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इंडिया के कैद में भारत

चौपाई छंद

देव भूमि गांवों का भारत । भरत वंश का गौरव धारक
प्रतिक इंड़िया अंग्रेजो का । स्वाभिमान छिने पूर्वजों का

भौतिकता में हम फंसे हैं । गांव छोड़ कर शहर बसे हैं
अपना दामन मैला लगता । दाग शहर का कुछ ना दिखता

ढोल दूर के मोहित करते। निज बॉंसुरी बेसुरे लगते
कोयल पर कौआ भारी है । गरल सुधा सम अब प्यारी है

दिवस दिवाने अब रात जगे । उल्लू भी अब हैं ठगे-ठगे
पूरब का सूरज भटका है । पश्चिम में जैसे अटका है

दादा परदादा भारत वंशी । बेटा पोता विसरे बंशी
गुलाम हो वो आजाद रहे । हम अंग्रेजो के चरण गहे

इंड़िया लगे अब तो भारी । सिसक रही संस्कृती हमारी
बने कुरीति रीति हमारे । आंग्ल हिन्द पर डोरा डाले

इंड़िया का कैदी भारत । घर-घर में छिड़ा महाभारत
रिश्ते नाते छूट रहे हैं । लोक लाज अब टूट रहे हैं
-रमेश चौहान
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देेेेशभक्ति का चंदन सजे, नित्‍य हमारे भाल में

देश भक्ति का चंदन सजे, नित्‍य हमारे भाल में

Desh bhakti
Desh bhakti

उल्‍लाल छंद

देश हमारा हम देश के, देश हमारा मान है ।
मातृभूमि ऊंचा स्वर्ग से, भारत का यश गान है ।।

देश एक है सागर गगन एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

धर्म हमारा हम धर्म के, जिस पर हमें गुमान है ।
धर्म-कर्म जीवन में दिखे,जो खुद प्रकाशवान है ।।

फंसे रहेंगे कब तलक हम, पाखंडियों के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

जाति हमारी हम जाति के, जिस पर हम को मान है ।।
जाति-पाति से पहले वतन, ज्यों काया पर प्राण है ।।

बटे रहेंगे कब तलक हम, जाति- पाति जंजाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

अपने का अभिमान है जब, दूजे का भी मान हो ।
अपना अपमान बुरा लगे जब, दूजे का भी भान हो ।।

फंसे रहेंगे कब तलक हम, नेताओं के जाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

देवनागरी लिपि में लिखें, निज हिंदी की शान में ।
मोह दूसरों का छोड़ कर, खुश रहिए निज मान में ।।

देश एक है सागर गगन एक रहे हर हाल में ।
देश भक्ति का चंदन सजे, नित्य हमारे भाल में ।।

-रमेश चौहान
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रमेश चौहान के ‘चिंतन के 25 दोहे’

आजादी रण शेष है

आजादी रण शेष है-

आजादी रण शेष है, हैं हम अभी गुलाम ।
आंग्ल मुगल के सोच से, करे प्रशासन काम ।।

मुगलों की भाषा लिखे, पटवारी तहसील ।
आंग्लों की भाषा रटे, अफसर सब तफसील ।।

लोकतंत्र में देश का, अपना क्या है काम ।
भाषा अरू ये कायदे, सभी शत्रु के नाम ।।

ना अपनी भाषा लिये, ना ही अपनी सोच ।
आक्रांताओं के जुठन, रखे यथा आलोच ।।

लाओं क्रांति विचार में, बनकर तुम फौलाद ।
निज चिंतन संस्कार ही, करे हमें आजाद ।

बढ़े महंगाई-

निर्भरता व्यवसाय पर, प्रतिदिन बढ़ती जाय ।
ये उपभोक्ता वाद ही, भौतिकता सिरजाय ।।

मूल्य नीति व्यवसाय का, हमें समझ ना आय ।
दस रूपये के माल को, सौं में बेचा जाय ।।

कभी व्यपारी आंग्ल के, लूट लिये थे देश ।
बढ़े विदेशी माल फिर, बांट रहे हैं क्लेश ।।

