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सब रोगों का मूल है कब्‍ज

कब्‍ज क्‍या है –

अधिकांश लोगों से हम प्राय: सुनते हैं कि आज मेरा पेट साफ नहीं हुआ । मल का साफ न होना ही कब्जियत है ।  कब्जियत से अधिकांश लोग परेशान है । कब्‍ज सभी रोगों का मूल है । कहा गया है- ‘सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मला:’ अर्थात सभी रोगों का कारण मल का कुपित होना ही है ।

कब्ज होने का कारण –

कब्‍ज होने का प्रमुख कारण अनियमित खान-पान एवं अनियमित रहन-सहन दिनचर्या है, इसके अतिरिक्‍त इसके कारण इसप्रकार हैं-

  1. शौच के वेग को रोकना ।
  2. पानी कम पीना ।
  3. समय पर भोजन न करना ।
  4. अच्‍छे से चबा कर भोजन न करना ।
  5. जल्द-जल्‍दी भोजन करना ।
  6. भूख से अधिक भोजन करना ।
  7. गरिष्‍ठ भोजन करना ।
  8. नींद की कमी होना ।
  9. मानसिक चिंता बना रहना ।

निदान

कहा जाता है कि –‘कारण ही निवारण’ है अर्थात जो जिस कारण से उत्‍पन्‍न हो, उस कारण को ही समाप्‍त कर दिया जाये तो उस समस्‍या का निदान अपने आप हो जाता है । इसलिये कब्‍ज से बचने के लिये सबसे पहले ये उपाय करना चाहिये-

  • अपनी दिनचर्या व्‍यवस्थित करें ।
  • नियत समय पर भोजन करें ।
  • शौच के वेग को कभी न रोकें ।
  • प्रतिदिन कम से कम आठ गिलास अर्थात 2 लिटर पानी अवश्‍य पीयें ।
  • भोजन अच्छे से चबा कर करें एवं भोजन करते समय पानी न पीयें ।
  • गरीष्‍ठ भोजन न करें ।
  • नींद अच्‍छे से लें ।
  • प्रयास करें मानसिक चिंता न हो ।

घरेलू उपचार-

  • कब्‍ज दूर करने का सर्वोत्‍तम उपाय बेल का सेवन है । मौसम अनुकूल यदि पका हुआ बेल उपलब्‍ध हो तो इसका सेवन कब्‍ज का रामबाण औषधी है । पक्‍के बेल के गुदे का सीधा-सीधा सेवन कर सकते हैं अथवा बेल के शरबत का भी सेवन कर सकते हैं । जिस समय पका बेल नहीं मिलता उस समय बेल का मुरब्‍बा अथवा सूखे बेल का चूर्ण भी अत्‍यंत लाभकारी है ।
  • कब्‍ज दूर करने में भुने हुये चने का सत्‍तू बहुत ही कारगर होता है । इसके लिये चने को पहले अच्‍छे से भुन ले फिर भुने हुये चने का पीसकर आटा बना लें । स्‍वादानुसार काला नमक मिले लें और इसे नित्‍य सुबह-शाम 50 ग्राम के अनुमान से सेवन करें ।
  • कब्‍ज अधिक हो तो हर्रा एवं ईसबगोल का मिश्रण सर्वोत्‍तम है ।  इसके लिये सबसे पहले हर्रे को एरण्‍ड़ के तेल में भुन लें, फिर भुनें हुये हरें का चूर्ण बना लें । इस हर्रे का चूर्ण एवं ईसबगोल की भूसी को बराबर मात्रा में मिला लें ।  इस मिश्रण को प्रतिदिन सोने के पूर्व एक या दो चम्‍मच पानी के साथ लें ।

योगासान से कब्‍ज दूर करना-

योगासान ही तन एवं मन से स्‍वस्‍थ रहने का एक सर्वोत्‍तम साधन है । भिन्‍न-भिन्‍न व्‍याधी के भिन्‍न-भिन्‍न योगासान कहे गये हैं । कब्‍ज को दूर करने के लिये निम्‍न आसन सुझाये गये हैं-

पश्चिमोत्‍तासन- इसके लिये दोनों पॉंवों को लम्‍बा सीधा फैलावें, फिर दोनों हाथों की अंगुलियों से दोनों पैरों के अंगुलियों को खींचकर पकड़ें, अब धीरे-धीरे अपने माथे को अपने घुटने पर लगाने का प्रयास करें । उसी क्रम में विलोम करते हुए वापस आवें ।

