Posted in आलेख रत्‍न, धर्म-कर्म-अध्‍यात्‍म

कर्म और भाग्य में अंतर्संबंध

भारतीय दर्शन-

karma aur bhagya
karma aur bhagya

भारतीय दर्शन के अनुसार मानव मन का क्‍लेश तभी दूर होता है, मन की अशांति तभी तृप्त होती है जब सत्‍य से परिचय होता है । सत्‍य तत्‍व का ज्ञान ही भारतीय दर्शन है । गीता में कहा गया है -”किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः” अर्थात क्‍या करना चाहिये और क्‍या नहीं करना चाहिये का निर्धारण सहज नहीं है, इसे तो सत्‍‍‍य तत्‍व सेे ही जाना जा सकता है । करने योग्‍य कार्य और न करने योग्‍य कार्य दोनों ही कर्म हैं और इन्‍हीं कर्मो से भाग्‍य का निर्माण होता है । कर्म एवं भाग्य का प्रभाव जीवन पर निश्चित ही दिखता है। कभी-कभी कर्म पर भाग्य प्रभावी दिखता है तो कभी-कभी भाग्य पर कर्म ! क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये इस बात को निश्चित कर लेने के पश्चात किये गये कर्म के साथ भाग्य सदैव खड़ा रहता है । भाग्य और कर्म को लेकर द्वन्द सा दिखाई देता है । कुछ लोग अपने आप को भाग्यवादी मान कर कर्म को नकारते हैं तो कुछ लोग कर्मवादी होने के नाम पर भाग्य को । एक दूसरे के अस्तित्व को नकारना उसी प्रकार है जैसे घने कुहासा या घने बादल में ढके सूर्य के अस्तित्व को नकाराना । वास्तव में दोनों का अस्तित्व हैं । हमें इन दोनों के अस्तित्व और इनके अंतर्संबंध को समझने का प्रयास करना चाहिये ।

कर्म और भाग्‍य में द्वन्‍द-

वास्‍तव में कर्म एवं भाग्‍य एक दूसरे के पूरक हैं जहां कर्म से भाग्‍य का निर्माण होता है वहीं भाग्‍य से कर्म सहज अथवा कठिन हो सकता है । दोनों एक दूसरें में अंतर्निहित हैं किन्‍तु अपने चारों ओर के लोगों को देखने पर इन दोनों में द्वन्‍द होने का आभास होता है । लोग दो भागों में बटे हुये दिखाई देते हैं- एक कर्मवादी और दूसरा भाग्‍यवादी । कर्मवादी कहते हैं-

उद्योगिनं पुरूषसिंहमुपैति लक्ष्मी,
दैवं हि दैवम् इति कापुरूषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरू पौरूषम् आत्मशक्त्या,
यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोअत्र दोष: ।।
-पंचतंत्र, मित्रसम्प्राप्ति 

वहीं भाग्‍यवादी अपने पक्ष में तर्क देते हुये कहते हैं-

समुद्र-मथने लेभे हरिः, लक्ष्मीं हरो विषम्।
भाग्यं फलति सर्वत्र ,न च विद्या न पौरुषम्

कर्म क्या है ?

‘एक मनुष्य द्वारा अपने ज्ञानेन्द्रियों के ज्ञान से कर्मेन्द्रियों द्वारा किये गये प्रत्येक कार्य को ही कर्म कहते हैं ।’ जिसे दो भावों निष्काम अथवा सकाम भाव से दो रीतियों सतकर्म या कुकर्म के रूप में किया जाता है ।बिना परिणाम के कामना किये किये जाने वाले कर्म को निष्काम कर्म कहते हैं । इसमें केवल काम करना होता हैै, उसके लाभ-हानि पर कोई विचार नहीं किया जाता । किसी परिणाम की लालसा से अभिष्ट मनोरथ की सिद्धी के लिये किये जाने वाले कार्य को सकाम कर्म कहा जाता है । इसमें कर्म करने के पूर्व उसके लाभ-हानि पर भलीभांति से विचार करके ही कार्य किया जाता है । जिस कार्य के किये जाने से प्रकृति को क्षति न हो, किसी दूसरे मनुष्य अथवा जीव प्रकृति को कष्ट न हो उस कर्म को सतकर्म कहते हैं ।जिस कार्य के किये जाने से प्रकृति को हानि हो, किसी अन्य प्राणी को कष्ट हो उस कार्य को कुकर्म कहते हैं ।

मानव इन्द्रियाँ क्या है ?

मानव शरीर में मुख्य 10 अंग हैं, इन्हें ही इन्द्रियाँ कहा जाता है । इन्हें दो भागों में बाँटा गया है । पहला ज्ञानेन्द्रिय एवं दूसरा कर्मेन्द्रिय । आँख, कान, नाक, जीभ एवं त्वचा इन पाँचों को ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं क्योंकि इसी के माध्यम से जगत का ज्ञान होता है । आँख से दृश्य का रंग, बनावट आदि का, कान से ध्वनि तरंग, नाक से गंध, जीभ से रस एवं त्वचा के स्पर्श से दृश्य की प्रकृति का ज्ञान होता है । मुख, हाथ, पैर, जननअंग, और मलद्वार ये कर्मेन्द्रियाँ हैं । इन इन्द्रियों के द्वारा ही प्रत्येक कार्य संपादित होते हैं । इन्हीं अंगों की तृप्ती के लिये इन्हीं अंगों द्वारा कार्य किया जाता है ।

भाग्य क्या है ?

भाग्य कर्मो की संचित निधि है । जिस प्रकार व्यवहारिक जीवन में दो प्रकार की संपत्ती होती है । एक चल संपत्ती दूसरा अचल संपत्ती । चल संपत्ती के संचय से ही अचल संपत्ती का निर्माण होता है उसी प्रकार कर्मो के संचय होने से भाग्य का निर्माण होता है ।आय-व्यय के लेखा-जोखा जैसे ही कर्मो का भी हिसाब होता है । किये जाने वाले सतकर्म अथवा कुकर्म का लेखा-जोखा ही भाग्य का निर्माण करता है । गणितीय रूप में सतकर्म एवं कुकर्म के अंतर को ही भाग्य कहते हैं । सतकर्म से पुण्‍यमयी भाग्‍य तो कुकर्म से पापमयी भाग्‍य का निर्माण होता है ।

भाग्यवाद का सिद्धांत-

सतकर्म की अधिकता होने पर पुण्यमयी भाग्य एवं कुकर्म अधिक होने पर पापमयी भाग्य का निर्माण होता है । पुण्‍यमयी भाग्‍य को सौभाग्‍य तो पापमयी भाग्‍य को दुर्भाग्‍य की संज्ञा दी गई है । कर्मवाद के सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म का भोगफल अर्थात परिणाम निश्चित है । यही भाग्य है । पुर्नजन्म सिद्धांत के अनुसार एक जीवन का कर्मफल अगले जीवन तक मिलता है, यही भाग्य है । यह अनुभवगम्‍य है कि कभी-कभी अल्प परिश्रम से अधिक सफलता मिल जाती है, तो कभी-कभी अधिक परिश्रम से अल्प सफलता ही मिल पाती है । जहाँ अल्प परिश्रम से अधिक सफलता मिल जाती है, वहाँ पर पुण्यमयी भाग्य का योगदान होता है, यही सौभाग्‍य है और जहाँ अधिक परिश्रम से अल्प सफलता ही मिल पाती हैै वहाँ पापमयी भाग्य का योगदान होता है यही दुर्भाग्‍य है । पहले किये गये कर्म का कर्मफल भाग्य के रूप में पहले मिलता है । बाद में किये गये कर्म का कर्मफल बाद में मिलता है । पापमयी भाग्‍य के परिणाम को पुण्‍यमयी भाग्‍य कम अवश्‍य कर सकता है समाप्‍त नहीं । यही भाग्यवाद का सिद्धांत है ।

भाग्य एवं कर्म में अंतर-

चूँकि भाग्य, कर्मो की संचित निधि है । अतः इसका स्वतंत्र अस्तितत्व नहीं है । भाग्य कर्मो से ही बंधा हुआ है । इसलिये ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ कह कर कर्म की प्रधानता को स्वीकार किया गया है । ‘जो जस करहीं सो फल चाखा’ का अर्थ है जो जैसा करेगा वैसा ही भरेगा । यह भाग्‍य के प्रभाव को व्‍यक्‍त करता है कर्मफल से मनुष्य क्या देवता भी नहीं बच सकते । यहाँ तक कि स्वयं जगत नियंता बिष्णु भी कर्मफल से नहीं बच सकते । 

जलान्धर की पत्नि तुलसी का भगवान बिष्णु द्वारा लज्जाहरण किये जाने पर भगवान बिष्णु पत्थर (सालिक राम) बन कर अपने कर्मफल को भोगते हैं ।

इस कथा से कर्म का भाग्‍य के रूप फल की सिद्धी मिलती है

किसी-किसी कर्म का परिणाम तात्क्षणिक प्राप्त हो जाता है तो किसी-किसी का परिणाम आने में विलंब हो जाता है किन्तु परिणाम अवश्यसंभावी है । इन्हीं कर्मो का हिसाब-किताब संचित रूप में भाग्य बन कर प्रकट होते हैं ।

क्या भाग्यवादी होकर बैठे रहना उचित है ?

