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गीत-लोकगीत साहित्‍य रत्‍न

भारत माता की आरती

स्वर्ग से है बड़ी यह धरा मंगलम
मातरम मातरम मातरम मातरम
हिन्द जैसी धरा और जग में कहां
विश्व कल्याण की कामना हो जहां
ज्ञान की यह धरा मेटती घोर तम
मातरम मातरम मातरम मातरम
स्वर्ग से है बड़ी यह धरा मंगलम
मातरम मातरम मातरम मातरम
श्याम की बांसुरी कर्म का नाद है
आचरण राम का नित्य संवाद है
हिन्द है वह धरा है जहां यह मरम
मातरम मातरम मातरम मातरम
स्वर्ग से है बड़ी यह धरा मंगलम
मातरम मातरम मातरम मातरम
जय जयतु भारती जय जयतु भारती
कर जोर कर नित्य ही हम करे आरती
मातु ये है हमारी व संतान हम
मातरम मातरम मातरम मातरम
स्वर्ग से है बड़ी यह धरा मंगलम
मातरम मातरम मातरम मातरम
-रमेश चौहान
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अतुकांत कविता साहित्‍य रत्‍न

अतुकांत कविता- मैं एक अदना सा प्रायवेट स्‍कूल का टीचर

मैं एक अदना-सा
प्रायवेट स्कूल का टिचर
और वह
श्रम साधक मजदूर ।
मैं दस बजे से पांच बजे तक
चारदीवार में कैद रहता
स्कूल जाने के पूर्व
विषय की तैयारी
स्कूल के बाद पालक संपर्क
और वह
नौ बजे से दो बजे तक
श्रम की पूजा करता
इसके पहले और बाद
दायित्व से मुक्त ।
मेरे ही स्कूल में
उनके बच्चे पढ़ते हैं
जिनका मासिक शुल्क
महिने के महिना
अपडेट रहता है
मेरे बच्चे का
मासिक शुल्क
चार माह से पेंडिग है ।
मेरे बचपन का मित्र
जो मेरे साथ पढ़ता था
आठवी भी नहीं पढ़ पाया
आज राजमिस्त्री होकर
चार सौ दैनिक कमा लेता है
और इतने ही दिनों में
मैं एम.ए.डिग्री माथे पर चिपका कर
महिने में पाँच हजार कमा पाता हूँ ।
किराने के दुकान एवं राशन दुकान के
बही-खाते में मेरा नाम बना ही रहता है
शायद वह दैनिक नकद खर्च करता है
-रमेश चौहान
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नवगीत साहित्‍य रत्‍न

नवगीत-घुला हुआ है वायु में मीठा-सा विष गंध

घुला हुआ है
वायु में,
मीठा-सा विष गंध

जहां रात-दिन धू-धू जलते,
राजनीति के चूल्हे
बाराती को ढूंढ रहे हैं,
घूम-घूम कर दूल्हे
बाँह पसारे
स्वार्थ के
करने को अनुबंध
भेड़-बकरे करते जिनके,
माथ झुका कर पहुँनाई
बोटी - बोटी करने वह तो
सुना रहा शहनाई
मिथ्या- मिथ्या
प्रेम से
बांध रखे इक बंध
हिम सम उनके सारे वादे
हाथ रखे सब पानी
चेरी, चेरी ही रह जाती
गढ़कर राजा -रानी
हाथ जले हैं
होम से
फँसे हुये हम धंध।
-रमेश चौहान
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गज़ल मुक्‍तक साहित्‍य रत्‍न

गज़ल-या र‍ब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नहीं

या रब जुदा ये तुझसे जमाना तो है नहीं
क्यों फिर भी कहते तेरा ठिकाना तो है नहीं

कण कण वजूद है तो तुम्हारा सभी कहे
माने भी ऐसा कोई सयाना तो है नहीं

सुख में भुला पुकारे तुझे दुख में आदमी
नायाब उनका कोई बहाना तो है नहीं

भटके रहे जो माया के पीछे यहीं कहीं
कोई भला खुदा का दिवाना तो है नहीं

लगता मुझे तो खुद का इबादत ही ढोंग सा
अपना भी कोई खास निशाना तो है नहीं

-रमेश चौहान
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साहित्‍य रत्‍न साहित्यिक चर्चा