वज्रासन- इसके लिये घुटने के बल बैठकर, दोनों पैर के अँगूठे को जोड़ते हुये एडि़यों को फैला ले फिर फैले हुये एडि़यों के मध्‍य अपने नितम्‍भ को रखें ।

उत्‍तानपादासन- इसके लिये सीधे लेटकर शरीर के संपूर्ण स्‍नायु को ढीले कर ले, फिर दोनों पैरों को धीरे-धीरे यथा शक्ति ऊपर उठावें । प्रयास करते हुये भूमि और उठे हुये पैरों के मध्‍य 60 अंश का कोण बनाने का प्रयास करें । फिर उठे हुये पैर को धीरे-धीरे भूमि पर वापस रखें । यह क्रिया तीन-चार बार दोहरावें ।

जानुशिरासन – इसके लिये पहले दायें पैर को सीधा फैलायें फिर बाये पैर को की एड़ी को गुदा और अंडकोष के बीच लगायें, बायें पाद-तल से फैले हुये पैर के रान को दबावें, फिर दोनों हाथ से फैले हुये पैर की अंगुलियों को खींचें और धीरे-धीरे झुककर माथे को घुटने से लगाने का प्रयास करें । फिर इसका विलोम दूसरे पैर से यही क्रिया करें ।

पवनमुक्‍तासन- इसके लिये पहले एक पैर को पसार कर रखें, दूसरे पैर को घुटने से मोड़कर पेट पर लगाकर दोनों हाथों से अच्‍छी प्रकार दबायें । नाक को घुटनों पर लगाने का प्रयास करें । यही क्रिया दूसरे पैर से करें तत्‍पश्‍चात दोनों पैरों से यही क्रिया करें ।

मल साफ तो तन साफ

‘मल साफ तो तन साफ’ यदि कब्‍ज को दूर कर लिया गया तो शरीर निश्चित रूप से स्‍वस्‍थ होगा मन भी स्‍वस्‍थ रहेगा । इसलिये हमें कब्‍ज न हो इसके लिये गंभीर प्रयास करना ही चाहिये ।

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लंबे, घने एवं काले बाल प्राप्त करने की प्राकृतिक तरीके

प्रकृति का सौंदर्य-

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सौंदर्य सृष्टि का एक अभिन्न अंग हैं । प्रकृति स्वयं में सौंदर्य का अक्षय निधि है । प्रकृति को देख कर सृष्टि के सारे प्राणी प्रफूल्लित होकर नाचते गाते रहते हैं । मोर का नाचना, कोयल का कुहकना प्रकृति के प्रति अनुराग को ही दर्शाता है । हरे-भरे खेत खलिहान देख कर किसान का मन नाचने लगते है, मंद सुगंध से सुवासित रंग-बिरंगे फूल को देख कर तितलियां मंडराने लगती है, भवरे मधुपान करने आतुर हो जाता है वहीं मनुष्‍य भी इस मादकता के आगोस में समा जाता है । प्रकृति स्‍वयं में सुंदर है ही और अपने सहचर्ययों को भी सुंदर बनाने में प्रथम सहयोगी की रूप में सदैव प्रस्तुत रहती है । प्रकृति से जुड़ रहने पर सौंदर्य नैसर्गिक रूप से प्राप्‍त होता है ।

मानव का सौंदर्य के प्रति अनुराग-

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मनुष्‍य अपने सौंदर्य के प्रति सचेत एवं जागरूरक रहता है । अपने सौंदर्य को निखारने के लाखों प्रयास करते रहते हैं । सौंदर्य व्यक्ति चेहरों एवं बालों पर ही विशेष रूप से निर्भर होता है । जहॉं सौंदर्य देखने में आकर्षक होता है, मनभावन होता है, वहीं व्‍यक्तित्‍व को भी प्रदर्शित करता है । मनुष्‍य अपने नख से शीख तक हर अंगों को खूबसूरत बनाने सदैव प्रयास रत रहते हैं । रूप निखारने, सौंदर्य को सौंदर्य प्रदान करने में हमारे सिर के केशों कीमहत्‍वपूर्ण भूमिका है । अपने बालों को सँवारने, उनके देख-रेख के लिये महिलाओं के साथ-साथ पुरूष भी ललायित रहते हैं ।