यदि भाग्य पर तनिक भी विश्वास करते हो तो आपको कर्म करना ही होगा क्योंकि कर्म ही तो भाग्य का भाग्यविधाता है । अच्छे भाग्य बनाने के लिये अच्छे कर्म करने ही होंगे ।यदि आप भाग्य पर विश्वास ही नहीं करते तब तो आपके पास कर्म करने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं है । चूँकि भाग्य का निर्माण ही कर्म से होता है । अतः भाग्य के भरोसे बैठा रहना कदापि उचित नहीं है । पहले किये गये कर्मो की संचित निधि भाग्य है । यदि पहले का पापमयी भाग्य अधिक हो तो सतकर्म करके इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है अथवा निष्‍प्रभावी भी किया जा सकता है । 

कर्म प्रमुख संसार में, भाग्य कर्म का सार ।
कर्म करे से भाग्य है, भाग्य कर्म उपकार ।।
-रमेश चौहान
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सब रोगों का मूल है कब्‍ज

कब्‍ज क्‍या है –

अधिकांश लोगों से हम प्राय: सुनते हैं कि आज मेरा पेट साफ नहीं हुआ । मल का साफ न होना ही कब्जियत है ।  कब्जियत से अधिकांश लोग परेशान है । कब्‍ज सभी रोगों का मूल है । कहा गया है- ‘सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मला:’ अर्थात सभी रोगों का कारण मल का कुपित होना ही है ।

कब्ज होने का कारण –

कब्‍ज होने का प्रमुख कारण अनियमित खान-पान एवं अनियमित रहन-सहन दिनचर्या है, इसके अतिरिक्‍त इसके कारण इसप्रकार हैं-

  1. शौच के वेग को रोकना ।
  2. पानी कम पीना ।
  3. समय पर भोजन न करना ।
  4. अच्‍छे से चबा कर भोजन न करना ।
  5. जल्द-जल्‍दी भोजन करना ।
  6. भूख से अधिक भोजन करना ।
  7. गरिष्‍ठ भोजन करना ।
  8. नींद की कमी होना ।
  9. मानसिक चिंता बना रहना ।

निदान

कहा जाता है कि –‘कारण ही निवारण’ है अर्थात जो जिस कारण से उत्‍पन्‍न हो, उस कारण को ही समाप्‍त कर दिया जाये तो उस समस्‍या का निदान अपने आप हो जाता है । इसलिये कब्‍ज से बचने के लिये सबसे पहले ये उपाय करना चाहिये-

  • अपनी दिनचर्या व्‍यवस्थित करें ।
  • नियत समय पर भोजन करें ।
  • शौच के वेग को कभी न रोकें ।
  • प्रतिदिन कम से कम आठ गिलास अर्थात 2 लिटर पानी अवश्‍य पीयें ।
  • भोजन अच्छे से चबा कर करें एवं भोजन करते समय पानी न पीयें ।
  • गरीष्‍ठ भोजन न करें ।
  • नींद अच्‍छे से लें ।
  • प्रयास करें मानसिक चिंता न हो ।

घरेलू उपचार-

  • कब्‍ज दूर करने का सर्वोत्‍तम उपाय बेल का सेवन है । मौसम अनुकूल यदि पका हुआ बेल उपलब्‍ध हो तो इसका सेवन कब्‍ज का रामबाण औषधी है । पक्‍के बेल के गुदे का सीधा-सीधा सेवन कर सकते हैं अथवा बेल के शरबत का भी सेवन कर सकते हैं । जिस समय पका बेल नहीं मिलता उस समय बेल का मुरब्‍बा अथवा सूखे बेल का चूर्ण भी अत्‍यंत लाभकारी है ।
  • कब्‍ज दूर करने में भुने हुये चने का सत्‍तू बहुत ही कारगर होता है । इसके लिये चने को पहले अच्‍छे से भुन ले फिर भुने हुये चने का पीसकर आटा बना लें । स्‍वादानुसार काला नमक मिले लें और इसे नित्‍य सुबह-शाम 50 ग्राम के अनुमान से सेवन करें ।
  • कब्‍ज अधिक हो तो हर्रा एवं ईसबगोल का मिश्रण सर्वोत्‍तम है ।  इसके लिये सबसे पहले हर्रे को एरण्‍ड़ के तेल में भुन लें, फिर भुनें हुये हरें का चूर्ण बना लें । इस हर्रे का चूर्ण एवं ईसबगोल की भूसी को बराबर मात्रा में मिला लें ।  इस मिश्रण को प्रतिदिन सोने के पूर्व एक या दो चम्‍मच पानी के साथ लें ।

योगासान से कब्‍ज दूर करना-

योगासान ही तन एवं मन से स्‍वस्‍थ रहने का एक सर्वोत्‍तम साधन है । भिन्‍न-भिन्‍न व्‍याधी के भिन्‍न-भिन्‍न योगासान कहे गये हैं । कब्‍ज को दूर करने के लिये निम्‍न आसन सुझाये गये हैं-

पश्चिमोत्‍तासन- इसके लिये दोनों पॉंवों को लम्‍बा सीधा फैलावें, फिर दोनों हाथों की अंगुलियों से दोनों पैरों के अंगुलियों को खींचकर पकड़ें, अब धीरे-धीरे अपने माथे को अपने घुटने पर लगाने का प्रयास करें । उसी क्रम में विलोम करते हुए वापस आवें ।

वज्रासन- इसके लिये घुटने के बल बैठकर, दोनों पैर के अँगूठे को जोड़ते हुये एडि़यों को फैला ले फिर फैले हुये एडि़यों के मध्‍य अपने नितम्‍भ को रखें ।

उत्‍तानपादासन- इसके लिये सीधे लेटकर शरीर के संपूर्ण स्‍नायु को ढीले कर ले, फिर दोनों पैरों को धीरे-धीरे यथा शक्ति ऊपर उठावें । प्रयास करते हुये भूमि और उठे हुये पैरों के मध्‍य 60 अंश का कोण बनाने का प्रयास करें । फिर उठे हुये पैर को धीरे-धीरे भूमि पर वापस रखें । यह क्रिया तीन-चार बार दोहरावें ।

जानुशिरासन – इसके लिये पहले दायें पैर को सीधा फैलायें फिर बाये पैर को की एड़ी को गुदा और अंडकोष के बीच लगायें, बायें पाद-तल से फैले हुये पैर के रान को दबावें, फिर दोनों हाथ से फैले हुये पैर की अंगुलियों को खींचें और धीरे-धीरे झुककर माथे को घुटने से लगाने का प्रयास करें । फिर इसका विलोम दूसरे पैर से यही क्रिया करें ।

पवनमुक्‍तासन- इसके लिये पहले एक पैर को पसार कर रखें, दूसरे पैर को घुटने से मोड़कर पेट पर लगाकर दोनों हाथों से अच्‍छी प्रकार दबायें । नाक को घुटनों पर लगाने का प्रयास करें । यही क्रिया दूसरे पैर से करें तत्‍पश्‍चात दोनों पैरों से यही क्रिया करें ।

मल साफ तो तन साफ

‘मल साफ तो तन साफ’ यदि कब्‍ज को दूर कर लिया गया तो शरीर निश्चित रूप से स्‍वस्‍थ होगा मन भी स्‍वस्‍थ रहेगा । इसलिये हमें कब्‍ज न हो इसके लिये गंभीर प्रयास करना ही चाहिये ।

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मानसून का मनोहारी दृश्य, जीवन को मनोहर बनाता है

मानसून का मनोहारी दृश्य-

मानसून की फुहारों से धरती की सतह नाच उठी है । चिड़िया घोसले में फुदकने में लगे हैं । मेंढक और झींगुरा मैं क्यूट कंपटीशन हो रहा है। छोटी-छोटी घास धरती की छाती से लिपटने लगे हैं । पतझड़ के पौधे फिर हरियाने लगे हैं । सुखी नदी तालाब अपनी प्यास बुझा रहे हैं ।

हमारे बच्चे चिड़ियों की तरह चहकने लगे हैं । गांव की गलियों में बच्चों का गुंजन हो रहा है। किसानों का मन मयूर की तरह नाच उठें हैं । खेतों में बीज छिटकते हुए किसानों के गीत सुनने लायक है । अभी खेतों में बुवाई का काम जोरों पर है जिधर देखो किसान के हल, ट्रैक्टर बुवाई में लगे हुए हैं ।

मानसून का महत्व-

भारतीय कृषि मानसून पर आधारित है । चाहे हजारों लाखों सिंचाई के साधन हो जाएं किंतु मानसून में वर्षा ना हो तो कृषि में सम्मत नहीं हो सकता । इस प्रकार मानसून भारतीय कृषि का बैकबोन है ।

