नारी का बहू रूप (कुण्‍डलियॉं)

नारी का बहू रूप
नारी नाना रूप में, बहू रूप में सार ।
मां तो बस संतान की, पत्नी का पति प्यार ।

जनता जनार्दन !

जनता जर्नादन

वाह करते
वाह करते है लोग
नेताओं पर
जब कटाक्ष होवे
व्यवस्थाओं की
कलाई खोली जाए
वही जनता
बंद कर लेते हैं
आँख, कान व मुॅंह
अपनी गलती में

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव
हिन्‍दी भाषीय भारतीय यदि बातचीत हिन्‍दी में ही कर रहे होते हैं किन्‍तु उनके हिन्‍दी को सुनकर अंग्रेजी बोलने का आभास होने लगे तो यह हिन्‍दी बोलचाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव ही है ।

नेताओं से बड़ा कौन ?

नेताओं से बड़ा कौन ? (कुण्‍डलियां)
नेता मुकुर समाज का, लख लो निज प्रतिरूप ।
नेता जने समाज ही, नहीं गर्भ से भूप ।।

कोराना पर कुण्‍डलियॉं

कोराना पर कुण्‍डलियॉं
घृणा रोग से कीजिये, रोगी से तो नाहिं ।
रोगी को संबल मिलत, रोग देह से जाहिं ।
रोग देह से जाहिं, हौसला जरा बढ़ायें ।
देकर हिम्‍मत धैर्य, आत्‍म विश्‍वास जगायें ।।
सुन लो कहे रमेश, जोड़ भावना लोग से ।
दें रोगी को साथ, घृण हो भले रोग से ।।

आई होली आई होली

आई होली आई होली, मस्ती भर कर लाई ।
झूम झूम कर बच्चे सारे, करते हैं अगुवाई ।

बच्चे देखे दीदी भैया, कैसे रंग उड़ाये ।
रंग अबीर लिये हाथों में, मुख पर मलते जाये ।
देख देख कर नाच रहे हैं, बजा बजा कर ताली ।
रंगो इनको जमकर भैया, मुखड़ा रहे न खाली ।
इक दूजे को रंग रहें हैं, दिखा दिखा चतुराई ।

आदि शङ्कराचार्य रचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद

आदि शङ्कराचार्य रचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद
चर्पट-लावणी
हरि का सुमरन कर ले बंदे, नश्‍वर है दुनियादारी ।
छोड़ रहें हैं आज जगत वह, कल निश्चित तेरी बारी ।।

दिवस निशा का क्रम है शाश्‍वत, ऋतुऐं भी आते जाते ।
समय खेलता खेल मनोहर, खेल समझ ना तुम पाते।।
आयु तुम्‍हारी घटती जाती, खबर तनिक ना तुम पाये ।
हरि सुमरन छोड़ जगत से, तुम नाहक मोह बढ़ाये ।।1।।

राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां

राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां
कोयल कौआ एक सा, नहीं रंग में भेद ।
राजनीति का रंग भी, कालिख श्‍याम अभेद ।।
कालिख श्‍याम अभेद, स्‍वार्थ है अपना अपना ।
कोई नहीं तटस्‍थ, सभी कोई है ढपना ।।
फेकू पप्‍पू रंग, भक्‍त चम्‍मच ठकठौआ ।
करे कौन पहचान, श्‍याम है कोयल कौआ ।।

अनुष्‍टुप छंद विधान और उदाहरण

अनुष्‍टुप छंद एक वैदिक वार्णिक छंद है । इस छंद को संस्‍स्‍कृत में प्राय: श्‍लोक कहा जाता है या यों कहिये श्‍लोक ही अनुष्‍टुप छंद है । संस्‍कृत साहित्‍य में सबसे ज्‍यादा जिस छंद का प्रयोग हुआ है, वह अनुष्‍टुप छंद ही है ।

सरसी छंद विधान और प्रयोग

सरसी छंद एक बहुत ही लोकप्रिय छंद है। जहां भोजपुरी भाषाई क्षेत्र में सर शिक्षण में होली गीत गाए जाते हैं वहीं छत्तीसगढ़ के एक समुदाय द्वारा इसे एक लोक नृत्य लोकगीत के रूप में राउत दोहा के रूप में प्रयोग किया जाता है । इस प्रकार यह सरसी छंद लोक छंद के रूप में भी प्रचलित है ।