बालों की समस्‍याएं-

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बालों का असमय सफेद होना एवं बालों का झड़ना लोगों के लिये आज एक चिंता का कारण बन गया है । बालों का बदरंग होना, डेंड्रप, जुँए की परेशानी बालों का बिमारी है । इसी चिंता को ध्यान में रखते हुय हम ऐसे तरीकों का खोज करते रहते हैं जो ज्यादा प्रभावी, ज्यादा विश्वसनिय और सहज उपलब्ध हो । प्रकृति से अधिक प्रभावी, विश्वसनीय और सहज उपलब्ध भला और कहां होगा ? इसलिये हमें उन प्राकृतिक उपायों को देखते हैं जिससे बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं-

बालोें की समस्‍या के लिये प्राकृतिक उपचार-

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  1. तुलसी पत्ती, भृंगराज पत्ती एवं आँवला का लेप-इन तीनों को अच्छे से पीस कर लेप बना लें, इस लेप को अपने बालों पर लगायें, इससे बाल का झड़ना एकदम से रूक जाता है । इसके साथ-साथ बाल काले एवं घने भी होते हैं ।
  2. गुडहल का पुष्प-गुडहल के पुष्प को पीसकर लेप इस लेप को बालों में अच्छे से मलें, यह गंजापन को दूर करने का शक्ति रखता है, इसलिये इससे बालों का झड़ना निश्चित रूप से रूक जाता है । इसके नियमित उपयोग से बाल काले एवं घने होते हैं ।
  3. नींबू रस एवं आँवले का लेप-एक नींबू का रस, दो चम्मच पानी चार चम्मच पिसा हुआ आँवला मिलाकर एक लेप तैयार कर लें, यदि पेस्ट न बनें तो पानी और मिला दें, इसे एक घंटा भीगने दें, फिर सिरपर लेप करें । एक घंटे बाल सिर धोयें । साबुन शैम्पू का प्रयोग न करें । बाल धोते समय यह विशेषा ध्यान रखें कि इस लेप का पानी आँखों में न पड़े । हर चौथे दिन यह प्रयोग दुहरायें । ऐसा करने कुछ ही माह में बाल काले, लंबे एवं घने हो जाते हैं ।
  4. आँवला पानी- सूखे आँवलें को रात भर भींगने के छोड़ दे, सुबह इसी पानी से बाल को धोयें, इस से बालों का जड़ मजबूत होता है, बालों का झड़ना रूक जाता है एवं बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं ।
  5. आम का लेप- कच्चे आम के छिलके हटाकर इसमें कुछ हरे मुलायम आम की पत्ती मिलाकर इसे अच्छे से पीसकर लेप बना लें । इस लेप को एक घंटे के लिये धूप में सूखा दे फिर इससे अपने बालों को धोयें । इससे बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं ।
  6. प्याज का लेप-एक प्याज के छिलके को उतार कर इसे अच्छे से पीसकर इसका लेप तैयार कर लें । इस लेप को अपने बालों में लगायें कुछ सूख जाने के पष्चात अपने बालों को धोयें । ऐसा करने पर बाल काले, लंबे एवं घने हो जाते हैं ।
  7. केले का लेप- केले का लेप बनाने के लिये एक केले लेकर इसका छिलका उतार कर इसे मसल लें, इसमें 2 चम्मच दही और 2 चम्मच गुलाब जल मिलाकर अच्छे से मिला दें । इस लेप को अपने बालों पर नहाने के पहले लगा लें, कम से कम आधा घंटा इसे सूखने दें। सूखने के बाद अपने बालों को धोयें । इससे बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं ।
  8. कनेर का जड़ एवं लौकी का लेप-कनेर की जड़ की छाल और लौकी दोनों को 10-10 ग्राम के अनुमान में गाय के दूध के साथ पीसकर लेप बना लें, इस लेप से बालों को धोयें । इससे से बालों का झड़ना रूक जाता है ।
  9. डेण्ड्रफ होने पर- डेण्ड्रफ बालों के झड़ने के एक बड़ा कारण है इसे रोकने के लिये ग्लिसरिन एवं गुलाबजल को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर नहाने के पहले चेहरे पर, गले पर एवं माथे पर अच्छे से लेप कर लें, 5 मीनट इसे सुखने दें फिर दही अथवा मही से बाल धोते हुये स्नान करें इससे डेण्ड्रफ का रोकथाम होता और बालों का झड़ना रूक जाता है ।
  10. जुओं के लिये-जुओं को समाप्त करने के लिये नींबू का रस एवं अदरक के रस को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर बालों के जड़ों पर अच्छे से लगायें, रस लगाने एक घंटे बाद सिर धोयें । सिर धोने के बाद नींबू का रस एवं सरसों का तेल बराबर मात्रा में लेकर बालों में लगायें । ऐसा करने पर जुएँ समाप्त हो जाते हैं ।
उपरोक्त विधियों में जो विधि आपके अनुकूल हो उस विधि का प्रयोग करके आप अपने बालों को घने,काले एवं घने बना सकते हैं ।
-रमेश चौहान