अच्छी कृषि हो इसके लिए आवश्यक है अच्छे मानसूनी बारिश हो । मानसून की सक्रियता एटमॉस्फेयर प्रेशर पर डिपेंड करता है । इसके लिए पेड़ पौधे सहायक होते हैं । जितने ज्यादा पेड़ पौधे होंगे उतनी ही अच्छी बारिश होगी ।

अच्छी मानसून के लिए वृक्षारोपण और वृक्षों का संरक्षण आवश्यक-

मानसून का महत्व स्वयं सिद्ध है । मानसून जहां कृषि की रीढ़ है, वहीं भू-गर्भ जल स्तर को बनाए रखने के आवश्यक है । जहां हमारे लिए “जल ही जीवन है” वहीं जल के लिए मानसून जीवन है । मानसूनी वर्षा भू-सतही जल और भू-गर्भी जल दोनों के लिए  ईंधन के समान है ।

मानसून के लिए हरे-भरे पेड़-पौधों का होना आवश्यक है । इसलिए केवल दिखावा के वृक्षारोपण करने से काम नहीं चलने वाला है अपितु वृक्षों का संरक्षण भी आवश्यक है । केवल जंगलों का घना होना ही आवश्यक नहीं है अपितु बसाहटों के आसपास भी अच्छी संख्या में पेड़-पौधों का होना भी आवश्यक है ।

उपसंहार-

मानसून का यह दृश्य हर व्यक्ति को आह्लादित कर रहा है । कभी रिमझिम-रिमझिम फुहारों से घर का आंगन आनंदित हो रहा है तो कभी तेज बारिश से छप्पर से पानी अंदर आ रहे हैं । क्‍या मनोरम दृश्‍य है । चारो ओर संतोष का भाव देखकर मन में संतोष हो रहा है । आखिर वर्षा से अन्‍न की प्राप्ति है, वर्षा से ही जल, और वर्षा से ही जीवन सुलभ है । इस बार अच्‍छी बारिश हो यही शुभकामना है ।

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पहेलियां

परिचय

भारतीय संस्कृति में मानसिक विकास के लिए पहेली पूछना और पहेली बूझना संस्कृति विकास के प्रारंभिक काल से प्रचलन में है । किंतु इंटरनेट और सोशल मीडिया के तामझाम में नए बच्चे ऐसे खो गए हैं कि उनको इस प्रकार की संस्कृति का ज्ञान ही नहीं रह गया है । 

नए दौर में नयापन चाहिए-  

  • आज के बच्चे क्विज हल करना जानते हैं, वीडियो गेम खेलना जानते हैं, किंतुु पारंपरिक पहेलियों की ओर उनका ध्यान नहीं जाता । 
  • नया समय, नया दौर, नए बच्चे नयापन मांगते हैं । पारंपरिकता को यदि नए जमानेेेे तक पहुंचाना हो तो उसमें नयापन लाना होगा । इसी सिद्धांत के आधार पर मैंं आज प्राचीन विधा पहेली को नये परिधान में प्रस्तुत कर रहा हूं । 

पहेली कहते किसे हैं ?

इस बीच हम देखते हैं कि पहेली कहते किसे हैं ? प्रचलित पहेलियां काव्यात्म्म्मक रूप में शब्दों का ऐसा जाल होता है जिसमें उस वस्तु के प्रमुख गुणों को बुना जाता हैै जिससे उसका पहचान हो सके । 

पहेली बुझते कैसे हैं ? 

पहेली बुुझने केे लि पहले दिए गए पहेली को सावधानी पूर्वक बार-बार पढ़ते हैं और उस में उल्लेखित गुणोंं को समझने का प्रयास करते हैं । बार-बार ध्यान देने सेेे उस वस्तु की पहचान हो जाती है । 

प्रस्तुत है मेरे ही द्वारा रचित कुछ नई पहेलियांं- 

पीछा करता कौन वह, जब हों आप प्रकाश ।
तम से जो भय खात है, आय न तुहरे पास ।।
श्वेत बदन अरु शंकु सा, हरे रंग की पूंछ ।
सेहत रक्षक शाक है, सखा पहेली बूझ । 
काष्ठ नहीं पर पेड़ हूँ, बूझो मेरा नाम ।
मेरे फल पत्ते सभी, आते पूजन काम ।। 
बाहर से मैं सख्त हूँ, अंतः मुलायम खोल ।
फल मैं ऊँचे पेड़ का, खोलो मेरी पोल ।। 
कान पकड़ कर नाक पर, बैठा कौन महंत ।
दृष्टि पटल जो खोल कर, कार्य करे ज्यों संत ।। 
तरुण लड़कपन में हरी, और वृद्ध में लाल ।
छोटी लंबी तीक्ष्ण जो, करती खूब कमाल ।। 
फले कटीले वृक्ष पर, जिनकी खोल कठोर । 
बीज गुदे में है गुथे, करे कब्ज को थोर ।। 
-रमेश चौहान

जरा सोचिए, सोचने से मस्तिष्क का व्यायाम होता है । जिस प्रकार शारीरिक व्यायाम शरीर के लिए लाभदायक होता है ठीक उसी प्रकार पहेलियां भी मस्तिष्क के लिए लाभदायक होता है । अंत में इसका उत्तर दूंगा ।‌ अभी कुछ प्रयास कीजिए । ऐसे भी ये पहेलियां अत्यंत सहज सरल और सुलभ है । 

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दिए गए पहेलियों का उत्तर इस प्रकार है-

उत्तर- 1. परछाई 2. मूली 3. केला  4.नारियल 5. चश्मा (ऐनक), 6. मिर्च 7.बेल (बिल्व)
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ऑनलाइन इंकम के लिये इन बातों का ध्यान रखें

परिचय

इंटरेनेट के जमाने में केवल संचार साधनों, पत्र-व्यवहार के रूपों में ही परिवर्तन नहीं हुआ अपितु काम करने के ढंग में भी परिवर्तन हो गया है । उद्याेगों में, कार्यालयों में सभी स्थानों पर इंटरनेट, ऑनलइन काम प्रारंभ हो गये हैं ।

मजेदार बात तो यह है कि अब कोई भी, कहीं भी घर बैठे ही केवल अपने मोबाइल की सहायता से काम करके इंकम कर सकता है । चूंकि किसी भी बात का प्रचार धीरे-धीरे होता है जब काम अधिक और काम करने वाले कम होते हैं, तो स्वभाविक रूप से उसे इंकम भी अधिक होता है किन्तु जैसे-जैसे काम करने वालों की संख्या बढ़ने लगती है तो इंकम भी कम होने लगता है ।

आज लॉकडाउन की स्थिति ने अधिकांश लोगों को ऑनलाइन इंकम की ओर आकि‍र्षित किया है और काम करने वालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और इस अनुपात में लॉकडाउन के ही कारण काम करने के अवसर कम हुये हैं ।
यदि आप ऑनलाइन इंकम करने का सोच रहे हैं तो पहले आपको कुछ प्रश्‍नों के जवाब पता होना चाहिये-

ऑनलाइन इंकम क्या हैं ?

जब हमें काम करने के लिये कहीं जाने की आवश्‍यकता नहीं होती अपितु काम ही चल कर हमारे पास आ जाता है ऑनलाइन । तब हम किसी के लिये ऑनलाइन पर कुछ काम करते हैं, उसके एवज में वह हमें कुछ राशि का भुगतान करता है । यही ऑनलाइन इंकम है ।

ऑनलाइन इंकम क्यों होता है ?

यह समय विज्ञान के साथ-साथ विज्ञापन और प्रचार का भी है इन दोनों के ही कारण यह इंकम होता है ।
विज्ञान के कारण इस लिये कि विज्ञान की देन ऑनलाइन की सहायता कोई आपके स्कील को खरीदता और आपको मेहताना देता है ।
इसमें क्या होता है कि काम देने वाले को अपने लिये कर्मचारी सेलरीबेस पे रखने की आवश्‍यकता नहीं होती और जब काम की आवश्‍यकता होती है, तो ऑनलाइन अपने योग्य हुनरमंद व्यक्ति को खोज कर काम दे देता है इससे उसे भी लाभ होता है और काम करने वाले को भी घर बैठे काम मिल जाता है ।

बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद के विज्ञापन और प्रचार करने के लिये बहुत बड़ी राशि खर्च करती हैं, इन्हीं राशियों को वह ऑनलाइन विज्ञापन में लगा देती हैं, अपने विज्ञापन पढ़ने अथवा देखने केेि‍ लिये पैसा देती हैं ।

ऑनलाइन इंकम किन-किन रूपों में होता है ?

ऑनलाइन इंकम प्रायः तीन रूपों में होता है-

वर्चुवल, एक्‍सचेंज और रियल
  1. वर्चुवल (आभासी)-ज्यादातर ऑनलाइन इंकम प्रोवाइडर इसी प्रकार का इंकम देती हैं । इसमें सर्विस प्रोवाइडर एक पाइंट निर्धारत करता है, जिसे अपने सुविधानुसार कुछ निश्चित नाम देकर रखे हैं जैसे-पाइंट, सिक्का, क्राउजर आदि । जब यह एक निर्धारित स्तर तक पहुॅच जाता तो इसे प्रोडक्ट या वास्तविक पैसे में एक्सचेंज किया जा सकता है ।
  2. एक्सचेंज-इस प्रकार के इंकम आपको पैसा के बदले ऑनलाइन प्रोडक्ट ही खरीद सकते हैं । नगद प्राप्त नहीं कर सकते ।
  3. रियल इंकम- इस प्रकार के इंकम में वास्तविक रूप से नगद प्राप्त कर सकते हैं ।

ऑनलाइन इंकम कहां-कहां से होता है ?

