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गीत-लोकगीत छंद साहित्‍य रत्‍न

आई होली आई होली

आई होली आई होली 

(सार छंद गीत)

आई होली आई होली
आई होली आई होली
आई होली आई होली, मस्ती भर कर लाई । 
झूम झूम कर बच्चे सारे, करते हैं अगुवाई ।

बच्चे देखे दीदी भैया, कैसे रंग उड़ाये ।
रंग अबीर लिये हाथों में, मुख पर मलते जाये ।
देख देख कर नाच रहे हैं, बजा बजा कर ताली ।
रंगो इनको जमकर भैया, मुखड़ा रहे न खाली ।
इक दूजे को रंग रहें हैं, दिखा दिखा चतुराई ।
आई होली आई होली…….

गली गली में बच्चे सारे, ऊधम खूब मचाये ।
हाथों में पिचकारी लेकर, किलकारी बरसाये ।।
आज बुरा ना मानों कहकर, होली होली गाते ।
जो भी आते उनके आगे, रंगों से नहलाते ।।
रंग रंग के रंग गगन पर, देखो कैसे छाई ।
आई होली आई होली…….
कान्हा के पिचका से रंगे, दादाजी की धोती ।

दादी भी तो बच ना पाई, रंग मले जब पोती ।
रंग गई दादी की साड़ी, दादाजी जब खेले ।
दादी जी खिलखिला रही अब, सारे छोड़ झमेले ।
दादा दादी नाच रहे हैं, लेकर फिर तरूणाई ।
आई होली आई होली…….

-रमेश चौहान

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छंद साहित्‍य रत्‍न

आदि शङ्कराचार्य रचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद

आदि शंकराचार्य रचित चर्पट पंचारिका स्‍त्रोत

आदि शंकराचार्य रचित चर्पट पंचारिका स्‍त्रोत ‘भज गोविन्‍द भज गोविन्‍द मूढ़ मते’ एक सुप्रसिद्ध कृति है, जो मूल रूप में देवभाषा संस्‍कृत में है । इस स्‍त्रोत में आदि शंकराचार्य ने मानव जीवन को नश्‍वर बतलाते हुुुये ईश्‍वर शरण मेें जाने की प्ररेणा दियेे हैं । इसी स्‍त्रोत का लावणी छंंद में भावपूर्ण अनुवाद किया गया है ।

चर्पट पंजारिका (हिन्‍दी में)-

आदि शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद

चर्पट-लावणी

(चर्पट पंजारिका लावणी छंद में)

ध्रुव पद- 
हरि का सुमरन कर ले बंदे,  नश्‍वर है दुनियादारी ।
छोड़ रहें हैं आज जगत वह,  कल  निश्चित तेरी बारी ।।

दिवस निशा का क्रम है शाश्‍वत, ऋतुऐं भी आते जाते ।
समय खेलता खेल मनोहर, खेल समझ ना तुम  पाते।।
आयु तुम्‍हारी घटती जाती, खबर तनिक ना  तुम पाये ।
हरि सुमरन छोड़ जगत से, तुम नाहक मोह बढ़ाये ।।1।।

वृद्ध देह की हालत सोचो, जाड़ा से कैसे  बचते ।
कभी पीठ पर सूर्य चाहिये, कभी अनल ढेरी रचते ।।
घुटनों के बीच कभी सिर रख, मुश्किल से प्राण बचाते ।
दीन दशा में देह पड़ा है, फिर भी  मन आस जगाते ।।2।।

तरूण हुये थे जब से तुम तो, जग में धन-धान्‍य बनाये ।
पूछ-परख तब परिजन करते, भांति-भांति तुम्‍हें रिझाये ।।
हुआ देह अब जर्जर देखो,  कुशल क्षेम भी ना वे पूछे ।
इधर-उधर अब भटकता बूढ़ा, जीवन जीने को ही जूझे ।।3।।

कोई-कोई जटा बढ़ाये,  कोई सिर केश मुढ़ाये ।
गेरूवा बाना कोई साजे, कोई अँग  भस्‍म रंगाये ।।
फिर भी दुनिया छोड़ न पाये,  मन जीवन आस जगाये ।।
सत्‍व तत्‍व खुद समझ न पाये, दुनिया को वह भरमाये ।।4।।