स्रोत- विकिपिडिया, आयुर्वेद विशेषांक, कल्‍याण

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पुदीना का रासायनिक संगठन एवं औषधि उपयोग

पुदीना एक सुगन्धित एवं उपयोगी पौधा है । आयुर्वेद के अनुसार यह स्वादिष्ट, रूचिकर, पचने में हलका, तीक्ष्ण, विकृत कफ को बाहर निकालनेवाला एवं चित्त को प्रसन्न करने वाला होता है ।
यह ज्वर, कृमि, अरूचि, अफरा, दस्त, खाँसी, श्वास, निम्न रक्तचाप, मूत्राल्पता, त्वचा रोग, हैजा, अजीर्ण, सर्दी-जुकाम आदि जैसे रोगों में औषधि के रूप में उपयोगी है ।
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पुदीना का रासायनिक संगठन-

ताजी पत्ती में 0.4-0.6 प्रतिशत तेल होता है। तेल का मुख्य घटक मेन्थोल 65-75 प्रतिशात, मेन्थोन 7-10 प्रतिशत तथा मेन्थाइल एसीटेट 12-15 प्रतिशत तथा टरपीन (पिपीन, लिकोनीन तथा कम्फीन) है। पुदीना में विटामिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । इसमें रोगप्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न करने की सामथ्र्य है ।

औषधि के रूप में उपयोग-

पुदीना सहज सुलभ पौधा है इसे आप अपने क्‍यारी में रोप सकते हैं, यह सहज में लगने वाला व फैलने वाला पौधा है । इसकी ताजी पत्‍ती, ताजे रस प्रयोग में लाये जाते हैं । इसके औषधि गुण को देखते हुये बहुत सारे दवा उत्‍पादक कंपनी इस पु‍दीना के रस का मार्केटिंक कर रहे हैं यह तरल रूप में, अर्क के रूप में, कैप्‍सूल के रूप में बाजार में सहज ही उपलब्‍ध होता है । यह विभिन्‍न रोगों में कारगार होता है । इसमें कुछ उपयोग इस प्रकार हैं-

1. मलेरिया में-

पुदीना एवं तुलसी के पत्तों के काढ़ा अथवा पुदीना एवं अदरक का रस एक-एक चम्मच सुबह-शाम लेने से मलेरिया रोग का शमन होता है ।

2. गैस एवं पेट के कृमि में-

पुदीना के दो चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने से गैस एवं पेट के कृमि नष्ट हो जाते हैं ।

3. सर्दी-जुकाम एवं न्यूमोनिया में-

पुदीना एवं अदरक के एक-एक चम्मच रस एक चम्मच शहद में मिलाकर दिन में दो बार पीने एवं पुदीना रस की दो-तीन बूँदे कान में डालने से सर्दी-जुकाम एवं न्यूमोनिया में विशेष लाभ होता है ।

4. मासिक धर्म अल्पता में-

मासिक धर्म न आने पर, कम आने पर पुदीना के काढ़े में गुड़ एवं चुटकीभर हींग डालकर पीने से लाभ होता है । इसी प्रकार के सेवन से मासिक धर्म के कारण उत्पन्न दर्द का भी नाश होता है ।

5. अजीर्ण अथवा अपच में-

अजीर्ण अथवा अपच होने की स्थिति में केवल पुदीना अर्क अथवा पुदीना रस में शहद मिलाकर पीने से लाभ होता है ।

