा
कंप्यूटर=कंम्प्+यू़+ट+र=4वर्ण, कंप्यूटर=कम्‍प्‍+यू+ट+र=गुरु़+गुरु़+लघु़+लघु=2+2+1+1=6 मात्रा
सत्य=सत्+ य=2 वर्ण, सत्य=सत्य+=गुरु+लघु =2+1=3 मात्रा

घनाक्षरी रचना का अभ्यास –

उपरोक्त जानकारी के पश्चात हम एक घनाक्षरी की रचना का अभ्यास करते हैं । सबसे पहले आपको एक विचार या सोच की आवश्यकता होती है । सबसे पहले इस विचार को शब्द में बदलना है फिर शब्दों का चयन ऐसे करना है कि घनाक्षरी के नियमों का पूरा-पूरा पालन हो सके ।

हम एक मनहरण घनाक्षरी लिखने का अभ्यास करते है-

विचार-

मनहरण घनाक्षरी को मनहरण घनाक्षरी में परिभाषित करना ।
मनहरण घनाक्षरी के नियमः- मनहरण घनाक्षरी में चार पद होते हैं जिसके प्रत्येक पद में चार चरण होते हैं । पहले तीन चरण 8-8 वर्ण और चैथे चरण में 7 वर्ण होता हैजिसका अंत लघु गुरू से हो । इसी कथन को घनाक्षरी में लिखने का प्रयास करते हैं-

पहला पद-
  • पहला चरण- ‘वर्ण-छंद घनाक्षरी’ (8 वर्ण)
  • दूसरा चरण- ‘ गढ़न हरणमन’ (8 वर्ण)
  • तीसरा चरण- ‘ नियम-धियम आप’ (8 वर्ण)
  • चौथा चरण- ‘धैर्य धर जानिए’ (7 वर्ण, अंत में लघु गुरू)

दूसरा पद –

  • पहला चरण- आठ-आठ आठ-सात, (8 वर्ण)
  • दूसरा चरण- चार बार वर्ण रख (8 वर्ण)
  • तीसरा चरण- चार बार यति कर, (8 वर्ण)
  • चौथा चरण- चार पद तानिए (7 वर्ण, अंत में लघु गुरू, पलिे और दूसरे पद के अंत में समान तुक)
इसी प्रकार तीसरे और चैथे पद की रचना कर लेने पर एक घनाक्षरी संपूर्णरूप् में इस प्रकार होगा-
वर्ण-छंद घनाक्षरी, गढ़न हरणमन
नियम-धियम आप, धैर्य धर जानिए ।
आठ-आठ आठ-सात, चार बार वर्ण रख
चार बार यति कर, चार पद तानिए ।।
गति यति लय भर, चरणांत गुरु धर
साधि-साधि शब्द-वर्ण, नेम यही मानिए ।
सम-सम सम-वर्ण, विषम-विषम सम,
चरण-चरण सब, क्रम यही पालिए ।।
-रमेश चौहान
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दोहा गीत-जय जय जय गणराज प्रभु

जय जय जय गणराज प्रभु, जय गजबदन गणेश ।

विघ्न-हरण मंगल करण, हरें हमारे क्लेश।।
गिरिजा नंदन प्रिय परम, महादेव के लाल ।
सोहे गजमुख आपके, तिलक किये हैं भाल ।।
तीन भुवन अरू लोक के, एक आप अखिलेश । 
जय जय जय गणराज प्रभु….

मातु-पिता के आपने, परिक्रमा कर तीन ।
दिखा दियेे सब देेव को, कितने आप प्रवीन ।
मातुु धरा अरू नभ पिता, सबको दे संदेश ।। 
जय जय जय गणराज प्रभु…




प्रथम पूज्य आप प्रभुु, वंदन बारम्बार ।
करें काज निर्विघ्न अब, पूूजन कर स्वीकार ।।
श्रद्धा अरू विश्‍वास का, लाये भेट ‘रमेश‘ । 
जय जय जय गणराज प्रभु….