भगवत गीता जो लोग पढ़े, जो गंगाजल पान किये ।
कृष्‍ण मुरारी कृष्‍ण मुरारी, कृष्‍ण भजन का गान किये ।।
उनके अंंतिम  बेला पर तो, कष्‍ट हरण यमराज किये ।
अंतकाल में देखा जाता, जीवन में क्‍या काज किये ।।5।।

अंग शिथिल हो कॉंप रहा है,  श्‍वेत केश झॉंक रहा है ।
दंत विहिन मुख कपोल पिचका, रोटी भी फॉंक रहा है ।
लाठी हाथों में डोल रहा , जीवन रहस्‍य खोल रहा ।
इतने पर भी  हाय बुढ़ापा, मोह जगत से बोल रहा  ।।6।।

बचपन को तुम खेल बिताये, मित्र किशोरापन खाये ।
देह आर्कषण के फेर परे, तरूणाई तरूण गँवाये ।।
फिर जाकर परिवार बसाये,  धन दौलत प्रचुर बनाये ।
पाले नाहक चिंता अब तो, बैठ बुढ़ा हरि बिसराये ।।7।।

जन्‍म मरण का  आर्वत फिर फिर, जन्‍म लिये फिर मृत्‍यु गहे ।
अचल नहीं यह मृत्यु हमारी, मृत्‍यु बाद फिर जन्‍म पहे ।।
फिर फिर जग में पैदा होना, फिर फिर जग से है मरना ।
टूटे अब यह दुस्‍तर आर्वत, देव, कृपा ऐसी करना ।।8।।

फिर-फिर आती रहती रजनी, दिन भी तो फिर-फिर आते ।
पखवाड़ा भी फिरते रहते, अयन वर्ष भी फिर जाते ।।
मानव मन की अभिलाषा है, जो मुड़कर कभी न देखे ।
देह जरा होवे तो होवे, पागल मन इसे न लेखे ।।9।।

धन बिन क्‍या नाते-रिश्‍ते, जल विहिन जलाशय जैसे ।
देह आयु जब साथ न होवे, काम-इच्‍छा से प्रित कैसे ।।
अरे बुढ़ापा कुछ चिंतन कर, क्‍या है अब पास तुम्‍हारे ।
हरि सुमरन विसार कर तुम, क्‍यों माया जगत निहारे ।।10।।

 रूपसी का रूप निहारे क्‍यों,  अहलादित होता मन है ।
वक्ष-नाभि में दृष्टि तुम्‍हारी, मांस-वसा का ही तन है ।।
तन आकर्षण मिथ्‍या माया, विचलित तुमको करते हैं ।
अरे बुढ़ापा अंतकाल में, यह माया क्‍यो पलते हैं ।।11।।

सारहीन यह स्‍वप्‍न लोक है, जगत मोह को तुम त्‍यागो ।
गहरी निद्रा पड़े हुये हो, ऑख खोल कर अब जागो ।।
मैं कौन कहॉं से आया हूँ,  मातु-पिता कौन हमारो ।
आत्‍म तत्‍व पर चिंतन करते, अब अपने आप विचारो।।12।।

भगवत गीता पढ़ा करो कुछ, बिष्‍णु नाम जपा करो कुछ ।
ईश्‍वर स्‍वरूप का ध्‍यान धरो,  पुण्‍य कर्म किया करो कुछ ।
संतो की संगति किया करो, दान-धर्म किया करो कुछ ।
दीन-हीन की मदद करो कुछ, इसके आगे बाकी तुछ ।।13।।

प्राण देह में  होता जबतक, पूछ-परख है रे तेरा ।
प्राण विहिन काया को फिर, कहे न कोई रे मेरा ।
दूजे की तो बातें छोड़ों, अंतरंग जीवन साथी ।
भूत मान कर डरती रहती, यही जगत की परिपाटी ।।14।।

शारीरिक सुख के पीछे ही, भागता फिरता जवानी ।
स्‍त्री मोह मेंं है दीवाना,  पुरूष मोह में दीवानी ।।
देह वही अब जर्जर रोगी, अंत मृत्‍यु को ही पाये ।
देख-भालकर  भी दुनिया को, ईश्‍वर शरण न वह जाये ।।15।।