ऑनलाइन इंकम ऑनलाइन के दोनों प्रमुख साधनों अर्थात मोबाइल एप एवं बेबसाइट से होता है । बहुत सारे मोबाइल एप है जो आपको इंकम करने का अवसर देती है, इसी प्रकार बहुत सारे वेबसाइट भी हैं । इसके अलवा आप स्वयं के वेबसाइट, ब्लॉग, एप, विडियों बना कर भी ऑनलाइन इंकम कर सकते हैं ।

ऑनलाइन इंकम कैसे होता है ?

ऑनलाइन इंकम मुख्य रूप से तीन प्रकार से होता है- पहला स्कीलबेस्ड, दूसरा टास्क बेस्ड और तीसरा सेल्फ बेस्ड स्‍वयं सर्विस प्रोवाइडर बनकर।

स्कील बेस्ड-

स्कील बेस्ड इंकम आप अपने कुछ स्कील जैसे वेबलिजाइनिंग, कांटेंट राइटिंग के बदौलत प्राप्त करते है । इसमें वेबसाइड एक प्लेटफार्म के रूप में कार्य करता है, जहां काम देने वाला और काम करने वाला दोनों एक साथ आते हैं, काम देना वाला अपना काम एक प्रोजेक्ट के रूप में विवरण सहित प्रस्तुत करता है, काम करने वाला उसके प्रोजेक्ट पर अपना बोली लगता है जिसमें वह अपने स्कील के बारे बताता है, काम का दाम बताता है । अनेक बोलियों से काम लेना वाला अपने अनुरूप काम करने वाले का चयन कर लेता है ।

टास्क बेस्ड इंकम-

टास्क बेस्ड इंकम-इसमें सर्विस प्रोवाइडर काम करने वाले को एक टास्क उपलब्ध कराता है यह कई रूपों में हो सकता है जैसे-गेम खेलना, क्विज खेलना, एड़ देखना, विडियों देखना, केप्चा पूरा करना, सर्वे पूरा करना आदि । इन टास्कों को पूरा करके पैसा कमाया जा सकता है ।

सेल्फ बेस्ड

स्वयं के बेबसाइट या ब्लॉग और यूट्यूब पर एडसेंस जैसे विज्ञापन दाता के विज्ञापन चलाकर इंकम कर सकते हैं । सबसे प्रभावी तरीका एफलियेट मार्केटिंग है, जिसमें आनलाइन सेलर के प्रोडक्ट का प्रचार करके कमीषन के रूप में इंकम कर सकते हैं ।

किस काम को करने से परिश्रम के अनुरूप इंकम होता है ?

यह प्राकृतिक सत्य है बिना कुछ किये कभी न कुछ मिला है न कभी कुछ मिलेगा । इंकम करने के लिये मेहनत तो करना ही होगा । जिसमें ज्यादा समय और ज्यादा परिश्रम लगाया जाता है वहां ज्यादा इंकम भी होता है । ऑनलइन के तीनों प्रकार के काम करने के तरीकों को इंकम की दृष्टिकोण से देखते हैं –

  • सेल्फ बेस्ड-सेल्फबेस्ड स्वयं पर निर्भर है इसलिये निश्चित रूप से इंकम का सबसे बड़ा साधन यही है । किन्तु ध्यान रखना होगा इसी में सबसे ज्यादा समय देने की भी आवश्‍यकता होती है । प्रारंभ में कोई इंकम नहीं होता किन्तु एक बार स्थापित हो जाने के पश्चात अच्छा खासा इंकम होती है । निश्चित रूप से इसमें परिश्रम के अनुरूप इंकम होता है किन्तु इसमें बहुत लंबी प्रतिक्षा करनी होती है । किसी-किसी की प्रतिक्षा इतनीं लंबी हो जाती है कि वह टूटने लगता है ।
  • स्कील बेस्ड- स्कील बेस्ड कुछ समय के संघर्ष के पश्चात एक अच्छा इंकम देता है । इसके लिये आवश्‍यक आप अपने आप में कुछ न कुछ स्कील जरूर पैदा करें । अपने आप स्‍कील पैदा करने और उसे बढ़ाने के लिये ऑनलाइन बहुत से सर्विस भी उपलब्ध हैं, सबसे अच्छा साधन यूट्यूब का निःशुल्‍क विडियों हैं, जहां आप कई स्कील सीख सकते हैं । निश्चित रूप से इसमें परिश्रम के अनुकूल इंकम होता है ।
  • टास्क बेस्ड-यह सर्वाधिक लोंगों द्वारा उपयोग में लाई जाती है क्योंकि इसमें कुछ भी प्रतिक्षा नहीं करना होता सीधे-सीधे टास्क को पूरा करना प्रारंभ करते हैं और इंकम करने लगते हैं न ही इसमें कोई विषेश स्कील ही आवश्‍यकता होती, विज्ञापन देखना, पढ़ना, लिंक शेयर करना जैसे आसान काम होते हैं । कितु यह कार्य बहुत उबाऊ होता है । 7-7, 8-8 घंटे का समय देकर बमुश्किल 100-200 रूपय से अधिक नहीं कमाया जा सकता । निःसंदेह इसमें परिश्रम के अनुकूल इंकम नहीं हो पाता ।

क्या इससे केवल समय की बर्बादी तो नहीं ?

यदि आप इस काम के लिये गंभीर नहीं हैं तो िनिश्चित रूप से यह समय की ही बर्बादी है । क्योंकि बैठे-बैठे कभी भी, किसी को कुछ नहीं मिलता ।
यदि आप पूरे लगन से गंभीर होकर काम करें तो इसमें आपके द्वारा व्यतित हर क्षण का एक न एक दिन लाभ अवश्‍य होगा ।
बिना किसी योजना के, बिना किसी स्कील के काम ज्यादा दिन तक चल नहीं सकते इसलिये बिना योजना और बिना स्कील के किये काम में समय बर्बादी तो होगा ही ।
यहाँ योजना से अभिप्राय अपनी क्षमता को परख कर निश्चित स्कील को प्राप्त करना फिर उसका उचित ढंग उपयोग करना है, पूरा कार्य एक प्रबंधन की तरह होना चाहिये ।

यहाँ काम करने के लिये क्या करना चाहिये ?

सबसे पहले अपने आप का खोज करना चाहिये । अपने आप से वह क्षमता खोज कर निकालना चाहिये जिसे आप किसी स्कील में परिवर्तित कर सकते हैं ।
दूसरा काम अपने स्कील को सीखना, अभ्यास करना और उस स्कील का उपयोग करके निखारना चाहिये । आप स्कील को यहां आनलइन ही सीख सकत हैं । अपने स्कील के वेब सर्च या विडियों सर्च करे और तब तक करे जब तक आपके लिये संतोशप्रद न हो जाये ।
तीसरा काम अपनी रूचि एवं क्षमता के अनुरूप काम के लिये उचित प्लेटफार्म का निर्धारण करना । इसे भी सर्च से प्राप्त कर सकते हैं किन्तु ध्यान रखें किसी भी प्लेटफार्म के बारे जानते ही उसमें एकाउन्ट न बनाये अपितु उस प्लेटफार्म का रिव्यू चेक करें, उसमें काम कर चुके व्यक्तियों का विडियों देखें, उनके अनुभवों के समझें । जब आप अच्छे से संतुश्ट हो जाये कि यह प्लेटफार्म मेरे स्कील के अनुरूप है तभी एकाउन्ट बनाये और काम करें ।

अंत में यही कहना चाहूँगा कि अपनी क्षमता को परखिये, अपने लिये स्कील बनायें, फिर योजनाबद्ध तरीके से ऑनलाइन इंकम के क्षेत्र में कदम रखें सफलता जरूर मिलेगी अन्यथा इसमें समय और परिश्रम के बर्बादी के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा ।
-रमेश चौहान
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लंबे, घने एवं काले बाल प्राप्त करने की प्राकृतिक तरीके

प्रकृति का सौंदर्य-

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सौंदर्य सृष्टि का एक अभिन्न अंग हैं । प्रकृति स्वयं में सौंदर्य का अक्षय निधि है । प्रकृति को देख कर सृष्टि के सारे प्राणी प्रफूल्लित होकर नाचते गाते रहते हैं । मोर का नाचना, कोयल का कुहकना प्रकृति के प्रति अनुराग को ही दर्शाता है । हरे-भरे खेत खलिहान देख कर किसान का मन नाचने लगते है, मंद सुगंध से सुवासित रंग-बिरंगे फूल को देख कर तितलियां मंडराने लगती है, भवरे मधुपान करने आतुर हो जाता है वहीं मनुष्‍य भी इस मादकता के आगोस में समा जाता है । प्रकृति स्‍वयं में सुंदर है ही और अपने सहचर्ययों को भी सुंदर बनाने में प्रथम सहयोगी की रूप में सदैव प्रस्तुत रहती है । प्रकृति से जुड़ रहने पर सौंदर्य नैसर्गिक रूप से प्राप्‍त होता है ।