6. दाद में-

पुदीना के रस में नींबू रस मिलाकर दाद से प्रभावित क्षेत्र में लगाने पर दाद का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है ।

7. उल्टी-दस्त, हैजा में-

उल्टी-दस्त होने पर पुदीना के रस में नींबू का रस, अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पीने से के अथवा केवल पुदीना अर्क पीने से लाभ होता है ।

8. बिच्छू के दंश में-

बिच्छू अथवा अन्य जहरीले जुतुओं के दंश के शमन के लिये पुदीना का रस उस स्थान पर लगायें एवं पुदीना रस पर मिसरी मिलाकर पीने से लाभ होता है ।

9. हिस्टीरिया में-

ताजे पुदीना रस को गर्म करके सुबह-शाम नियमित सेवन करने से हिस्टीरिया में लाभ होता है ।

10. मुख दुर्गन्ध को ठीक करने में-

पुदीना के रस में पानी मिलाकर अथवा पुदीना के का काढ़े का घूँट मुँह में भरकर रखे, फिर उगल दे । यह क्रिया दो-चार बार करें । इससे दुर्गन्ध का नाश होता है ।

11. बेहोशी दूर करने में-

पुदीना की ताजी पत्ती को मसल कर बेहोश व्यक्ति को सूँघाने से बेहोशी दूर होता है ।

12. पेट दर्द में-

पुदीना रस में थोड़ा-थोड़ा जीरा, हींग, कालीमिर्च और नमक मिलाकर गर्म करके पीने से पेट दर्द में शीघ्रता से लाभ होता है । केवल पुदीना अर्क लेने से भी लाभ होता है ।

13. प्रसव दर्द में –

प्रसव के समय पुदीना रस पीलाने से प्रसव दर्द कम हो जाता है और प्रसव में भी सुविधाजनक रूप से होता है ।

14. तलवे में जलन-

तलवे में जलन होने की स्थिति में तलवे पर पुदीना रस से मसाज करने पर तलवे के जलन शांत होता है ।

15. मुँहासे होने पर-

पुदीना रस में कुछ बूँदे नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लेप करे, कुछ समय इसे सूखने के लिये छोड़ दें, सूख जाने के पश्चात साफ पानी से चेहरा धो लें । इस प्रकार नियमित रूप से करने पर चेहरे के मुँहासे समाप्त होने लगते हैं ।

16. जुएं होने पर-

अपने बाल धोने के शैम्पू में पुदीना रस मिलाकर अपने बाल पर लगाये इसे सूखने दें, सूखने के पश्चात इसे अच्छे से धो लें, इस प्रकार नियमित रूप से करने पर सिर के जुएं नष्ट हो जाते हैं ।

17. लू से बचने में-

गर्मी के दिनों मेे पुदीना का रस पीकर घर से बाहर निकले इससे लू लगने का भय दूर हो जाता है । यदि ज्यादा समय तक घर से बाहर हों तो पुदीना अर्क रख कर चले और निश्चित अंतराल पर इसका सेवन करते रहें ।

18. चेहरे के रूखापन को दूर करने में-

पुदीना रस को दही या शहद में मिलाकर चेहरा साफ करने से चेहरे का रूखापन दूर होता है ।

19. लिवर की सक्रियता बढ़ाने में-

पुदीना का नियमित रूप से सेवन करने पर लिवर की सक्रियता मं वृद्धि होती है ।

20. स्मरण शक्ति तेज करने में-

पुदीना के नियमित सेवन से स्मरण शक्ति में वृद्धि होता है ।

पुदीना आयुर्वेद के अनुसार एक अच्छी औषधी है । घरेलू उपचारों का एक अच्छा साधन है । उपरोक्त सभी उपाय लोगों के अनुप्रयोगिक अनुभवों के आधार पर है । ऐसे इसका कोई साइडइफेक्ट नहीं है किन्तु ‘अति सर्वत्र वर्जयते’ इसलिये इसका प्रयोग जिस रोग के लिये कर रहे हैं । उस रोग के निदान होते ही इसका प्रयोग बंद कर दें ।
प्रत्येक व्यक्ति का तासिर अलग-अलग होता है । जिसे वह स्वयं अथवा उनका चिकित्सक ही जान सकता है अतः अपने तासिर एवं चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार प्रयोग करें ।