हिन्‍दी साहित्‍य में क्षेत्रीय बोली-भाषाओं का योगदान


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार -‘साहित्य जनता की चित्त-वृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब अर्थात समाज का दर्पण है।‘  जब साहित्य समाज का दर्पण है, तो समाज के सभी आयामों का प्रतिबिम्ब दर्पण में अंकित होंगी ही । जब हम भारतीय समाज के संदर्भ में अध्ययन करते हैं, तो भारतीय विविधता स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होने लगते हैं । इन्ही विविधता में भाषायिक विविधता सम्मिलित है । भाषायी विविधता के संदर्भ में कहा गया है -‘‘‘चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी‘‘ एवं इसी संदर्भ में कबीरदास की प्रसिद्ध पंक्ति है – ‘‘संस्किरित है कूप जल, भाखा बहता नीर।‘‘ इससे अनुमान लगाया जा सकता है हमारे देष में कितनी बोलियां बोली जाती हैं।  जिनका दर्पण रूपी साहित्य में प्रतिबिम्ब अंकित होना अवष्यसंभावी है । किन्तु आचार्य संजीव ‘सलील‘ मानते है -‘‘साहित्य जड़वत दर्पण नही है अपितु यह सजीव प्रतिक्रियात्मक है जो समाज को सचेत भी करता है।‘  साहित्य के प्रतिक्रियात्मक चेतना के बल पर बोली सवंर्धित-प्रवर्धित होकर साहित्य में स्थान बनाती है। साहित्य किसी भाषा का लैखिक एवं मौखिक स्वरूप का सम्मिश्रण होता है । मौखिक रूप से बोली जाने वाली भाशा लोगो के मौलिक मातृबोली से प्रभावित होती है। अतः स्पश्ट है कि-साहित्य को संपन्न बनाने में इन बोलियों की विषेश भूमिका होती है ।


जब  हम हिन्दी साहित्य में क्षेत्रीय बोलियों के योगदान पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो हमें भाषा के विकास क्रम पर चिंतन करना चाहिये । हिन्दी का विकास क्रम-संस्कृत→ पालि→ प्राकृत→ अपभ्रंश→ अवहट्ट→ प्राचीनध्प्रारम्भिक हिन्दी मानी जाती है ।  अपभ्रंष से हिन्दी उदगम पथ पर क्षेत्र विषेष के प्रभाव से विभिन्न शैलियों का जन्म हुआ विस्तृत क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ उसे हिन्दी एवं सीमित क्षेत्र में विकसित शैलियों को बोलियां कहा गया । अपने रहन-सहन, प्राकतिक वातावरण के अनुरूप विभिन्न भाशा-बोली का विकास हुआ है।


हिन्दी साहित्य का विकास आठवीं शताब्दी से माना जाता है । हांलाकि इसकी जड़े प्राचाीन भारत के प्राचीन ‘संस्कृत‘ भाशा में तलाषी जा सकती है ।  किंतु हिन्दी साहित्य की जड़े मध्ययुगीन भारत के छोटे-छोटे क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियों में पाई जाती हैं । मध्यकाल में ही हिन्दी का स्वरूप स्पष्ट हुआ तथा उसकी प्रमुख बोलियाँ विकसित हुई ।   हिन्दी के मुख्य दो भेद पूर्वी हिन्दी एवं पश्चिमी हिन्दी स्वीकार किये गये हैं । पूर्वी हिन्दी के अंतर्गत अर्धमागधी प्राकृत स्वभाव के अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी को रखा गया है। पश्चिमी हिन्दी के अंतर्गत पांच बोलियां -खड़ी बोली, बांगरू, ब्रज, कन्नौजी, और बुंदेली स्वीकार किये गये हैं । इनके अतिरिक्त बिहारी, राजस्थानी एवं पहाड़ी हिन्द प्रदेश की उपभाषएं (बोलियां) स्वीकार की गई हैं । गैर हिन्दी भाषीय क्षेत्र में बोली जानी वाली हिन्दी बोली में – बम्बईया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी एवं दक्खिनी हिन्दी भी सम्मिलित है । श्री मधूधवन ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास‘ में भूमिका देते हुये स्वीकार करते हैं कि -‘ इन सभी भाषाओं के साहित्य को हिन्दी का साहित्य माना जाता है क्योंकि ये भाषाएँ हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘अपभ्रंश’ काल से उन समस्त रचनाओं का अध्ययन किया जाता है उपर्युक्त उपभाषाओं में से भी लिखी हो।‘‘ वास्तव में ‘हिन्दी‘ शब्द भाषा विशेष का वाचक नहीं है, बल्कि यह भाषा समूह का नाम है। हिन्दी जिस भाषा समूह का नाम है, उसमें आज के हिंदी प्रदेशध्क्षेत्र की 5 उपभाषाएँ तथा 17 बोलियाँ शामिल हैं। वस्तुतः इन बोलियों या उपभाशाओं को हिन्दी भाशा की बोली या उपभाशा मानने के पीछे इन सबकी परस्पर सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनितिक एकता के साथ-साथ परस्पर बोधगम्यता, षब्द-वर्ग की समानता तथा संरचनात्मक साम्य है ।


