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जनता जनार्दन !

जनता जर्नादन

वाह करते
वाह करते है लोग
नेताओं पर
जब कटाक्ष होवे
व्यवस्थाओं की
कलाई खोली जाए
वही जनता
बंद कर लेते हैं
आँख, कान व मुॅंह
अपनी गलती में

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव
हिन्‍दी भाषीय भारतीय यदि बातचीत हिन्‍दी में ही कर रहे होते हैं किन्‍तु उनके हिन्‍दी को सुनकर अंग्रेजी बोलने का आभास होने लगे तो यह हिन्‍दी बोलचाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव ही है ।

जल संकट का कारण और निदान जल स्रोत ही है

जल संकट का कारण और निदान जल स्रोत ही है । आवश्‍यकता के अनुरूप जलस्रोत  का न होना, जल स्रोतों में अतिक्रमण, जलस्रोतों को गंदा करके नष्‍ट करना, बांधों की कमी से वर्षा जल संरक्षित करने में कठिनाई आ रही है,

कोराना पर कुण्‍डलियॉं

कोराना पर कुण्‍डलियॉं
घृणा रोग से कीजिये, रोगी से तो नाहिं ।
रोगी को संबल मिलत, रोग देह से जाहिं ।
रोग देह से जाहिं, हौसला जरा बढ़ायें ।
देकर हिम्‍मत धैर्य, आत्‍म विश्‍वास जगायें ।।
सुन लो कहे रमेश, जोड़ भावना लोग से ।
दें रोगी को साथ, घृण हो भले रोग से ।।

रामचरितमानस के 108 महत्वतपूर्ण दोहे

राम चरित मानस के 108 महत्‍वपूर्ण दोहे
रामचरितमानस विश्व की प्रसिद्ध कृति है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी की जीवनी होने के साथ-साथ एक मानवतावादी पुरुष का कर्म प्रधान चित्रण है। इस कर्म-ज्ञान सम्रद्र से कुछ बूँदे मोती के रूप में प्रस्‍तुत करने का प्रयास है-

आई होली आई होली

आई होली आई होली, मस्ती भर कर लाई ।
झूम झूम कर बच्चे सारे, करते हैं अगुवाई ।

बच्चे देखे दीदी भैया, कैसे रंग उड़ाये ।
रंग अबीर लिये हाथों में, मुख पर मलते जाये ।
देख देख कर नाच रहे हैं, बजा बजा कर ताली ।
रंगो इनको जमकर भैया, मुखड़ा रहे न खाली ।
इक दूजे को रंग रहें हैं, दिखा दिखा चतुराई ।

आदि शङ्कराचार्य रचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद

आदि शङ्कराचार्य रचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद
चर्पट-लावणी
हरि का सुमरन कर ले बंदे, नश्‍वर है दुनियादारी ।
छोड़ रहें हैं आज जगत वह, कल निश्चित तेरी बारी ।।

दिवस निशा का क्रम है शाश्‍वत, ऋतुऐं भी आते जाते ।
समय खेलता खेल मनोहर, खेल समझ ना तुम पाते।।
आयु तुम्‍हारी घटती जाती, खबर तनिक ना तुम पाये ।
हरि सुमरन छोड़ जगत से, तुम नाहक मोह बढ़ाये ।।1।।

राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां

राजनीति पर कुछ कुण्‍डलियां
कोयल कौआ एक सा, नहीं रंग में भेद ।
राजनीति का रंग भी, कालिख श्‍याम अभेद ।।
कालिख श्‍याम अभेद, स्‍वार्थ है अपना अपना ।
कोई नहीं तटस्‍थ, सभी कोई है ढपना ।।
फेकू पप्‍पू रंग, भक्‍त चम्‍मच ठकठौआ ।
करे कौन पहचान, श्‍याम है कोयल कौआ ।।

अनुष्‍टुप छंद विधान और उदाहरण

अनुष्‍टुप छंद एक वैदिक वार्णिक छंद है । इस छंद को संस्‍स्‍कृत में प्राय: श्‍लोक कहा जाता है या यों कहिये श्‍लोक ही अनुष्‍टुप छंद है । संस्‍कृत साहित्‍य में सबसे ज्‍यादा जिस छंद का प्रयोग हुआ है, वह अनुष्‍टुप छंद ही है ।

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