मानव का सौंदर्य के प्रति अनुराग-

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मनुष्‍य अपने सौंदर्य के प्रति सचेत एवं जागरूरक रहता है । अपने सौंदर्य को निखारने के लाखों प्रयास करते रहते हैं । सौंदर्य व्यक्ति चेहरों एवं बालों पर ही विशेष रूप से निर्भर होता है । जहॉं सौंदर्य देखने में आकर्षक होता है, मनभावन होता है, वहीं व्‍यक्तित्‍व को भी प्रदर्शित करता है । मनुष्‍य अपने नख से शीख तक हर अंगों को खूबसूरत बनाने सदैव प्रयास रत रहते हैं । रूप निखारने, सौंदर्य को सौंदर्य प्रदान करने में हमारे सिर के केशों कीमहत्‍वपूर्ण भूमिका है । अपने बालों को सँवारने, उनके देख-रेख के लिये महिलाओं के साथ-साथ पुरूष भी ललायित रहते हैं ।

बालों की समस्‍याएं-

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बालों का असमय सफेद होना एवं बालों का झड़ना लोगों के लिये आज एक चिंता का कारण बन गया है । बालों का बदरंग होना, डेंड्रप, जुँए की परेशानी बालों का बिमारी है । इसी चिंता को ध्यान में रखते हुय हम ऐसे तरीकों का खोज करते रहते हैं जो ज्यादा प्रभावी, ज्यादा विश्वसनिय और सहज उपलब्ध हो । प्रकृति से अधिक प्रभावी, विश्वसनीय और सहज उपलब्ध भला और कहां होगा ? इसलिये हमें उन प्राकृतिक उपायों को देखते हैं जिससे बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं-

बालोें की समस्‍या के लिये प्राकृतिक उपचार-

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  1. तुलसी पत्ती, भृंगराज पत्ती एवं आँवला का लेप-इन तीनों को अच्छे से पीस कर लेप बना लें, इस लेप को अपने बालों पर लगायें, इससे बाल का झड़ना एकदम से रूक जाता है । इसके साथ-साथ बाल काले एवं घने भी होते हैं ।
  2. गुडहल का पुष्प-गुडहल के पुष्प को पीसकर लेप इस लेप को बालों में अच्छे से मलें, यह गंजापन को दूर करने का शक्ति रखता है, इसलिये इससे बालों का झड़ना निश्चित रूप से रूक जाता है । इसके नियमित उपयोग से बाल काले एवं घने होते हैं ।
  3. नींबू रस एवं आँवले का लेप-एक नींबू का रस, दो चम्मच पानी चार चम्मच पिसा हुआ आँवला मिलाकर एक लेप तैयार कर लें, यदि पेस्ट न बनें तो पानी और मिला दें, इसे एक घंटा भीगने दें, फिर सिरपर लेप करें । एक घंटे बाल सिर धोयें । साबुन शैम्पू का प्रयोग न करें । बाल धोते समय यह विशेषा ध्यान रखें कि इस लेप का पानी आँखों में न पड़े । हर चौथे दिन यह प्रयोग दुहरायें । ऐसा करने कुछ ही माह में बाल काले, लंबे एवं घने हो जाते हैं ।
  4. आँवला पानी- सूखे आँवलें को रात भर भींगने के छोड़ दे, सुबह इसी पानी से बाल को धोयें, इस से बालों का जड़ मजबूत होता है, बालों का झड़ना रूक जाता है एवं बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं ।
  5. आम का लेप- कच्चे आम के छिलके हटाकर इसमें कुछ हरे मुलायम आम की पत्ती मिलाकर इसे अच्छे से पीसकर लेप बना लें । इस लेप को एक घंटे के लिये धूप में सूखा दे फिर इससे अपने बालों को धोयें । इससे बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं ।
  6. प्याज का लेप-एक प्याज के छिलके को उतार कर इसे अच्छे से पीसकर इसका लेप तैयार कर लें । इस लेप को अपने बालों में लगायें कुछ सूख जाने के पष्चात अपने बालों को धोयें । ऐसा करने पर बाल काले, लंबे एवं घने हो जाते हैं ।
  7. केले का लेप- केले का लेप बनाने के लिये एक केले लेकर इसका छिलका उतार कर इसे मसल लें, इसमें 2 चम्मच दही और 2 चम्मच गुलाब जल मिलाकर अच्छे से मिला दें । इस लेप को अपने बालों पर नहाने के पहले लगा लें, कम से कम आधा घंटा इसे सूखने दें। सूखने के बाद अपने बालों को धोयें । इससे बाल काले, लंबे एवं घने होते हैं ।
  8. कनेर का जड़ एवं लौकी का लेप-कनेर की जड़ की छाल और लौकी दोनों को 10-10 ग्राम के अनुमान में गाय के दूध के साथ पीसकर लेप बना लें, इस लेप से बालों को धोयें । इससे से बालों का झड़ना रूक जाता है ।
  9. डेण्ड्रफ होने पर- डेण्ड्रफ बालों के झड़ने के एक बड़ा कारण है इसे रोकने के लिये ग्लिसरिन एवं गुलाबजल को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर नहाने के पहले चेहरे पर, गले पर एवं माथे पर अच्छे से लेप कर लें, 5 मीनट इसे सुखने दें फिर दही अथवा मही से बाल धोते हुये स्नान करें इससे डेण्ड्रफ का रोकथाम होता और बालों का झड़ना रूक जाता है ।
  10. जुओं के लिये-जुओं को समाप्त करने के लिये नींबू का रस एवं अदरक के रस को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर बालों के जड़ों पर अच्छे से लगायें, रस लगाने एक घंटे बाद सिर धोयें । सिर धोने के बाद नींबू का रस एवं सरसों का तेल बराबर मात्रा में लेकर बालों में लगायें । ऐसा करने पर जुएँ समाप्त हो जाते हैं ।
उपरोक्त विधियों में जो विधि आपके अनुकूल हो उस विधि का प्रयोग करके आप अपने बालों को घने,काले एवं घने बना सकते हैं ।
-रमेश चौहान

स्रोत- विकिपिडिया, आयुर्वेद विशेषांक, कल्‍याण

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अनुभवगम्य सत्य ही ईश्वर है

सत्य क्या है ?

मानव जीवन में सच्चाई क्या है? हमारा शरीर या हमारी आत्मा। हम जो दृश्य अपनी आँखों से देखते हैं, जो आवाज़ हम अपने कानों से सुनते हैं, जीभ में जो स्वाद होता है सच्चाई क्या है ? इनमें से कोई एक या सभी से अलग है जिसे सत्य कहा जा सकता है।

आत्मा और देह

इस पर विचार करते हुए, हम पाते हैं कि शरीर का अस्तित्व आत्मा के बिना नहीं है और आत्मा का अस्तित्व शरीर के बिना अनुभव नहीं किया जाता है। शरीर और आत्मा एक दूसरे के पूरक हैं। हालांकि, यह कहा जा सकता है कि शरीर और आत्मा दोनों ही हैं सच। इसकी सत्यता फूल में खुशबू, फल में स्वाद के समान है। जैसे फूल के बिना खुशबू और खुशबू के बिना फूल , स्वाद के बिना फल और फल के बिना स्वाद की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह से शरीर के बिना आत्मा और  आत्मा के बिना शरीर  की कल्पना पूर्ण नहीं है। आत्मा के बिना शरीर को एक शव कहा जाता है।

श्रीमद्भागवत गीता का कथन

हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद भगवद गीता के अनुसार, आत्मा कभी पैदा नहीं होती है और न ही मरती है, यह शाश्वत अमर है। जन्म शरीर का होता है और शरीर में ही बचपन, जवानी और बुढ़ापे के विभिन्न चरण होते हैं। इसलिए, मृत्यु भी केवल शरीर की है, इसका मतलब है कि शरीर और आत्मा दोनों सत्य होने के बावजूद, केवल आत्मा शाश्वत सत्य है।

सत्य की सत्यता

सत्य का अर्थ है शाश्वत जिसमें न लिंग है, न जातिगत भेदभाव है, न ही और कोई भेद। जो भी हो, जहां भी हो, जैसा भी हो, हर परिस्थिति में जो शाश्वत सच है, वही सत्य है ।

सत्य अव्यक्त किन्तु अनुभवगम्य है

यदि एक हजार लोग एक दृश्य देख रहे हैं और उनसे बाद में पूछा जाता है, तो प्रत्येक व्यक्ति के देखने के तरीके में अंतर दिखाई देगा। अर्थात् उन सभी लोगों ने सत्य को देखा है लेकिन सत्य को व्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं जैसा कि वह है, अर्थात सत्य। इस प्रकार आँखों से देखा गया भी सत्य नहीं हो सकता । इसी प्रकार सुना भी सत्य नहीं होता । सत्य को तो केवल अनुभव किया जा सकता है । अनुभवगम्य सत्य ही ईश्वर है ।