-रमेश चौहान

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गणेश चालीसा

दोहा

सबले पहिले होय ना, गणपति पूजा तोर ।
परथ हवं मैं पांव गा, विनती सुन ले मोर ।।
जय गणपति गणराज जय, जय गौरी के लाल ।
बाधा मेटनहार तैं, हे प्रभु दीनदयाल ।।

चौपाई

हे गौरा-गौरी के लाला । हे प्रभू तैं दीन  दयाला 
सबले पहिली तोला सुमरँव । तोरे गुण ला गा के झुमरँव 
तही बुद्धि के देवइया प्रभु । तही विघन के मेटइया प्रभु 
तोरे महिमा दुनिया गावय । तोरे जस ला वेद सुनावय
देह रूप गुणगान बखानय । तोर पॉंव मा मुड़ी नवावय
चार हाथ तो तोर सुहावय । हाथी जइसे मुड़ हा भावय
मुड़े सूंड़ मा लड्डू खाथस । लइका मन ला खूबे भाथस
सूपा जइसे कान हलावस । सबला तैं हा अपन बनावस
चाकर माथा चंदन सोहय । एक दांत हा मन ला मोहय
मुड़ी मुकुट के साज सजे हे । हीरा-मोती घात मजे हे
भारी-भरकम पेट जनाथे । हाथ जोड़ सब देव मनाथे
तोर जनम के कथा अचंभा ।अपन देह ले गढ़ जगदम्‍बा
सुघर रूप अउ देके चोला । अपन शक्ति सब देवय तोला 
कहय दुवारी पहरा देबे । कोनो आवय डंडा देबे
गौरी तोरे हे महतारी । करत रहे जेखर रखवारी
देवन आवय तोला जांचे । तोरे ले एको ना बाचे
तोर संग सब हारत जावय । आखिर मा शिव शंकर आवय
होवन लागे घोर लड़ाई । करय सबो झन तोर बड़ाई
लइका मोरे ये ना जानय । तोरे बर त्रिसूल ल तानय
तोर मुड़ी जब काटय शंकर । मॉं के जोगे क्रोध भयंकर
देख क्रोध सब धरधर कांपे । शिव शंकर के नामे जापे
उलट-पुलट सब सृष्टि करीहँव । कहय कालिका मुंड पहिरहँव
गौरी  गुस्‍सा शंकर जानय । तोला अपने लइका मानय
हाथी मुड़ी जोड़ जीयावय । मात-पिता दूनो अपनावय
नाम गजानन तोर धरावँय । पहिली पूजा देव बनावँय
मात-पिता ला सृष्टि बताये । प्रदिक्षण तैं सात लगाये
सरग ददा  अउ धरती दाई ।तुहँर गोठ सबके मनभाई
तोर नाम ले मुहरुत करथन । जीत खुशी ला ओली भरथन
बने-बने सब कारज होथे  । जम्‍मो बाधा मुड़धर रोथे
जइसन लम्बा सूंड़ ह तोरे । लम्बा कर दव सोच ल मोर
जइसन भारी पेट ह तोरे । गहरा कर दव बुद्धि ल मोरे 
गौरी दुलार भाथे तोला । ओइसने दव दुलार मोला
गुरतुर लड्डू भाये तोला । गुरतुर भाखा दे दव मोला 
हे लंबोदर किरपा करदव । मोरे कुबुद्धि झट्टे हरदव
मनखे ला मनखे मैं मानँव । जगत जीव ला एके जानँव
नाश करव प्रभु मोर कुमति के । भाल भरव प्रभु बुद्धि सुमति ले
अपने पुरखा अउ माटी के । नदिया-नरवा अउ घाटी के
धुर्रा-चिखला मुड़ मा चुपरँव। देश-राज के मान म झुमरँव
नारद-शारद जस बगरावय । मूरख 'रमेश' का कहि गावय 
हे रिद्धी सिद्धी के दाता । अब दुख मेटव भाग्य विधाता 

दोहा

शरण परत गणराज के, मिटय सकल दुख क्‍लेश ।
सुख देवय पीरा  हरय, गणपति मोर गणेश ।।
जय जय गणराज प्रभु, रखव आस विश्‍वास ।
विनती करय 'रमेश' हा, कर लौ अपने दास ।।
-रमेश चौहान