डगर पड़े चिथड़े की झोली,  लेकर फिरता सन्‍यासी ।
पाप-पुण्‍य रहित डगर पर वह, कर्म विहिन रहे उदासी ।।
समझ लिया  जो इस दुनिया में, न मैं हूँ न तू  न ही जगत ।
फिर भी क्‍यों वह शोकग्रस्‍त हो, डरता फिरता एक फकत ।।16।।

चाहे गंगासागर जावे, चाहे व्रत उपवास करे ।
चाहे सारे तीरथ घूमे,चाहे कुछ बकवास करे ।।
ज्ञानविहिन मुक्ति न संभव, आत्‍म तत्‍व को तो जाने ।
कर्म भोग जीवन का गहना, ज्ञान कर्म  में तानो ।।17।।

-रमेश चौहान

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छंद साहित्‍य रत्‍न

राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां

राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां
राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां

1.

कोयल कौआ एक सा, नहीं रंग में भेद ।
राजनीति का रंग भी, कालिख श्‍याम अभेद ।।
कालिख श्‍याम अभेद, स्‍वार्थ है अपना अपना ।
कोई नहीं तटस्‍थ, सभी कोई है ढपना ।।
फेकू पप्‍पू रंग, भक्‍त चम्‍मच ठकठौआ ।
करे कौन पहचान, श्‍याम है कोयल कौआ ।।

2.

नेता स्वार्थ साधने, बदल रहे संविधान ।
करने दो जो चाहते, डालो मत व्यवधान ।।
डालो मत व्यवधान, है अभी उनकी बारी ।
लक्ष्य पर रखो ध्यान, करो अपनी तैयारी ।।
बगुला जोहे बाट, बैठे नदी तट रेता ।
शिकारी बन बैठो, शिकार हो भ्रष्ट नेता ।

3.

मतदाता को मान कर, पत्थर सा भगवान ।
नेता नेता भक्त बन, चढ़ा रहे पकवान ।।
चढ़ा रहे पकवान, एक दूजे से बढ़कर ।
रखे मनौती लाख, घोषणा चिठ्ठी गढ़कर ।।
बिना काम का दाम, मुफ्तखोरी कहलाता ।
सुन लो कहे ‘रमेश‘, काम मांगे मतदाता ।।

4.

देना है तो दीजिये, हर हाथों को काम ।
नही चाहिये भीख में, कौड़ी का भी दाम ।।
कौड़ी का भी दाम, नहीं मिल पाते हमको ।
अजगर बनकर तंत्र, निगल जाते हैं सबको ।।
सुन लो कहे ‘रमेश‘, दिये क्यों हमें चबेना ।
हमें चाहिये काम, दीजिये जो हो देना ।।

5.

बैरी बाहर है नहीं, घर अंदर है चोर ।
मानवता के नाम पर, राष्ट्र द्रोह ना थोर ।।
राष्ट्र द्रोह ना थोर, शत्रु को पनाह देना ।
गढ़कर पत्थरबाज, साथ उनके हो लेना ।।
राजनीति का स्वार्थ, कहां है अब अनगैरी ।
माटी का अपमान, मौन हो देखे बैरी ।।

6.

साचा साचा बात है, नहीं साच को आच ।
राजनीति के आच से, लोग रहे हैं नाच ।।
लोग रहे हैं नाच, थाम कर कोई झंडा ।
करते उनकी बात, जुबा पर लेकर डंडा ।।
साचा कहे रमेश, नहीं कोई अपवाचा ।
यही सही उपचार, राजनेता हो साचा ।।

(शब्‍दार्थ -ढपना-ढक्‍कन, ठकठौआ- करताल बजाकर भीख मांगने वाला)

-रमेेेेश चौहान

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छंद साहित्‍य रत्‍न

अनुष्‍टुप छंद विधान और उदाहरण

अनुष्‍टुप छंद-

अनुष्‍टुप छंद विधान और उदाहरण
अनुष्‍टुप छंद विधान और उदाहरण

अनुष्‍टुप छंद एक वैदिक वार्णिक छंद है । इस छंद को संस्‍स्‍कृत में प्राय: श्‍लोक कहा जाता है या यों कहिये श्‍लोक ही अनुष्‍टुप छंद है । संस्‍कृत साहित्‍य में सबसे ज्‍यादा जिस छंद का प्रयोग हुआ है, वह अनुष्‍टुप छंद ही है ।