सत्य ही ईश्वर है

सत्य ही सत्य है। ईश्वर ही ईश्वर है । ईश्वर ही सत्य है । सत्य ही ईश्वर है । जिस प्रकार सत्य अनुभवगम्य है, उसी प्रकार ईश्वर अनुभवगम्य किंतु अव्यक्त है ।

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पुदीना का रासायनिक संगठन एवं औषधि उपयोग

पुदीना एक सुगन्धित एवं उपयोगी पौधा है । आयुर्वेद के अनुसार यह स्वादिष्ट, रूचिकर, पचने में हलका, तीक्ष्ण, विकृत कफ को बाहर निकालनेवाला एवं चित्त को प्रसन्न करने वाला होता है ।
यह ज्वर, कृमि, अरूचि, अफरा, दस्त, खाँसी, श्वास, निम्न रक्तचाप, मूत्राल्पता, त्वचा रोग, हैजा, अजीर्ण, सर्दी-जुकाम आदि जैसे रोगों में औषधि के रूप में उपयोगी है ।
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पुदीना का रासायनिक संगठन-

ताजी पत्ती में 0.4-0.6 प्रतिशत तेल होता है। तेल का मुख्य घटक मेन्थोल 65-75 प्रतिशात, मेन्थोन 7-10 प्रतिशत तथा मेन्थाइल एसीटेट 12-15 प्रतिशत तथा टरपीन (पिपीन, लिकोनीन तथा कम्फीन) है। पुदीना में विटामिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । इसमें रोगप्रतिरोधक शक्ति उत्पन्न करने की सामथ्र्य है ।

औषधि के रूप में उपयोग-

पुदीना सहज सुलभ पौधा है इसे आप अपने क्‍यारी में रोप सकते हैं, यह सहज में लगने वाला व फैलने वाला पौधा है । इसकी ताजी पत्‍ती, ताजे रस प्रयोग में लाये जाते हैं । इसके औषधि गुण को देखते हुये बहुत सारे दवा उत्‍पादक कंपनी इस पु‍दीना के रस का मार्केटिंक कर रहे हैं यह तरल रूप में, अर्क के रूप में, कैप्‍सूल के रूप में बाजार में सहज ही उपलब्‍ध होता है । यह विभिन्‍न रोगों में कारगार होता है । इसमें कुछ उपयोग इस प्रकार हैं-

1. मलेरिया में-

पुदीना एवं तुलसी के पत्तों के काढ़ा अथवा पुदीना एवं अदरक का रस एक-एक चम्मच सुबह-शाम लेने से मलेरिया रोग का शमन होता है ।

2. गैस एवं पेट के कृमि में-

पुदीना के दो चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने से गैस एवं पेट के कृमि नष्ट हो जाते हैं ।

3. सर्दी-जुकाम एवं न्यूमोनिया में-

पुदीना एवं अदरक के एक-एक चम्मच रस एक चम्मच शहद में मिलाकर दिन में दो बार पीने एवं पुदीना रस की दो-तीन बूँदे कान में डालने से सर्दी-जुकाम एवं न्यूमोनिया में विशेष लाभ होता है ।

4. मासिक धर्म अल्पता में-

मासिक धर्म न आने पर, कम आने पर पुदीना के काढ़े में गुड़ एवं चुटकीभर हींग डालकर पीने से लाभ होता है । इसी प्रकार के सेवन से मासिक धर्म के कारण उत्पन्न दर्द का भी नाश होता है ।

5. अजीर्ण अथवा अपच में-

अजीर्ण अथवा अपच होने की स्थिति में केवल पुदीना अर्क अथवा पुदीना रस में शहद मिलाकर पीने से लाभ होता है ।

6. दाद में-

पुदीना के रस में नींबू रस मिलाकर दाद से प्रभावित क्षेत्र में लगाने पर दाद का प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है ।

7. उल्टी-दस्त, हैजा में-

उल्टी-दस्त होने पर पुदीना के रस में नींबू का रस, अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पीने से के अथवा केवल पुदीना अर्क पीने से लाभ होता है ।

8. बिच्छू के दंश में-

बिच्छू अथवा अन्य जहरीले जुतुओं के दंश के शमन के लिये पुदीना का रस उस स्थान पर लगायें एवं पुदीना रस पर मिसरी मिलाकर पीने से लाभ होता है ।

9. हिस्टीरिया में-

ताजे पुदीना रस को गर्म करके सुबह-शाम नियमित सेवन करने से हिस्टीरिया में लाभ होता है ।

10. मुख दुर्गन्ध को ठीक करने में-

पुदीना के रस में पानी मिलाकर अथवा पुदीना के का काढ़े का घूँट मुँह में भरकर रखे, फिर उगल दे । यह क्रिया दो-चार बार करें । इससे दुर्गन्ध का नाश होता है ।

11. बेहोशी दूर करने में-

पुदीना की ताजी पत्ती को मसल कर बेहोश व्यक्ति को सूँघाने से बेहोशी दूर होता है ।

12. पेट दर्द में-

पुदीना रस में थोड़ा-थोड़ा जीरा, हींग, कालीमिर्च और नमक मिलाकर गर्म करके पीने से पेट दर्द में शीघ्रता से लाभ होता है । केवल पुदीना अर्क लेने से भी लाभ होता है ।

13. प्रसव दर्द में –

प्रसव के समय पुदीना रस पीलाने से प्रसव दर्द कम हो जाता है और प्रसव में भी सुविधाजनक रूप से होता है ।

14. तलवे में जलन-

तलवे में जलन होने की स्थिति में तलवे पर पुदीना रस से मसाज करने पर तलवे के जलन शांत होता है ।

15. मुँहासे होने पर-

पुदीना रस में कुछ बूँदे नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लेप करे, कुछ समय इसे सूखने के लिये छोड़ दें, सूख जाने के पश्चात साफ पानी से चेहरा धो लें । इस प्रकार नियमित रूप से करने पर चेहरे के मुँहासे समाप्त होने लगते हैं ।

16. जुएं होने पर-

अपने बाल धोने के शैम्पू में पुदीना रस मिलाकर अपने बाल पर लगाये इसे सूखने दें, सूखने के पश्चात इसे अच्छे से धो लें, इस प्रकार नियमित रूप से करने पर सिर के जुएं नष्ट हो जाते हैं ।

17. लू से बचने में-

गर्मी के दिनों मेे पुदीना का रस पीकर घर से बाहर निकले इससे लू लगने का भय दूर हो जाता है । यदि ज्यादा समय तक घर से बाहर हों तो पुदीना अर्क रख कर चले और निश्चित अंतराल पर इसका सेवन करते रहें ।

18. चेहरे के रूखापन को दूर करने में-

पुदीना रस को दही या शहद में मिलाकर चेहरा साफ करने से चेहरे का रूखापन दूर होता है ।

19. लिवर की सक्रियता बढ़ाने में-

पुदीना का नियमित रूप से सेवन करने पर लिवर की सक्रियता मं वृद्धि होती है ।

20. स्मरण शक्ति तेज करने में-

पुदीना के नियमित सेवन से स्मरण शक्ति में वृद्धि होता है ।

पुदीना आयुर्वेद के अनुसार एक अच्छी औषधी है । घरेलू उपचारों का एक अच्छा साधन है । उपरोक्त सभी उपाय लोगों के अनुप्रयोगिक अनुभवों के आधार पर है । ऐसे इसका कोई साइडइफेक्ट नहीं है किन्तु ‘अति सर्वत्र वर्जयते’ इसलिये इसका प्रयोग जिस रोग के लिये कर रहे हैं । उस रोग के निदान होते ही इसका प्रयोग बंद कर दें ।
प्रत्येक व्यक्ति का तासिर अलग-अलग होता है । जिसे वह स्वयं अथवा उनका चिकित्सक ही जान सकता है अतः अपने तासिर एवं चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार प्रयोग करें ।

-रमेश चौहान

स्रोत-

  • आयुर्वेद विशेषांक
  • विकिपिडिया
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भूमि अतिक्रमण एक पर्यावरणीय समस्‍या

प्रस्‍तावना-

आज सारा विश्व पर्यावरणीय समस्या से जूझ रहा है, ‘ग्लोबल वार्मिंग‘ शब्द ट्रेन कर रहा है । वायु प्रदूषण इतना गंभीर हो रहा है कि सांस लेना भी दुभर हो रहा है । जल संकट इस प्रकार हावी है कि शुद्ध पीने के पानी के लिए लोग तरस रहे हैं । इन सब का कारण क्या है ? बड़े-बड़े शोधार्थी, बड़े-बड़े वैज्ञानिक इस दिशा में अनेक कार्य कर रहे हैं और इससे उबरने का प्रयास भी कर रहे हैं ।

वास्तव में इन समस्याओं कि पीछे मूल कारण क्या है ? अधिकांश बौद्धिक लोग -जनसंख्या दबाव और प्रकृति का आवश्यकता से अधिक दोहन को इसका कारण मानते हैं । कुछ बुद्धिजीवी, विज्ञान द्वारा नित्य निर्मित नए-नए गैजेट्स को भी इसके लिए उत्तरदाई मानते हैं ।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसका चिंतन किया जाए तो जो सबसे बडा कारण उभर कर आता है वह है-‘भूमि अतिक्रमण’ ।

भूमि अतिक्रमण क्या है ?