अच्छे दिन के स्वप्न को, ढूंढ रहे हैं लोग ।
बढ़े महंगाई कठिन, जैसे कैंसर रोग ।।

टेक्स हटाओं तेल से, सस्ता कर दो दाम ।
जोड़ो टेक्स शराब पर, चले बराबर काम ।।

प्रकृति और विज्ञान-

प्रकृति और विज्ञान में, पहले आया कौन ।
खोज विज्ञान कर रहा, सत्य प्रकृति है मौन ।।

समय-समय पर रूप को, बदल लेत विज्ञान ।
कणिका तरंग जान कर, मिला द्वैत का ज्ञान ।।

सभी खोज का क्रम है, अटल नही है एक ।
पहले रवि था घूमता, अचर पिण्ड़ अब नेक ।।

नौ ग्रह पहले मान कर, कहते हैं अब आठ ।
रंग बदल गिरगिट सदृश, दिखा रहे हैं ठाठ ।।

जीव जन्म लेते यथा, आते नूतन ज्ञान ।
यथा देह नश्वर जगत, नश्वर है विज्ञान ।।

सेवक है विज्ञान तो, इसे न मालिक मान ।
साचा साचा सत्य है, प्रकृति पुरुष भगवान ।।

कोटि कोटि है देवता, कोटि कोटि है संत ।
केवल ईश्वर एक है, जिसका आदि न अंत ।।

पंथ प्रदर्शक गुरु सभी, कोई ईश्वर तुल्य ।
फिर भी ईश्वर भिन्न है, भिन्न भिन्न है मूल्य ।।

आँख मूंद कर बैठ जा, नही दिखेगा दीप ।
अर्थ नही इसका कभी, बूझ गया है दीप ।।

बालक एक अबोध जब, नही जानता आग ।
क्या वह इससे पालता, द्वेष या अनुराग ।।

मीठे के हर स्वाद में, निराकार है स्वाद ।
मीठाई साकार है, यही द्वैत का वाद ।।

जिसको तू है मानता, गर्व सहित तू मान ।
पर दूजे के आस को, तनिक तुच्छ ना जान ।।

कितने धार्मिक देश हैं, जिनका अपना धर्म ।
एक देश भारत यहां, जिसे धर्म पर शर्म ।।
-रमेश चौहान
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गज़ल में बहर, तक्तिअ करना, मात्रा गिराने के नियम के साथ

गजल में बहर-

गज़ल जिस लय पर, जिस मात्रा पर, जिस मीटर पर लिखि जाती है, उसे बहर कहते हैं । वास्‍तव में बहर रूकनों के से बनते हैं, रूकनों की पुनरावृत्ति से ही बहर का निर्माण होता है । जिस प्रकार हिन्‍दी छंद शास्‍त्र में सवैया गणों की पुनरावृत्ति से बनते हैं उसी प्रकार गजल का बहर रूकनों के पुनरावृत्ति से बनते हैं ।

बहर का उदाहरण-

2122 / 2122 / 2122 फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलातुन

यहां फाइलातुन रूकन जिसका नाम रमल है, की तीन बार पुनरावृत्ति से बनाई है । इसी प्रकार किसी भी रूकन की पुनरावृत्ति से बहर बनाया जा सकता है ।

बहर का नामकरण-

बहर का नाम=रूकन का नाम+ रूकन के पुनरावृत्ति का नाम+सालिम या मजहूफ

बहर का निर्माण रूकनों से होता है इसलिये जिस रूकन की पुनरावृत्ति हो रही है, उस मूल रूकन का नाम पहले लिखते हैं, फिर उस रूकन की जितनी बार पुनरावृत्ति हो रही है, उस आधार पर निश्चित पुनरावृत्ति के एक नाम निर्धारित है जिसे नीचे टेबल पर दिया गया, उसका नाम लिखते हैं अंत में रूकन मूल हो तो सालिम और यदि रूकन मूल न हो होकर मूजाहिफ या उप रूकन हो तो मजहूफ लिखते हैं । बहर का नामकरण और बहर निर्माण के लिये पहले रूकन और उसके नाम को जानन होगा –