अनुष्‍टुप छंद का विधान-

अनुष्‍टुप छंद 4 चरणों एवं दो पदों का वार्णिक छंद हैं जिसके प्रत्‍येक चरणों में 8-8 वर्ण होते हैं । इन आठ वर्णो में गुरू-लघु का नियम होता है । संस्‍कृत में तुक की अनिवार्यता नहीं थी, हिन्‍दी में तुक का ज्‍यादा प्रचलन है इसलिये इस छंद में तुकांत को ऐच्छिक रखा गया चाहे रचनाकार तुकांत रखे चाहे तो न रखें । इसके नियम को निम्‍नवत रेखांकित किया जा सकता है-

  • विषम चरण – वर्ण क्रमांक पाँचवाँ, छठा, सातवाँ, आठवाँ क्रमशः लघु, गुरू, गुरू, गुरू
  • सम चरण – वर्ण क्रमांक पाँचवाँ, छठा, सातवाँ, आठवाँ क्रमशः लघु, गुरू, लघु, गुरू
  • तुकांतता-ऐच्छिक

अनुष्‍टुप छंद की परिभाषा अनुष्‍टुप छंद में-

आठ वर्ण जहां आवे, अनुष्टुपहि छंद है ।
 पंचम लघु  राखो जी, चारो चरण बंद में ।।

 छठवाँ गुरु आवे है, चारों चरण बंद में ।
 निश्चित लघु ही आवे, सम चरण सातवाँ ।।

 अनुष्टुप इसे जानों, इसका नाम श्लोक भी ।
 शास्त्रीय छंद ये होते, वेद पुराण ग्रंथ में ।।

 -रमेश चौहान

अनुष्‍टुप छंद का उदाहरण-

राष्ट्रधर्म कहावे क्या, पहले आप जानिये ।
 मेरा देश धरा मेरी, मन से आप मानिये ।।

 मेरा मान लिये जो तो,  देश ही परिवार है ।
 अपनेपन से होवे, सहज प्रेम देश से ।।

 सारा जीवन है बंधा, केवल अपनत्व से ।
 अपनापन सीखाये, स्व पर बलिदान भी ।।

 सहज परिभाषा है, सुबोध राष्ट्रधर्म का ।
 हो स्वभाविक ही पैदा, अपनापन देश से ।।

 अपनेपन में यारों, अपनापन ही झरे ।
 अपनापन ही प्यारा, प्यारा सब ही लगे ।।

 अपना दोष औरों को, दिखाता कौन है भला ।
 अपनी कमजोरी को,  रखते हैं छुपा रखे ।।

 अपने घर में यारों,  गैरों का कुछ काम क्या ।
 आवाज शत्रु का जो हो, अपना कौन मानता ।।

 होकर घर का भेदी, अपना बनता कहीं ।
 राष्ट्रद्रोही वही बैरी, शत्रु से  मित्र भी  बड़ा ।।

-रमेश चौहान
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सरसी छंद विधान और प्रयोग

सरसी छंद का परिचय

सरसी छंद विधान और प्रयोग
सरसी छंद विधान और प्रयोग

सरसी छंद एक बहुत ही लोकप्रिय छंद है। जहां भोजपुरी भाषाई क्षेत्र में सरसी छंद में होली गीत गाए जाते हैं वहीं छत्तीसगढ़ के राउत समुदाय द्वारा इसे एक लोक नृत्य लोकगीत के रूप में राउत दोहा के रूप में प्रयोग किया जाता है । इस प्रकार यह सरसी छंद लोक छंद के रूप में भी प्रचलित है ।

सरसी छंद का विधान

सरसी छंद चार चरणों का एक विषम मात्रिक छंद होता है । सरसी छंद में चार चरण और 2 पद होते हैं । इसके विषम चरणों में 16-16 मात्राएं और सम चरणों में 11-11 मात्राएं होती हैं । इस प्रकार सरसी छंद में 27 मात्राओं की 2 पद होते हैं । सरसी छंद का विषम चरण ठीक चौपाई जैसे 16 मात्रा की होती है और यह पूर्णरूपेण चौपाई के नियमों के अनुरूप होती है ।वहीं इसका सम चरण दोहा के सम चरण के अनुरूप होती है, दोहा के समय चरण जैसे ठीक 11 मात्रा और अंत में गुरु लघु ।