हिन्दी की विविधता उसकी शक्ति है ।  हिन्दी की बोलियां अपने साथ एक बड़ी परंपरा एवं सभ्यता को समेटे हुये हैं।   इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है ।  हिन्दी साहित्य के जिस कालखण्ड़ को ‘स्वर्ण युग‘ की संज्ञा दी गई, उस काल पर दृश्टिपात करने से हम पाते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा ‘अवधी‘ में रचित ‘रामचरित मानस‘, सूरदासजी द्वारा ‘ब्रजभाषा‘ में रचित ‘सूरसागर‘ मीरा बाई का राजस्थानी एवं ब्रजभाषा में साहित्यिक उपादान ‘बरसी का मायरा‘ एवं ‘गीत गोंविंद टीका‘, विद्यापति के मैथली की रचनाएं आदि आज हमारी साहित्यिक धरोहर हैं। 
विभिन्न बोलियों एवं उपभाषाओं का हिन्दी साहित्य में आदिकाल से आज पर्यंत सतत प्रभाव बना हुआ है –
अवधी- अवधी अपने आदिकाल से ही हिन्दी की प्रमुख उप भाषा के रूप  में रही है ।  हिन्दी साहित्य अवधी साहित्य पर निर्भर रहा है । अवधी की पहली कृति मुल्ला दाउद की ‘चंद्रायन‘ या ‘लोरकहा‘ (1370 ई.) मानी जाती है। इसके उपरान्त अवधी भाषा के साहित्य का उत्तरोत्तर विकास होता गया। अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय सूफीध्प्रेममार्गी कवियों को है। कुतबन (मृगावती), जायसी (पद्मावत), मंझन (मधुमालती), आलम (माधवानल कामकंदला), उसमान (चित्रावली), नूर मुहम्मद (इन्द्रावती), कासिमशाह (हंस जवाहिर), शेख निसार (यूसुफ जुलेखा), अलीशाह (प्रेम चिंगारी) आदि सूफी कवियों ने अवधी को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। बैसवाड़ी अवधी में गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित ‘रामचरित मानस‘ ने हिन्दी साहित्य को नई ऊंचाई पर पहुॅचाया । ‘रामचरित मानस‘ के रूप में आज भी हिन्दी साहित्य के रूप में घर-घर स्थापित है ।

ब्रजभाषा-

हिंदी साहित्य के मध्ययुग में ब्रजभाषा में उच्च कोटि का काव्य निर्मित हुआ। इसलिए इसे बोली न कहकर आदरपूर्वक भाषा कहा गया। मध्यकाल में यह बोली संपूर्ण हिन्दी प्रदेश की साहित्यिक भाषा के रूप में मान्य हो गई थी। पर साहित्यिक ब्रजभाषा में ब्रज के ठेठ शब्दों के साथ अन्य प्रांतों के शब्दों और प्रयोगों को भी ग्रहण किया है। ब्रजभाषा साहित्य का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ सुधीर अग्रवाल का ‘प्रद्युम्न चरित‘(1354 ई.) है। भक्तिकाल में कृष्णभक्त कवियों ने अपने साहित्य में ब्रजभाषा का चरम विकास किया। पुष्टि मार्ग-शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के सूरदास (सूरसागर), नंददास, निम्बार्क संप्रदाय के श्री भट्ट, चैतन्य सम्प्रदाय के गदाधर भट्ट, राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित हरिवंश एवं सम्प्रदाय निरपेक्ष कवियों में रसखान, मीराबाई आदि प्रमुख कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा के साहित्यिक विकास में अमूल्य योगदान  दिया । इन भक्तों के पद आज भी पूरे हिन्दी भाशाी प्रदेषों में प्रचलित हैं ।

खड़ी बोली-


इसी बोली के आधार पर हिन्दी का आधुनिक रूप  खड़ा हुआ है । प्राचीन हिन्दी काल में रचित खड़ी बोली साहित्य में खड़ी बोली के आरम्भिक प्रयोगों से उसके आदि रूप या बीज रूप का आभास मिलता है। खड़ी बोली का आदिकालीन रूप सरहपा आदि सिद्धों, गोरखनाथ आदि नाथों, अमीर खुसरो जैसे सूफियों, जयदेव, नामदेव, रामानंद आदि संतों की रचनाओं में उपलब्ध है। इन रचनाकारों में हमें अपभ्रंश-अवहट्ट से निकलती हुई खड़ी बोली स्पष्टतः दिखाई देती है। श्रीधर पाठक की प्रसिद्व रचनाएं एकांत योगी और कश्मीर सुषमा खड़ी बोली की सुप्रसिद्ध रचनाएं हैं। रामनरेश द्विवेदी ने अपने पथिक मिलन और स्वप्न महाकाव्यों में इस बोली का विकास किया। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘ के ‘प्रिय प्रवास‘ को खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना गया है।