रूकन-

जिस प्रकार हिन्दी छंद शास्त्र में ‘यमाताराजभानसलगा’ गण लघु गुरू का क्रम होता है उसी प्रकार उर्दू साहित्य में लाम और गाफ के समूह रूकन कहते हैं ।

रूकन के भेद-

रूकन दो प्रकार के होते हैं-

  1. सालिम रूकन
  2. मुजाहिफ रूकन

सालिम रूकन-

उर्दू साहित्य में मूल रूकन को सालिम रूकन कहते हैं । इनकी संख्या 7 होती है ।

रूकनमात्रारूकन का नाम
फईलुन122मुतकारिब
फाइलुन212मुतदारिक
मुफाईलुन1222हजज
फाइलातुन2122रमल
मुस्तफ्यलुन2212रजज
मुतफाइलुन11212कामिल
मुफाइलतुन12112वाफिर
मूल रूकन

मुजाहिफ रूकन-

सालिम रूकन या मूल रूकन की मात्रा को कम करने से जो रूकन बनता है, उसे मुजाहिफ रूकन कहते हैं ।

मुजाहिफ रूकन के उदाहरण-

सालिम रूकन मुफाईलुन- 1222 के तीसरी मात्रा 2 को घटा कर 1 करने पर मुफाइलुन 1212 बनता है ।
-इसी प्रकार-
मूल रूकन मुस्तफ्यलुन- 2212 रूकन से मफाइलुन 1212, फाइलुन 212, मफऊलुन 222 बनाया जाता है ।

रूकनों के पुनरावृत्ति का नाम

पुनरावृत्‍त की संख्‍यापुनरावृत्‍त का नाम
2 बारमुरब्‍बा
3 बारमुसद्दस
4 बारमुसम्‍मन

बहर नामकरण का उदाहरण-

  • 2122 / 2122 / 2122 फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलातुन
  • बहर का नाम=रूकन का नाम+ रूकन के पुनरावृत्ति का नाम+सालिम या मजहूफ
  • यहॉं रूकन का नाम रमल है, इसकी तीन बार पुनरावृत्ति हुई इसलिये मुसद्दस होगा और मूल रूकन है, इसलिये सालिम, इस प्रकार इस बहर का नाम ‘रमल मुसद्दस सालिम’ होगा ।
  • 2122 /2122 /212 फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलुुुन
  • बहर का नाम=रूकन का नाम+ रूकन के पुनरावृत्ति का नाम+सालिम या मजहूफ
  • यहॉं मूल रूकन का नाम रमल है, इसकी तीन बार पुनरावृत्ति हुई इसलिये मुसद्दस होगा और किन्‍तु तीसरे बार फाइलातुन 2122 के स्‍थान पर फाइलुन 212 आया है इसलिये मजहूब होगा, इस प्रकार इस बहर का नाम ‘रमल मुसद्दस मजहूब’ होगा ।

मूल रूकन 7 होते हैं, इनकी तीन प्रकार सेदो बार, तीन बार या चार बार पुनरावृत्‍त किया जा सकता है, इसलिये मूल रूकन से कुल 21 प्रकार के बहर बनेंगे-