सरसी छंद की परिभाषा सरसी छंद में

चार चरण दो पद में होते, सोलह-ग्यारह भार ।
लोकछंद सरसी है प्रचलित, जन-मन का उपहार ।।

विषम चरण हो चौपाई जैसे, सम हो दोहा बंद ।
सोलह-ग्यारह मात्रा भार में, होते सरसी छंद ।।

होली गीत कहीं पर गाते, गाकर सरसी छंद ।
राउत दोहा नाम कहीं पर, लोक नृत्य का कंद ।।

सरसी छंद में होली गीत

चुनावी होली
(सरसी छंद)

जोगीरा सरा ररर रा
वाह खिलाड़ी वाह.

खेल वोट का अजब निराला, दिखाये कई रंग ।
ताली दे-दे जनता हँसती, खेल देख बेढंग ।।
जोगी रा सरा ररर रा, ओजोगी रा सरा ररर रा

जिनके माथे हैं घोटाले, कहते रहते चोर ।
सत्ता हाथ से जाती जब-जब, पीड़ा दे घनघोर ।।
जोगी रा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

अंधभक्त जो युगों-युगों से, जाने इक परिवार ।
अंधभक्त का ताना देते, उनके अजब विचार ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

बरसाती मेढक दिखते जैसे, दिखती है वह नार ।
आज चुनावी गोता खाने, चले गंग मजधार ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

मंदिर मस्जिद माथा टेके, दिखे छद्म निरपेक्ष।
दादा को बिसरे बैठे,  नाना के सापेक्ष ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

दूध पड़े जो मक्खी जैसे, फेक रखे खुद बाप ।
साथ बुआ के निकल पड़े हैं, करने सत्ता जाप ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा


इक में माँ इक में मौसी, दिखती ममता प्यार ।
कोई कुत्ता यहाँ न भौके, कहती वह ललकार ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

मफलर वाले बाबा अब तो, दिखा रहे हैं प्यार ।
जिससे लड़ कर सत्ता पाये, अब उस पर बेजार ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

पाक राग में राग मिलाये, खड़ा किये जो प्रश्न ।
एक खाट पर मिलकर बैठे, मना रहे हैं जश्न ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा


नाम चायवाला था जिनका, है अब चौकीदार ।
उनके सर निज धनुष चढ़ाये, उस पर करने वार ।।
जोगीरा सरा ररर रा ओ जोगी रा सरा ररर रा

सरसी छंद में राउत दोहा

हो--------रे----
गौरी के तो गणराज भये(हे य)
(अरे्रे्रे) अंजनी के हनुमान (हो, हे… य)
कालिका के तो भैरव भये (हे… )
हो…….ये
कोशिल्या के राम हो  (हे… य)


आरा्रा्रा्रा्रा्रा्रा
दारु मंद के नशा लगे ले (हे… य)
मनखे मर मर जाय  (हे… य)
जइसे सुख्खा रुखवा डारा, 
लुकी पाय बर जाय (हे… य)


हो्ये ...ह….
बात बात मा झगड़ा बाढ़य (हे… य)
(अरे् )पानी मा बाढ़े धान  (हे… य)
तेल फूल मा लइका बाढ़े, 
खिनवा मा बाढ़े कान (हे… य)


हो…….ओ..ओ
नान-नान तैं देखत संगी (हे… य)
झन कह ओला छोट (हे… य)
मिरचा दिखथे भले नानकुन, 
देथे अब्बड़ चोट ।।(रे अररारारा)


आरा्..रा्रा्रा्रा्रा्रा
लालच अइसन हे बड़े बला (हे… य)
जेन परे पछताय रे (हे… य)
फसके मछरी हा फांदा मा, 
जाने अपन गवाय रे (अररारारा)

सरसी छंद के कुछ उदाहरण

कानूनी अधिकार नहीं

है बच्चों का लालन-पालन, कानूनी कर्तव्य ।
पर कानूनी अधिकार नही, देना निज मंतव्य ।।

पाल-पोष कर मैं बड़ा करूं, हूँ बच्चों का बाप ।
मेरे मन का वह कुछ न करे, है कानूनी श्राप ।।