-रमेश चौहान

स्रोत-

  • आयुर्वेद विशेषांक
  • विकिपिडिया
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दीर्घायु जीवन का रहस्य

इस जगत ऐसा कौन नहीं होगा जो लंबी आयु, सुखी जीवन न चाहता हो । प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह सुखी रहे, जीवन आनंद से व्यतित हो और वह पूर्ण आयु को निरोगी रहते हुये व्यतित करे । मृत्यु तो अटल सत्य है किंतु असमायिक मृत्यु को टालना चाहिये क्योंकि अथर्ववेद में कहा गया है-‘‘मा पुरा जरसो मृथा’ अर्थात बुढ़ापा के पहले मत मरो ।

बुढ़ापा कब आता है ?

  • वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह ज्ञात किया गया है कि जब तक शरीर में सेल (कोशिकाओं) का पुनर्निमाण ठीक-ठाक होता रहेगा तब तक शरीर युवावस्था युक्त, कांतियुक्त बना रहेगा । यदि इन सेलों का पुनर्निमाण किन्ही कारणों से अवरूध हो जाता है तो समय के पूर्व शरीर में वृद्धावस्था का लक्षण प्रकट होने लगता है ।

मनुष्य की आयु कितनी है? 

  • वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय शोधों के अनुसार वर्तमान में मनुष्य की औसत जीवन प्रत्याशा 60 से 70 वर्ष के मध्य है । इस जीवन प्रत्यशा को बढ़ाने चिकित्सकीय प्रयोग निरंतर जारी है ।
  • किन्तु श्रृति कहती है-‘शतायुवै पुरूषः’ अर्थात मनुष्यों की आयु सौ वर्ष निर्धारित है । यह सौ वर्ष बाल, युवा वृद्ध के क्रम में पूर्ण होता है । 

क्या कोई मरना चाहता है ?

  • महाभारत में विदुर जी कहते हैं- ‘अहो महीयसी जन्तोर्जीविताषा बलीयसी’ अर्थात हे राजन जीवन जीने की लालसा अधिक बलवती होती है । 
  • आचार्य कौटिल्य कहते हैं- ‘देही देहं त्यकत्वा ऐन्द्रपदमपि न वांछति’ अर्थात इन्द्र पद की प्राप्ति होने पर भी मनुष्य देह का त्याग करना नहीं चाहता ।
  • आज के समय में भी हम में से कोई मरना नहीं चाहता, जीने का हर जतन करना चाहता है। वैज्ञानिक अमरत्व प्राप्त करने अभीतक कई असफल प्रयास कर चुके हैं और जीवन को सतत् या दीर्घ बनाने के लिये अभी तक प्रयास कर रहे हैं ।

अकाल मृत्यु क्यों होती है ?

  • यद्यपि मनुष्य का जीवन सौ वर्ष निर्धारित है तथापि सर्वसाधारण का शतायु होना दुर्लभ है । विरले व्यक्ति ही इस अवस्था तक जीवित रह पाते हैं 100 वर्ष के पूर्व अथवा जरा अवस्था के पूर्व मृत्यु को अकाल मृत्यु माना जाता है ।
  • सप्तर्षि में से एक योगवसिष्ठ के अनुसार-

मृत्यों न किचिंच्छक्तस्त्वमेको मारयितु बलात् ।मारणीयस्य कर्माणि तत्कर्तृणीति नेतरत् ।।

  • अर्थात ‘‘हे मृत्यु ! तू स्वयं अपनी शक्ति से किसी मनुष्य को नही मार सकती, मनुष्य किसी दूसरे कारण से नहीं, अपने ही कर्मो से मारा जाता है ।’’ इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि मनुष्य अपनी मृत्यु को अपने कर्मो से स्वयं बुलाता है । जिन साधनों, जिन कर्मो से मनुष्य शतायु हो सकता है उन कारणों के उल्लंघन करके अपने मृत्यु को आमंत्रित करता है ।

दीर्घायु होने का क्या उपाय है ?