बहरमूल रूकन का नामरूकन की पुनरावत्तिरूकन का भेदबहर का नाम
122/ 122मुतकारिब2 बार, मुरब्‍बासालिममुतकारिब मुरब्‍बा सालिम
122/ 122/ 122मुतकारिब3 बार, मुसद्दससालिममुतकारिब मुसद्दस सालिम
122/122/122/122मुतकारिब4 बार, मुसम्‍मनसालिममुतकारिब मुसम्‍मन सालिम
212/ 212मुतदारिक2 बार, मुरब्‍बासालिममुतदारिक मुरब्‍बा सालिम
212/ 212/212मुतदारिक3 बार, मुसद्दससालिममुतदारिक मुसद्दस सालिम
212/ 212/212/212मुतदारिक4 बार, मुसम्‍मनसालिममुतदरिक मुसम्‍मन सालिम
1222/1222हजज2 बार, मुरब्‍बासालिमहजज मुरब्‍बा सालिम
1222/1222/1222हजज3 बार, मुसद्दससालिमहजज मुसद्दस सालिम
1222/1222/1222/1222हजज4 बार, मुसम्‍मनसालिमहजज मुसम्‍मन सालिम
2122/2122रमल2 बार, मुरब्‍बासालिमरमल मुरब्‍बा सालिम
2122/122/2122रमल3 बार, मुसद्दससालिमरमल मुसद्दस सालिम
2122/2122/2122/2122रमल4 बार, मुसम्‍मनसालिमरमल मुसम्‍मन सालिम
2212/2212रजज2 बार, मुरब्‍बासालिमरजज मुरब्‍बा सालिम
2212/2212/2212रजज3 बार, मुसद्दससालिमरजज मुसद्दस सालिम
2212/2212/2212/2212रजज4 बार, मुसम्‍मनसालिमरजज मुसम्‍मन सालिम
11212/11212कामिल2 बार, मुरब्‍बासालिमकामिल मुरब्‍बा सालिम
11212/11212/11212कामिल3 बार, मुसद्दससालिमकामिल मुसद्दस सालिम
11212/11212/11212/11212कामिल4 बार, मुसम्‍मनसालिमकामिल मुसम्‍मन सालिम
12112/12112वाफिर2 बार, मुरब्‍बासालिमवाफिर मुरब्‍बा सालिम
12112/12112/12112वाफिर3 बार, मुसद्दससालिमवाफिर मुसद्दस सालिम
12112/12112/12112/12112वाफिर4 बार, मुसम्‍मनसालिमवाफिर मुसम्‍मन सालिम

मात्रा गिराने का नियम-

वास्तव में मात्रा गिराने का कोई नियम रिजु शास्‍त्र में नहीं कहा गया है किन्तु गजलकार जब गाफ यने कि दीर्घ मात्रा को बिना जोर दिये लाम यने लघु की तरह पढ़ते हैं तो इसे ही मात्रा गिराना कहते हैं । जब तक हम यह नहीं समझेगें कि मात्रा कब-कब गिराना चाहिये तबतक बहर में गजल लिखना सरल नहीं होगा । आइये इन्हीं स्थितियों को देखते हैं कि मात्रा कब-कब गिरता है-

  1. आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा इन स्वरों से बने दीर्घ अक्षर को गिरा कर लघु कर सकते हैं । यहां ध्यान रखना होगा कि शाश्‍वत दीर्घ का मात्रा नहीं गिराया जा सकता न ही अर्ध व्यंजन के योग से बने दीर्घ को लघु किया जा सकता ।
  2. आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा इन स्वरों से बने दीर्घ अक्षर को गिरा कर लघु केवल और केवल तभी कर सकते हैं जब ये दीर्घ शब्द के अंत में हो, षब्द के षुरू या मध्य में आने वाले दीर्घ को लघु नहीं किया जा सकता ।

मात्रा गिराने का उदाहरण-

  • ‘राखिये’ शब्‍द में ‘ये’ की मात्रा गिराई जा सकती है । किन्तु शाश्‍वत दीर्घ शब्‍द जैसे‘सम’ की मात्रा नहीं गिराई जा सकती । अर्धवर्ण के योग से बने दीर्घ जैसे ‘लक्ष्य’ ‘ल$क्ष्’ दीर्घ है इसमें मात्रा नहीं गिराई जा सकती ।
  • ‘काया’ श्‍ब्द में केवल ‘या’ का मात्रा गिराया जा सकता है ‘का’ का नहीं क्योंकि ‘का’ श्‍ब्द के प्रारंभ में है और ‘या’ अंत में ।
  • ‘रखेगा’ शब्द में ‘गा’ का मात्रा गिराया जा सकता है ‘खे’ का नहीं क्योंकि ‘खे’ श्‍ब्द के मध्य में आया है ।