जन्म पूर्व ही बच्चों का मैं, देखा था जो स्वप्न ।
नैतिकता पर कानून बड़ा, रखा इसे अस्वप्न ।।

दशरथ के संकेत समझ तब, राम गये वनवास ।
अगर आज दशरथ होते जग, रहते कारावास ।।

नया दौर नया जमाना

नया जमाना नया दौर है, जिसका मूल विज्ञान।
परंपरा को तौल रहा है, नया दौर का ज्ञान ।

यंत्र-तंत्र में जीवन सिमटा, जिसका नाम विकास ।
सोशल मीडिया से जुड़ा अब, जीवन का विश्वास ।

एक अकेले होकर भी अब, रहते जग के साथ ।
शब्दों से अब शब्द मिले हैं, मिले न चाहे हाथ ।

पर्व दिवस हो चाहे कुछ भी, सोशल से ही काम ।
सुख-दुख का सच्चा साथी, यंत्र नयनाभिराम ।

मोबाइल हाथों का गहना, टेबलेट से प्यार ।
कंप्यूटर अरु लैपटॉप ही, अब घर का श्रृंगार ।

राष्ट्र धर्म ही धर्म बड़ा है

राष्ट्र धर्म ही धर्म बड़ा है, राष्ट्रप्रेम ही प्रेम ।
राष्ट्र हेतु ही चिंतन करना, हो जनता का नेम ।

राष्ट्र हेतु केवल मरना ही, नहीं है देश भक्ति ।
राष्ट्रहित जीवन जीने को, चाहिए बड़ी शक्ति ।

कर्तव्यों से बड़ा नहीं है, अधिकारों की बात ।
कर्तव्यों में सना हुआ है, मानवीय सौगात ।

अधिकारों का अतिक्रमण भी, कर जाता अधिकार ।
पर कर्तव्य तो बांट रहा है , सहिष्णुता का प्यार ।

राष्ट्रवाद पर एतराज क्यों, और क्यों राजनीति ।
राष्ट्रवाद ही राष्ट्र धर्म है, लोकतंत्र की नीति ।।

राष्ट्रवाद ही एक कसौटी, होवे जब इस देश ।
नहीं रहेंगे भ्रष्टाचारी, मिट जाएंगे क्लेश ।।
-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

चौहान के दोहे

चौहान के दोहे
चौहान के दोहे

सफलता के दोहे

1.  मन से काम 'रमेश' कर, कहते है हर कोय ।
मन से गिरि रज होत हैं, सागर कूप स होय ।।

2.  कर्म भाग्‍य का मूल है, कर्म आपके हाथ ।
अपना कर्म 'रमेश' कर, मिले भाग्‍य का साथ ।।

3.  गिर-गिर कर चलना सिखे,  अटक-अटक कर बोल ।
डरना छोड़ 'रमेश' अब,, कोशिश कर दिल खोल ।।

4.  खुले नयन के स्‍वप्‍न को, स्वप्न सलौने मान ।
कर साकार 'रमेश' अब,, मन में पक्का ठान ।।

5.  सीख छुपा है भूल में, कर लो भूल सुधार ।
किए न यत्‍न 'रमेश' यदि, यही तुम्हारी हार ।।

6.  स्वाद 'रमेशा' भूख में, नहीं स्वाद में भूख ।
 भूख जीत की हो अगर, सुनें जीत की कूक ।।

7.  अगर सफल होना तुम्‍हें, लक्ष्‍य डगर संधान ।
 मन के हर भटकाव को, रोक रखो 'चौहान' ।।

8.  अपनी रेखा दीर्घ कर, होगी उसकी छोट ।
 अपना काम 'रमेश' कर, मन में ना रख खोट ।।

9.  कोशिश करो 'रमेश' तुम, कोशिश से ना हार ।
 कोशिश-कोशिश से तुम्‍हें, जीत करेगी प्‍यार ।।

10.  होना सफल 'रमेश' यदि, बुनों योजना एक ।
मान योजना को राह तुम, चले चलों बिन ब्रेक ।।

जवानी के दोहे-

11.  अरे 'रमेशा' युवक तुम, समझ युवक का अर्थ ।
जीवन की बुनियाद तुम, रित ना जावो व्‍यर्थ ।।