दूसरों के स्वामित्व के भूमि को अपनेे स्वामित्व मैं लेना भूमि अतिक्रमण कहलाता है । विशेषकर शासकीय भूमि को किसी निजी व्यक्ति द्वारा अथवा किसी निजी संस्था द्वारा अपने अधीन कर लेना ही भूमि अतिक्रमण है ।

भूमि अतिक्रमण का व्यापीकरण-

हमारे देश में भूूमि अतिक्रम इतना व्यापक हो गया हैै कि गांव-गांव, शहर-शहर जहां देखो वहां भूमि अतिक्रमण का प्रभाव दिखाई देने लगा है । धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, बलशाली-बलहीन, नेता-जनताा, ऐसा कोई वर्ग नहीं है जो इससे अछूता हो । सभी के सभी को दोष देना तो न्याय संगत नहीं होगा । किंतु यह कटु सत्य है की अधिकांश लोगों ने किसी ना किसी रूप में भूमि अतिक्रमण कर रखा है ।

शहर तो शहर गाँव-गाँव से गोचर भूमि, शमशान भूमि, घास भूमि या तो समाप्त हो गये हैं अथवा समाप्त होने के कगार पर है । यहाँ तक की गाँव में जो प्राकृतिक नदी-नाले थे, वे भी या तो विलुप्त हो गये हैं अथवा विलुप्ती के कगार पर हैं । पूर्वजों द्वारा गाँव में बनवाये गये तालाबों, कुँओं, बावलियों का नामो निशाान समाप्त होते जा रहे हैं । जहाँ सरकारी रिकार्ड में शासकीय भूमि दर्ज है, उसका भौतिक मूल्यांकन कराने पर अधिकांशतः भूमि अतिक्रमण का अतिरेक ही दिखाई देता है ।

जहाँ एक ओर सरकारें चैड़ी-चैड़ी सड़कें बनवा रही है, वहीं दूसरी ओर गाँव-शहर-मोहल्लें की गलियां सिकुड़ती जा रही हैं । प्रायः लोग अपने घर के सामने कुछ न कुछ भुमि अतिक्रमण करना ही चाहते हैं । यही लालच का दैत्य गाँव-शहर के पुराने रहवासी क्षेत्रों को उपेक्षित बनाते जा रहे हैं । जिससे सड़क किनारे नई बस्तियों का निर्माण हो जाता है और कुछ ही दिनों में फिर भूमि अतिक्रमण का पाप उस बस्ति को भी निगल जाता है और यही क्रम निरंतर जारी है । लोग सड़क किनारे, रेलवे ट्रेक के किनारे सरकारी भूमि पर अपनी झोपड़ी दिखाकर महल खड़ा कर लेते हैं ।

भूमि अतिक्रमण का कारण-

  1. भूमि अतिक्रमण का सबसे बड़ा कारण जनसंख्या विस्फोट को माना जा सकता है किन्तु जनसंख्या विस्फोट से अधिक संयुक्त परिवार का विघटन और एकाकी सुख-सुविधाओं की लालसा ही इसका बड़ा कारण है । जहाँ संयुक्त परिवार में एक मकान में कुछ कमरों में गुजारा हो सकता वहीं एकाकी परिवार का चलन कई मकानों का मांग करता है ।
  2. लोगों का वस्तुनिष्ठ से व्यक्तिनिष्ठ होना अर्थात समुदायिक अधिकार के स्थान पर निजि अधिकार पाने की लालसा भूमि अतिक्रमण सबसे बड़ा कारण है ।
  3. देश में कुछ ऐसे विचारधारा पोषित है, जो प्राकृतिक जल, जंगल, और सरकारी जमीन पर सामुदायिक उपभोग के स्थान पर अपना एकाधिकार जातने का प्रयास कर रहे हैं ।
  4. सरकारें राजनीतिक दलों के ही होते हैं और ये राजनीतिक दल वोट की राजनीति में या तो भूमिअतिक्रमण को पोषित कर रहीं होती है अथवा मूकदर्शक रह जाती हैं ।
  5. लोगों में आत्मसम्मान एवं स्वालंबी का आदर्श का भौतिकवाद के लालच में मंद पड़ना भी इसका प्रमुख कारण है ।

भूमि अतिक्रमण का दुश्‍प्रभाव-

  1. नदी, नाले, कुँआ, बावली, तलाबें जैसे जल स्रोतों की संख्या दिन प्रति दिन घट रहे हैं, जिससे भू-जल पर हमारी निर्भरता बढ़ गई है, जिससे भू-जल स्तर घटेगा नही ंतो क्या होगा ? जहाँ पहले एक कुएँ से पूरा गाँव पानी पीता था, आज हर घर के लिये अलग से बोर-वेल्स चाहिये तो भू-जल स्तर घटेगा नही ंतो क्या होगा ? जल स्रोतों में तेजी हो रही कमी ही जल संकट का सबसे बड़ा कारण है ।
  2. गाँव के गोचर में, शमशान में, सड़क किनारे, रेल्वे ट्रेक के किनारे हजारों पेड़-पौधे होते थे, जो हमारे पर्यावरण को संतुलित बनाये रखते थे, इन स्थानों में अतिक्रमण होने से पेड़-पौधे कट रहे हैं जो पर्यावरण के लिये संकट पैदा कर रहा है ।
  3. विस्तारीवादी लोग प्राकृतिक जंगल, नदियों, पहाड़ों आदि पर भी अतिक्रमण कर रहें हैं जिससे प्राकृतिक संतुलन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है ।
  4. भूमि अतिक्रमण पर प्रभावी रोक नहीं होने के कारण लोग अपने सामाजिक दायित्व से विमुख होकर स्वार्थी होते जा रहे हैं । लोगों में नैतिक पतन का यह एक बड़ा कारण बन रहा है ।
  5. भूमि अतिक्रमण की प्रवृत्ति पर्यावरणीय समस्या के साथ-साथ सामाजिक समस्या भी पैदा कर रहा है । ‘जिसकी लाठी, उसकी भैस’ को चरित्रार्थ कर रहा है ।

भूमि अतिक्रमण को कैसे रोका जाये-

  1. देश में भूमि अतिक्रमण के विरूद्ध कानून तो है आवश्यकता है कानून के पालन का, कानून का कड़ाई से पालन करा कर इस विभिषिका से बचा जा सकता है ।
  2. लोगों को अधिकारों से अधिक कर्तव्यों का बोध कराना चाहिये, नैतिक शिक्षा देकर उनके सामाजिक दायित्वों का बोध कराना चाहिये । लोगों को स्वभिमानी बनने के लिये प्रेरित करना चाहिये ।
  3. वास्तव में जिन जरूरतमंदों को भूमि की आवश्यकता है, उन्हें आवश्यकता के अनुरूप भूमि आबंटन किया जाना चाहिये । लोग अपने आवश्यकता से अधिक सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रखे हैं । अतिक्रमित भूमि के केवल 10-20 प्रतिशत भाग पर जरूरतमंदों का कब्जा है शेष स्थानों पर विस्तारवादियों, लालचियों, दबंगों का कब्जा है ।
  4. यदि देश के वास्तविक जरूरतमंदो को उनके आवश्यकता के अनुरूप भूमि आबंटित कर दिया जाये और गैरजरूरतमंदों से भूमि खाली करा ली जाये तो भी एक बहुत बड़ा भू-भाग अतिक्रमण मुक्त हो जायेगा ।
‘आवश्यकता अविष्कार की जननी है ।’ यदि इस बात की आवश्यकता लोग महसूस करने लगेगें कि भूमि अतिक्रमण बंद कराने की आवश्यकता है तो स्वमेव रास्ता निकल आयेगा क्योंकि ‘जहाँ चाह, वहाँ राह’ । किन्तु जब तक लालच की पट्टी हमारी आँखों में बंधी रहेगी तब तक, तब तक सत्य का दर्शन नहीं होगा ।
-रमेश चौहान
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विज्ञान एक परिचय

विज्ञान

परिचय-

प्रकृति को जानने समझने की जिज्ञासा प्रकति निर्माण के समान्तर चल रही है । अर्थात जब से प्रकृति का अस्तित्व है तब से ही उसे जानने का मानव मन में जिज्ञासा है । यह जिज्ञासा आज उतनी ही बलवती है, जितना कल तक थी । जिज्ञासा सदैव असंतृप्त होती है । क्यों कैसे जैसे प्रश्‍न सदैव मानव मस्तिक में चलता रहता है । इस प्रश्‍न का उत्तर कोई दूसरे से सुन कर शांत हो जाते हैं तो कोई उस उत्तर को धरातल में उतारना चाहता है । अर्थात करके देखना चाहता, इसी जिज्ञासा से जो जानकारी प्राप्त होती है, वही विज्ञान है । विज्ञान कुछ नही केवल जानकारियों का क्रमबद्ध सुव्यवस्थित होना है, केवल ज्ञान का भण्ड़ार होना नही । गढ़े हुये धन के समान संचित ज्ञान भी व्यर्थ है, इसकी सार्थकता इसके चलायमान होने में है ।

प्रकृति के सार्वभौमिक नियमों को क्यों? और कैसे? जैसे प्रश्नों में विभक्त करके विश्लेषण करने की प्रक्रिया से प्राप्त होने वाले तत्थों या आकड़ों के समूह को विशिष्ट ज्ञान या संक्षिप्त में विज्ञान कहते हैं।

दुनियो के विशिष्‍ठ ज्ञानों के समूह को ही विज्ञान कहा जाता है ।

आईये प्राकृति के किसी सार्वभौमिक नियम का विश्लेषण करके जाने-

प्रकृति का सार्वभौमिक नियम-धूप में गीले कपड़े सूख जाते हैं। क्यों? और कैसे?’