एक बात ध्यान में रखें केवल और केवल श्‍ब्द के आखिर में आये दीर्घ को गिराकर लघु किया जा सकता है प्रारंभ और मध्य के दीर्घ का नहीं ।

मात्रा गिराने के नियम के अपवाद-

  1. समान्यतः ऐ स्वर और इनके व्यंजन के मात्रा नहीं गिराये जाते किन्तु ‘है’ और ‘मैं’ में मात्रा गिराया जा सकता है ।
  2. ‘मेरा’, ‘तेरा’ और ‘कोई’ ये तीन श्‍ब्द हैं जिसके प्रारंभ के दीर्घ को लघु किया जा सकता है । जैसे मेरा 22 में ‘मे’ को गिरा 12 किया जा सकता है ।

सारांश-जब किसी श्‍ब्द के अंत में ‘ आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा इन स्वरों से बने दीर्घ अक्षर’ आवे तो उसे गिरा कर लघु कर सकते हैं ! अपवाद स्वरूप् ‘मै’ और ‘है’ को लघु मात्रिक किया जा सकता है एवं ‘तेरा, मेरा और कोई’ श्‍ब्द के पहले दीर्घ को भी लघु किया जा सकता है !

सलाह-मात्रा गिराने से बचना चाहिये ।

तक्तीअ करना-

शेर में बहर को परखने के लिये जो मात्रा गणाना किया जाता है उसे तक्तीअ करना कहते हैं । यह वास्तव में किसी शब्द में लाम और गाफ का क्रम लिखना होता है जिससे निश्चित रूप से कोई न कोई रूकन फिर रूकन से बहर बनता है । गजल के मिसरे में गाफ (दीर्घ) और लाम (लघु) को क्रमवार लिखते हुये बहर का निर्धारण करना तक्तिअ कहलाता है । तक्तिअ करते समय बहर को शुद्ध रूप में लिखते हैं गिरे मात्रा के स्थान पर दीर्घ नहीं लिखते ।

तक्तिअ करने का उदाहरण पहला-

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

एक कब्रिस्तान में घर मिल रहा है
जिसमें तहखानों से तहखाने लगे हैं
(दुष्यंत कुमार)

जहॉं पर मात्रा गिराई गई है, रंगीन और बोल्‍ड कर दिया गया है-

अब तो इस ता / लाब का पा / नी बदल दो
2122 / 2122 / 2122
ये कँवल के / फूल कुम्हला / ने लगे हैं
2122 / 2122 / 2122

एक कब्रिस् / तान में घर / मिल रहा है
2122 / 2122 / 2122
जिसमें तहखा / नों से तहखा / ने लगे हैं
2122 / 2122 / 2122

तक्तिअ करने का उदाहरण दूसरा-

उसे अबके वफाओं से गुज़र जाने की जल्दी थी
मगर इस बार मुझको अपने घर जाने की जल्दी थी
मैं अपनी मुट्ठियों में कैद कर लेता जमीनों को
मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी
वो शाखों से जुदा होते हुए पत्ते पे हँसते थे
बड़े जिन्दा नज़र थे जिनको मर जाने की जल्दी थी
(राहत इन्दौरी)

जहॉं पर मात्रा गिराई गई है, रंगीन और बोल्‍ड कर दिया गया है-

उसे अबके / वफाओं से / गुज़र जाने / की जल्दी थी
1222 / 1222 / 1222 / 1222
मगर इस बा/ र मुझको अप/ ने घर जाने / की जल्दी थी
1222 / 1222 / 1222 / 1222