12.  अगर 'रमेशा' तुम युवा, रखो जोश में होश ।
देह प्रेम के फेर में, रहो न तुम बेहोश ।।

13.  काम काम के भेद को, ध्‍यान करो 'चाैहान' ।
 काम वासना ही नहीं, काम कर्म की खान ।।

14.  अगर 'रमेशा' पेड़ तुम, बचपन कली बलिष्‍ट ।
जवा-जवानी पुष्‍प है, मधु फल जरा विशिष्‍ट ।।

15.  जीवन पथ यदि वृक्ष हो, आयु युवा है फूल ।
 फूल वृक्ष से टूट कर, बन जाते हैं धूल ।। 

-रमेश चौहान

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छंद साहित्‍य रत्‍न

पढ़ा-लिखा खुद को कैसे बतलाऊँ

चौपाई छंद

 पढ़ा-लिखा खुद को कैसे बतलाऊँ
पढ़ा-लिखा खुद को कैसे बतलाऊँ
पढ़-लिख कर मैंने क्‍या पाया । 
डिग्री ले खुद को भरमाया ।।
काम-धाम मुझको ना आया ।
केवल दर-दर भटका खाया ।।


 फेल हुये थे जो सहपाठी । 
 आज धनिक हैं धन की थाती । 
सेठ बने हैं बने चहेता । 
अनपढ़ भी है देखो नेता ।।


श्रम करने जिसको है आता । 
दुनिया केवल उसको भाता  ।। 
बचपन से मैं बस्‍ता ढोया । 
काम हुुुुनर मैं हाथ न बोया ।।


ढ़ूढ़ रहा हूँ कुछ काम मिले ।
दो पैसे से परिवार खिले ।।
पढ़ा-लिखा मैं तनिक अनाड़ी । 
घर में ना कुछ खेती-बाड़ी ।।


दुष्‍कर लागे  जीवन मेरा ।
निर्धनता ने डाला डेरा ।। 
दो पैसे अब मैं कैसे पाऊँ । 
पढ़ा-लिखा खुद को बतलाऊँ ।। 


-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

प्रभाती दोहे

जागरण के दोहे-

प्रभाती दोहे
चीं-चीं चिड़िया चहकती, मुर्गा देता बाँग ।
शीतल पवन सुगंध बन, महकाती सर्वांग ।।

पुष्पकली पुष्पित हुई, निज पँखुडियाँ प्रसार ।
उदयाचल में रवि उदित, करता प्राण संचार ।।

जाग उठे हैं नींद से, सकल सृष्टि संसार ।
जागो जागो हे मनुज, बनों नहीं लाचार ।।

बाल समय यह दिवस का, अमृत रहा है बाँट ।
आँख खोल कर पान कर, भरकर अपनी माँट ।।
(माँट-मिट्टी का घड़ा)

वही अभागा है जगत, जो जागे ना प्रात ।
दिनकर दिन से कह रहा, रूग्ण वही रह जात ।।

सुबह सवेरे जागिए, जब जागे हैं भोर ।
समय अमृतवेला मानिए, जिसके लाभ न थोर ।।

जब पुरवाही बह रही, शीतल मंद सुगंध ।
निश्चित ही अनमोल है, रहिए ना मतिमंद ।।

दिनकर की पहली किरण, रखता तुझे निरोग ।
सूर्य दरश तो कीजिए, तज कर बिस्तर भोग ।।

दीर्घ आयु यह बांटता,  काया रखे निरोग ।
जागो जागो मित्रवर, तज कर मन की छोभ ।।

-रमेश  चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

पंच दिवसीय दीपपर्व की छंदमय शुभकामनाऍं

धनतेरस पर्व की शुभकामना-

पंच दिवसीय दीपपर्व की छंदमय शुभकामनाऍं
पंच दिवसीय दीपपर्व की छंदमय शुभकामनाऍं

आयुश प्रभु धनवंतरी (कुण्‍डलियां छंद)-

आयुष प्रभु धनवंतरी, हमें दीजिए स्वास्थ्य  ।
 आज जन्मदिन आपका,   दिवस परम परमार्थ ।।
 दिवस परम परमार्थ,  पर्व यह धनतेरस का ।
 असली धन स्वास्थ्य, दीजिए वर सेहत का ।।
 धन से बड़ा "रमेश", स्वास्थ्य पावन पीयुष ।
 आयुर्वेद का पर्व, आज बांटे हैं आयुष ।।