  • विज्ञान के अनुसार जब तक शरीर में कोशिकाओं का पुनर्निमाण की प्रक्रिया स्वस्थ रूप से होती रहेगी तब तक शरीर स्वस्थ एवं युवावस्था युक्त रहेगा । 
  • कोशिकाओं की पुनर्निमाण की सतत प्रक्रिया से वृद्धावस्था असमय नहीं होगा । सेल के पुनर्निमाण में विटामिन ई, विटामिन सी, और कोलिन ये तीन तत्वों का योगदान होता है । इसकी पूर्ती करके दीर्घायु बना जा सकता है ।
  • व्यवहारिक रूप से यदि देखा जाये तो एक साधन संपन्न धनवान यदि इसकी पूर्ती भी कर ले तो क्या वह शतायु बन जाता है ? उत्तर है नहीं तो शतायु कैसे हुआ जा सकता है ।
  • श्री पी.डी.खंतवाल कहते हैं कि -‘‘श्रमादि से लोगों की शक्ति का उतना ह्रास नहीं होता, जितना आलस्य और शारीरिक सुखासक्ति से होता है ।’’ यह कथन अनुभवगम्य भी है क्योंकि अपने आसपास वृद्धों को देखें जो जीनका जीवन परिश्रम में व्यतित हुआ है वह अरामपरस्त व्यक्तियों से अधिक स्वस्थ हैं । इससे यह प्रमाणित होता है कि दीर्घायु जीवन जीने के लिये परिश्रम आवश्यक है ।
  • देखने-सुनने में आता है कि वास्तविक साधु-संत जिनका जीवन संयमित है, शतायु होते हैं इससे यह अभिप्रमाणित होता है कि शतायु होने के संयमित जीवन जीना चाहिये ।

धर्मशास्त्र के अनुसार दीर्घायु जीवन-

  • महाभारत के अनुसार- ‘‘आचारश्र्च सतां धर्मः ।’’ अर्थात आचरण ही सज्जनों का धर्म है । यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि धर्म कोई पूजा पद्यति नहीं अपितु आचरण है, किये जाने वाला कर्म है । 
  • ‘धर्मो धारयति अति धर्मः’’ अर्थात जो धारण करने योग्य है वही धर्म है । धारण करने योग्य सत्य, दया साहचर्य जैसे गुण हैं एवं धारण करने का अर्थ इन गुणों को अपने कर्मो में परणित करना है ।
  • महाराज मनु के अनुसार- ‘‘आचाराल्लभते ह्यायुः ।’’ अर्थात आचार से दीर्घ आयु प्राप्त होती है ।
  • आचार्य कौटिल्य के अनुसार- ‘‘मृत्युरपि धर्मष्ठिं रक्षति ।’’ अर्थात मृत्यु भी धर्मपरायण लोगों की रक्षा करती है ।
  • ऋग्वेद के अनुसार- ‘न देवानामतिव्रतं शतात्मा च न जीवति ।’’ अर्थात देवताओं के नियमों को तोड़ कर कोई व्यक्ति शतायु नहीं हो सकता । यहाँ देवताओं के नियम को सृष्टि का, प्रकृति का नियम भी कह सकते हैं । 
  • समान्य बोलचाल में पर्यावरणीय संतुलन का नियम ही देवाताओं का नियम है, यही किये जाना वाला कर्म है जो आचरण बन कर धर्म का रूप धारण कर लेता है । अर्थात प्रकृति के अनुकूल आचार-व्यवहार करके दीर्घायु जीवन प्राप्त किया जा सकता है ।

जीवन की सार्थकता-

  • एक अंग्रेज विचारक के अनुसार- ‘‘उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से जीवित माना जा सकता है, जो सद्विचार, सद्भावना और सत्कर्म से युक्त हो ।’’
  • चलते फिरते शव का कोई महत्व नहीं होता थोडे़ समय में अधिक कार्य करने वाला मनुष्य अपने जीवनकाल को बढ़ा लेता है । आदि शांकराचार्य, स्वामी विवेकानंद जैसे कई महापुरूष अल्प समय में ही बड़ा कार्य करके कम आयु में शरीर त्यागने के बाद भी अमर हैं ।
  • मनुष्यों की वास्तविक आयु उनके कर्मो से मापी जाती है । धर्म-कर्म करने से मनुष्य की आयु निश्चित रूप से बढ़ती है ।

‘‘धर्मो रक्षति रक्षितः’’ यदि धर्म की रक्षा की जाये अर्थात धर्म का पालन किया जाये तो वही धर्म हमारी रक्षा करता है । यही जीवन का गुण रहस्य है । यही दीर्घायु का महामंत्र है ।