मैं अपनी मुट् / ठियों में कै / द कर लेता / जमीनों को
1222 / 1222 / 1222 / 1222
मगर मेरे / क़बीले को / बिखर जाने / की जल्दी थी
1222 / 1222 / 1222 / 1222

वो शाखों से / जुदा होते / हुए पत्ते / पे हँसते थे
1222 / 1222 / 1222 / 1222
बड़े जिन्दा / नज़र थे जिन / को मर जाने / की जल्दी थी
1222 / 1222 / 1222 / 1222

आलेख-रमेश चौहान
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करें मुकाबला चीन से अब

दोहे-

तोड़ें उसके दंभ को, दिखा रहा जो चीन ।
चीनी हमें न चाहिये, खा लेंगे नमकीन ।।

सरसी छंद-

सुनो सुनो ये भारतवासी, बोल रहा है चीन ।
भारतीय बस हल्ला करते, होतें हैं बल हीन ।।

कहां भारतीयों में दम है, जो कर सके बवाल ।
घर-घर तो में अटा-पड़ा है, चीनी का हर माल ।।

कहां हमारे टक्कर में है, भारतीय उत्पाद ।
वो तो केवल बाते करते, गढ़े बिना बुनियाद ।।

कमर कसो अब वीर सपूतो, देने उसे जवाब ।
अपना तो अपना होता है, छोड़ो पर का ख्वाब ।।

नही खरीदेंगे हम तो अब, कोई चीनी माल ।
सस्ते का मोह छोड़ कर हम, बदलेंगे हर चाल ।।

भारत के उद्यमियों को भी, करना होगा काम ।
करें चीन से मुकाबला अब, देकर सस्ते दाम ।।
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दो गजलें

दो गजलें
दो गजलें

खफा मुहब्बते खुर्शीद औ मनाने से

खफा मुहब्बते खुर्शीद औ मनाने से,
फरेब लोभ के अस्काम घर बसाने से ।

इक आदमियत खफा हो चला जमाने से,
इक आफताब के बेवक्त डूब जाने से ।

नदीम खास मेरा अब नही रहा साथी,
फुवाद टूट गया उसको अजमाने से ।

जलील आज बहुत हो रहा यराना सा..ब
वो छटपटाते निकलने गरीब खाने से ।

असास हिल रहे परिवार के यहां अब तो
वफा अदब व मुहब्बत के छूट जाने से

मेरे माता पिता ही तीर्थ हैं हर धाम से पहले

मेरे माता पिता ही तीर्थ हैं हर धाम से पहले
चला थामे मैं उँगली उनकी नित हर काम से पहले

उठा कर भाल मै चिरता चला हर घूप जीवन का,
बना जो करते सूरज सा पिता हर शाम से पहले

झुकाया सिर कहां मैने कही भी धूप से थक कर,
घनेरी छांव बन जाते पिता हर घाम से पहले

सुना है पर कहीं देखा नही भगवान इस जग में
पिता सा जो चले हर काम के अंजाम से पहले

पिताजी कहते मुझसे पुत्र तुम अच्छे से करना काम
तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले
-रमेश चौहान
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हिन्‍दी दिवस पर छंदमाला

Hindi Diwas
Hindi diwas

दोहे-

हिन्दी भाषी भी यहां, देवनागरी छोड़ ।
रोमन में हिन्दी लिखें, अपने माथा फोड़ ।।
देश मनाये हिन्दी दिवस, जाने कितने लोग ।
जाने सो माने नहीं, कैसे कहें कुजोग।।
देवनागरी छोड़ के, रोमन लिखे जमात ।
माॅं के छाती पर यथा, मार रहे हों लात ।।
दफ्तर दफ्तर देख लो, या शिक्षण संस्थान ।
हिन्दी कहते हैं किसे, कितनों को पहचान ।।
घाल मेल के रोग से, हिन्दी है बीमार ।
अँग्रेजी आतंक से, कौन उबारे यार ।।
हिन्दी की आत्मा यहाँ, तड़प रही दिन रात ।
देश हुये आजाद है, या है झूठी बात ।।
पहले हिन्दी हिन्द को, आप दीजिये मान ।
फिर भाषा निज प्रांत की, बोले आप सुजान ।।
प्रांत प्रांत से देश है, प्रांत देश का मान ।
ऊपर उठकर प्रांत से, रखें देश का भान ।।