नरकचतुर्दशी की शुभकामना-

शक्ति-भक्ति प्रभु हमें दीजिये (सार छंद)-

पाप-पुण्य का लेखा-जोखा, प्रभुवर आप सरेखे ।
 सुपथ-कुपथ पर कर्म करे जब, प्राणी प्राणी को देखे ।
 शक्ति-भक्ति प्रभु हमें दीजिये,  करें कर्म हम जगहित ।
 प्राणी-प्राणी मानव-मानव, सबको समझें मनमित ।।

दीपावली की शुभकामना-

ज्ञान लौ दीप्‍त होकर (रूपमाला छंद)-

दीप की शुभ ज्‍योति पावन,  पाप तम को  मेट ।
 अंधियारा को हरे है,  ज्‍यों करे आखेट ।
 ज्ञान लौ से दीप्‍त होकर,  ही करे आलोक ।
 आत्‍म आत्‍मा प्राण प्राणी,  एक सम भूलोक ।।

दीप पर्व पावन, लगे सुहावन (त्रिभंगी छंद)-

दीप पर्व पावन, लगे सुहावन, तन मन में यह, खुशी भरे ।
 दीपक तम हर्ता, आभा कर्ता, दीन दुखी के, ताप हरे ।।
 जन-जन को भाये, मन हर्शाये, जगमग-जगमग, दीप करे ।
 सुख नूतन लाये, तन-मन भाये, दीप पर्व जब, धरा भरे ।।

बोल रहे हैं दीयें (सार छंद)-

जलचर थलचर नभचर सारे,, शांति सुकुन से जीये ।
 प्रेमभाव का आभा दमके, बोल रहे हैं दीये ।।
 राग-द्वेश का घूप अंधेरा, अब ना टिकने पाये ।
 हँसी-खुशी से लोग सभी अब, सबको गले लगाये ।।

भाईदूज की शुभकामना-

पावन पर्व भाईदूज (राधिका छंद)-

पावन पर्व भाईदूज, दुनिया रिझावे ।
 भाई-बहनों का प्यार, जग को सिखावे ।।
 दुखिया का दोनों हाथ, बहन का भ्राता ।
 यह अति पावन संबंध, जग को सुहाता ।।
-रमेश चौहान
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छंद साहित्‍य रत्‍न

दीपावली की असीम शुभकामना आपको (वर्ण पंक्ति गीतिका)

दीपावली की असीम शुभकामना आपको

गीतिका छंद-

दीपावली की असीम शुभकामना आपको
दीपावली की असीम शुभकामना आपको
दीप ऐसे हम जलायें, जो सभी तम को हरे ।
 पाप सारे दूर करके, पुण्य केवल मन भरे ।।
 क्ष उर निर्मल करे जो, सद्विचारी ही गढ़े ।
 लीन कर मन ध्येय पथ पर, नित्य नव यश शिश मढ़े ।

 कीजिये कुछ काज ऐसा, देश का अभिमान हो  ।
 श्रु ना छलके किसी का, आज नव अभियान हो ।
 सीख दीपक से सिखें हम, दर्द दुख को मेटना ।
 न पुनित आनंद भर कर, निज बुराई फेेेकना ।।

 शुभ विचारी लोग होंवे, मानवी गुण से भरे ।
 द्र होवे हर सदन अब, मान महिला का करे ।
 काम सबके हाथ में हो, भाग्य का उपकार हो । 
 द रहे ना मन किसी के, एकता संस्कार हो ।।

 नाम होवे देश का अब, देशप्रेमी लोग हो ।
पको अब सब खुशी दे, देश हित सब भोग हो ।
र्व यह दीपावली का, हर्ष सबके मन भरे । 
कोप तज कर मोह तज कर, प्रीत सबसे सब करे 

दोहे-

नाना खुशी बरसावे, जगमग करते  दीप ।
 दीप पर्व की कामना, हर्षित हो मन  मीत ।।

 अंतर मन उजास भरे, जगमग करते दीप ।
 जीवन में सुख शांति दे, दीप पर्व मन मीत ।।
-रमेश चौहान