विश्लेषण- सूरज की किरणों में कई तरह के अवरक्त विकिरण होते हैं। जो तरंग के रूप में हम तक पहुंचते हैं। इन अवरक्त विकिरणों में बहुत अधिक ऊर्जा होती है। ये ऊर्जा कपड़े में मौजूद पानी के अणुओं द्वारा सोख ली जाती है। जिसकी वजह से वो कपड़े की सतह को छोड़कर वायुमण्डल में चले जाते हैं। पानी के सारे कण जब कपड़े की सतह को छोड़ देते हैं तो कपड़ा सूख जाता है।

विशिष्ट ज्ञान या विज्ञान- अणु अपनी ऊर्जा स्तर के आधार पर अपनी स्थिती में बदलाव कर लेते हैं तथा एक नई संरचना धारण कर लेते हैं।

जैसे-
  • लोहे के अणुओं को बहुत अधिक ऊर्जा दे दी जाय तो वो पिघल कर द्रव में बदल जाते हैं।
  • मिट्टी की ईटों को बहुत अधिक ऊर्जा देने पर वो पहले से ज्यादा ठोस हो जाता हैं।
  • पानी के अणुओं की ऊर्जा अवशोषित करने पर वो जमकर बर्फ में बदल जाते हैं।

सिद्धांत क्या है ?

एक सिद्धांत एक वैज्ञानिक आधार, मजबूत सबूत और तार्किक तर्क पर सुझाव के रूप में परिभाषित किया जाता है। एक सिद्धांत को सिद्ध नहीं जाता, लेकिन एक वैज्ञानिक मुद्दे को एक सत्य प्रतीत होने वाला स्पष्टीकरण होने का विश्वास होता है।

वैज्ञानिक विधि-

  • क्रमबद्धप्रेक्षण
  • परिकल्पना निर्माण
  • परिकल्पना का परीक्षण
  • सिद्धांत कथन

दैनिक जीवन में विज्ञान-

जीवन के हर क्षेत्र उपयोगी प्राचीन भारतीय विज्ञान तथा तकनीक को जानने के लिये पुरातत्व और प्राचीन साहित्य का सहारा लेना पडता है। प्राचीन भारत का साहित्य अत्यन्त विपुल एवं विविधतासम्पन्न है। इसमें धर्म, दर्शन, भाषा, व्याकरण आदि के अतिरिक्त गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, रसायन, धातुकर्म, सैन्य विज्ञान आदि भी वर्ण्यविषय रहे हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में प्राचीन भारत के कुछ योगदान निम्नलिखित हैं-

हमारे देश के स्‍वर्णिम इतिहास जब हमारा भारत विश्‍व गुरू हआ करता था, उस प्राचीन काल में बौधायन, चरक, कौमरभृत्य, सुश्रुत, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, वाग्भट, नागार्जुन एवं भास्कराचार्य जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिक हुए । जब पश्चिमी वैज्ञानिक चिंतन ने इस देश की धरती पर पुनः कदम रखा, तो हमारे देश की सोई हुई मेधा जाग उठी और देश को जगदीश चंद्र बसु, श्रीनिवास रामानुजन, चंद्रशेखर वेंकट रामन, सत्येन्द्र नाथ बसु आदि जैसे महान वैज्ञानिक प्राप्त हुए, जिन्होंने असुविधाओं से लड़कर अपनी खोजीप्रवृत्ति का विकास किया और एक बार फिर सारी दुनिया में भारत का झण्डा लहराया ।

प्राचीन भारत में विज्ञान-

  • गणित – वैदिक साहित्य शून्य के कांसेप्ट, बीजगणित की तकनीकों तथा कलन-पद्धति, वर्गमूल, घनमूल के कांसेप्ट से भरा हुआ है।
  • खगोलविज्ञान – ऋग्वेद (2000 ईसापूर्व) में खगोलविज्ञान का उल्लेख है।
  • भौतिकी – ६०० ईसापूर्व के भारतीय दार्शनिक ने परमाणु एवं आपेक्षिकता के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख किया है।
  • रसायन विज्ञान – इत्र का आसवन, गन्दहयुक्त द्रव, वर्ण एवं रंजकों (वर्णक एवं रंजक) का निर्माण, शर्करा का निर्माण
  • आयुर्विज्ञान एवं शल्यकर्म – लगभग ८०० ईसापूर्व भारत में चिकित्सा एवं शल्यकर्म पर पहला ग्रन्थ का निर्माण हुआ था।
  • ललित कला – वेदों का पाठ किया जाता था जो सस्वर एवं शुद्ध होना आवश्यक था। इसके फलस्वरूप वैदिक काल में ही ध्वनि एवं ध्वनिकी का सूक्ष्म अध्ययन आरम्भ हुआ।
  • यांत्रिक एवं उत्पादन प्रौद्योगिकी – ग्रीक इतिहासकारों ने लिखा है कि चौथी शताब्दी ईसापूर्व में भारत में कुछ धातुओं का प्रगलन (स्मेल्टिंग) की जाती थी।
  • सिविल इंजीनियरी एवं वास्तुशास्त्र – मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त नगरीय सभयता उस समय में उन्नत सिविल इंजीनियरी एवं आर्किटेक्चर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है।

आधुनिक भारत का विज्ञान में योगदान-

  • होमा जहाँगीर भाभा – भाभा को भारतीय परमाणु का जनक माना जाता है इन्होने ही मुम्बई में भाभा परमाणु शोध संस्थान की स्थापना की थी
  • विक्रम साराभाई – भाभा के बाद वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष बने वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान  राष्ट्रीय समिति के प्रथम अघ्यक्ष थे थुम्बा में स्थित इक्वेटोरियल रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र के वे मुख्य सूत्रधार थे
  • एस . एस . भटनागर – इन्हें विज्ञानं प्रशासक के रूप में अपने शानदार कार्य के लिये जाना जाता है इन्होंने देश में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं की स्थापना की थी
  • सतीश धवन  – सतीश धवन को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा, सन 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया थाध्वनि के तेज रफ्तार (सुपरसोनिक) विंड टनेल के विकास में इनका प्रयास निर्देशक रहा है
  • जगदीश चंद्र बसु- ये भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्त्ता थे 1917 में जगदीश चंद्र बोस को ष्नाइटष् की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए श्रॉयल सोसायटी लंदनश् के फैलो चुन लिए गए इन्होंने ही बताया कि पौंधों में जीवन होता है
  • चंद्रशेखर वेंकट रमन – इन्होने स्पेक्ट्रम से संबंधित रमन प्रभाव का आविष्कार किया था जिसके कारण इन्हें 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था
  • बीरबल साहनी -बीरबल साहनी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पुरावनस्पति वैज्ञानिक थे इन्हें भारत का सर्व श्रेष्ठ पेलियो-जियोबॉटनिस्ट माना जाता है
  • सुब्रमण्यम चंद्रशेखर  – 1983 में तारों पर की गयी अपनी खोज के लिये इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
  • हरगोविंद खुराना – इन्होने जीन की संश्लेषण किया जिसके लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
  • ए.पी.जे. अब्दुल कलाम -जिन्हें मिसाइल मैन और जनता के राष्ट्रपति के नाम से जाना जाता है इन्होंने अग्नि एवं पृथ्वी जैसे प्रक्षेपास्त्रों को स्वदेशी तकनीक से बनाया था भारत सरकार द्वारा उन्हें 1981 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण का सम्मान प्रदान किया गया ।

वर्तमान में भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने 1973 से ही नए तथा पुनरोपयोगी ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने के लिए अनुसंधान और विकास कार्य आरंभ कर दिए थे। परन्तु, एक स्थायी ऊर्जा आधार के निर्माण में पुनरोपयोगी ऊर्जा या गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के उत्तरोत्तर बढ़ते महत्व को तेल संकट के तत्काल बाद 1970 के दशक के आरंभ में पहचाना जा सका।