दोहा मुक्तक-

फँसी हुई है जाल में, हिन्दी भाषा आज ।
अँग्रेजी में रौब है, हिन्दी में है लाज ।।
लोकतंत्र के तंत्र सब, अंग्रेजी के दास ।
अपनी भाषा में यहां, करे न कोई काज ।।

कुण्डलियां-

हिन्दी बेटी हिन्द की, ढूंढ रही सम्मान ।
ग्राम नगर व गली गली, धिक् धिक् हिन्दुस्तान ।
धिक् धिक् हिन्दुस्तान, दासता छोड़े कैसे ।
सामंती पहचान, बेड़ियाँ तोड़े कैसे।।
कह ‘रमेश‘ समझाय, करें माथे की बिन्दी ।
बन जा धरतीपुत्र, बड़ी ममतामय हिन्दी ।।
हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, लोक मन हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
मातृभाषा की बोल, खिले जस माथे बिन्दी ।।
भाषा-बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।

त्रिभंगी छंद-

भाषा यह हिन्दी, बनकर बिन्दी, भारत मां के, माथ भरे ।
जन मन की आशा, हिन्दी भाषा, जाति धर्म को, एक करे ।।
कोयल की बानी, देव जुबानी, संस्कृत तनया, पूज्य बने ।
एक दिवस ही क्यों, पर्व लगे ज्यों, निशदिन निशदिन, कंठ सने ।।
-रमेश चौहान
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कुछ मुक्‍तक

1. लफंगे

काया कपड़े विहीन नंगे होते हैं ।
झगड़ा कारण रहीत दंगे होते हैं।।
जिनके हो सोच विचार ओछे दैत्यों सा
ऐसे इंसा ही तो लफंगे होते हैं ।।

2. प्यार में मजबूर

तुम समझते हो तुम मुझ से दूर हो ।
जाकर वहां अपने में ही चूर हो ।।
तुम ये लिखे हो कैसी पाती मुझे,
समझा रहे क्यों तुम अब मजबूर हो ।।

3. औकात

कोई सुने ना सुने राग अपना सुनाना है ।
रह कर अकेले भी अपना ये महफिल सजाना है ।
परवाह क्यों कर किसी का करें इस जमाने में
औकात अपनी भी तो इस जहां को दिखाना है ।।

4. किसान

खून पसीना सा जो बहाते, वीर ऐसा नही देखा ।
पेट भरे जो तो दूसरो का, धीर ऐसा नही देखा ।
अन्न उगाते जो चीर कर धरती, कृषक कहाते हैं ।
विष भी पचाते है जो धरा में, हीर ऐसा नही देखा ।
(हीर-शंकर जी)

5. प्यार करना पड़ता है

अनदेखे अनसुने से हो जाये प्यार ऐसा नही देखा ।
आये ना सामने उससे हो तकरार ऐसा नही देखा ।।
तुझको करना पड़े है पहले से प्यार हो तो नही जाता ।
खुद-बा-खुद जल उठे तीली बेगार ऐसा नही देखा ।।

6. साजिश

साजिशों के दौर में किसे कहें हम सच्चा
आदमी ही आदमी को दे रहे हैं गच्चा
स्वार्थ अपनों से ही है दूसरों का क्या
देख लो घर में लोभ में बाजार जाता बच्चा
-रमेश चौहान
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पाँच प्रेरक कुण्‍डलियां Five Motivational kundaliyan

पाँच प्रेरक कुण्‍डलियां Five Motivational kundaliyan
पाँच प्रेरक कुण्‍डलियां Five Motivational kundaliyan (Photo by Pexels.com)

प्रेरक कुण्‍डलियां-

कठिनाई सर्वत्र है, चलें किसी भी राह ।
भ्रम बाधा सब तोड़िये, मन में भरकर चाह ।।
मन में भरकर चाह, बढ़ें मंजिल को पाने ।
नहीं कठिन वह राह इसे निश्चित ही जाने ।।
सुनलो कहे ‘रमेश’, हौसला है चिकनाई ।
हो यदि दृढ़ संकल्प, बचे ना कुछ कठिनाई ।।

मुश्किल भारी है नही, देख तराजू तौल ।
आसमान की दूरियां, अब है नहीं अतौल ।।
अब है नहीं अतौल, नीर जितने सागर में ।
लिये हौसले हाथ, समेटे हैं गागर में ।।
कहे बात ‘चैहान’, हौसला है बनवारी ।
रखें आप विष्वास, नहीं है मुश्किल भारी ।।

पाना हो जो लक्ष्य को, हिम्मत करें बुलंद ।
ध्येय वाक्य बस है यही, कहे विवेकानंद ।।
कहे विवेकानंद, रूके बिन चलते रहिये ।
लक्ष्य साधने आप, पीर तो थोड़ा सहिये ।
विनती करे ‘रमेष‘, ध्येय पथ पर ही जाना ।
उलझन सारे छोड़, लक्ष्य को जो हो पाना ।।

एक अकेले जूझिये, चाहे जो कुछ होय ।
समय बुरा जब होत है, बुरा लगे हर कोय ।
बुरा लगे हर कोय, साथ ना कोई देते ।
तब ईश्वर भी स्वयं, परीक्षा दुश्कर लेते ।।
छोड़ें देना दोष, जगत के सभी झमेले ।
सफल वही तो होय, बढ़े जो एक अकेले ।।

होते सकल जहान में, तीन तरह के लोग ।
एक समय को भूल कर, भोग रहे हैं भोग ।।
भोग रहे हैं भोग, जगत में असफल होकर ।
कोस रहें हैं भाग्य, रात दिन केवल सो कर ।।
एक सफल इंसान, एक पल ना जो खोते ।
कुछ ही लोग महान, समय से आगे होते ।
-रमेश चौहान
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शिक्षक दिवस पर कुछ दोहे

दोहे-

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लगते अब गुरूपूर्णिमा, बिते दिनों की बात ।
मना रहे शिक्षक दिवस, फैशन किये जमात ।

शिक्षक से जब राष्ट्रपति, हुये व्यक्ति जब देश।
तब से यह शिक्षक दिवस, मना रहा है देश ।

कैसे यह शिक्षक दिवस, यह नेताओं का खेल ।
किस शिक्षक के नाम पर, शिक्षक दिवस सुमेल ।।

शिक्षक अब ना गुरू यहां, वह तो चाकर मात्र ।
उदर पूर्ति के फेर वह, पढ़ा रहा है छात्र ।

‘बाल देवो भव‘ है लिखा, विद्यालय के द्वार ।
शिक्षक नूतन नीति के, होने लगे शिकार ।

शिक्षक छात्र न डाटिये, छात्र डाटना पाप ।
सुविधाभोगी छात्र हैं, सुविधादाता आप ।।

कौन उठाये अब यहां, कागजात के भार ।
शिक्षक करे पुकार है, कैसे हो उद्धार ।।

हुये एक शिक्षक यहां, देश के प्रेसिडेंट ।
मना रहे शिक्षक दिवस, तब से यहां स्टुडेंट ।।

सारे शिक्षक साथ में, करें व्यवस्था देख ।
आज मनाने टीचर्स डे, नेता आये एक ।।

क्षिक्षा एक व्यपार है, शिक्षक कहां सुपात्र ।
प्रायवेट के नाम पर, शिक्षक नौकर मात्र ।।
-रमेश चौहान