दक्खिनी-


हिन्दी में गद्य रचना परम्परा की शुरुआत करने का श्रेय दक्कनी हिन्दी के रचनाकारों को ही है। दक्कनी हिन्दी को उत्तर भारत में लाने का श्रेय प्रसिद्ध शायर वली दक्कनी (1688-1741) को है। वह मुगल शासक मुहम्मद शाह ‘रंगीला‘ के शासन काल में दिल्ली पहुँचा और उत्तरी भारत में दक्कनी हिन्दी को लोकप्रिय बनाया। डाॅं कुंज मेत्तर के अनुसार आधुनिक खड़ीबोली हिन्दी का विकास दक्षिण के हिन्दीतर क्षेत्रों में हुआ वे लिखते हैं -‘‘हिन्दी का जो रूप हमारे सामने है उसका पूववर्ती रूप दक्षिण में विकसित हुआ । खड़ी बोली के दक्षिण में व्यवहृत पुराने स्वरूप  को देखकर हम यह विष्वास करने को बाध्य हो जाते है कि भाशा की दृश्टि से आधुनिकता के तत्व आरंभकालिन दक्खिनी में अभिव्यक्त हुये थे ।‘‘
छत्तीसगढी- छत्तीसगढी के प्रांरभिक लिखित रूप के बारे में कहा जाता है कि वह 1703 ईस्वी के दंतेवाडा के दंतेश्वरी मंदिर के मैथिल पंडित भगवान मिश्र द्वारा शिलालेख में है ।  कबीर दास के शिष्य और उनके समकालीन (संवत 1520) धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी के आदि कवि का दर्जा प्राप्त है, जिनके पदों को आज भी कबीर अनुनायियों द्वारा गाया एवं पढ़ा जाता है । हिन्दी साहित्य में माधवराव सप्रे के जिस कहानी ‘टोकरी भर मिट्टी‘ को प्रथम सुगठित कहानी होने को श्रेय प्राप्त है, उसकी पृष्‍ठ छत्तीसगढ़ी लोकगाथा में अवलंबित है । पं. सुन्दरलाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, नरसिंह दास वैष्णव, बंशीधर पांडेय, शुकलाल पांडेय, कुंजबिहारी चैबे, गिरिवरदास वैष्णव ने राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में अपनी रचनाओं द्वारा छत्तीसगढ़ी के उत्कर्ष को नया आयाम दिया ।

बुंदेली –


हिंदी साहित्य के विकास और समृद्धि में लोक भाषा बुंदेली का महत्वपूर्ण योगदान है। इसे किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं आंका जा सकता है। इसका विकास रासो काव्य धारा के माध्यम से हुआ। जगनिक आल्हाखंड तथा परमाल रासो प्रौढ़ भाषा की रचनाएं हैं। बुंदेली के आदि कवि के रुप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं, जो बुंदेली की समस्त विशेषताओं से मंडित हैं।

छत्तीसगढ़ी-

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय सभी प्रदेश अंचल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हुये, जिससे सभी बोलियों में राश्ट्रीयता का नाद गुंजा जिससे हिन्दी साहित्य आज भी गुजिंत है ।  स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व मौखिक रूप से हिन्दी-उर्दू-क्षेत्रीय बोलियों से मिश्रित हिन्दी का उपयोग किया गया जिसे हिन्दूस्तानी के नाम से गांधी आदि नेताओं द्वारा अभिहित किया जाता था । हिन्दी, हिन्दुस्तानी भाषा के नाम से आजादी के लड़ाई का मुख्य हथियार रहा । डाॅ. श्रीलाल शुक्ल ‘‘आजादी के बाद हिन्दी‘‘ में लिखते हैं -‘‘हिन्दी स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा थी । बीसवी षताब्दी के प्रारंभ में अनेक लोगो ने बचपना में हिन्दी केवल इसीलिये सीखे ताकि वह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले सके ।‘‘  मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी बोली में अनेक काव्या की रचना की। उनकी ‘भारत भारती‘ में स्वाधीनता आंदोलन की ललकार है। राष्ट्रीय प्रेम उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर है। सभी बोलियों में आजादी का उदघोश है । ‘कोदूराम दलित‘ छत्तीसगढ़ी में कहते हैं –


अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी
कतको झिन मन चल देइन, आइस अब हमरो बारी ।

हरिश्चंद्र पांडेय ‘सरल‘ अवधी में कहते हैं-

मनई बन मनई का प्यार दे,
भेद जाति धर्म कै बिसार दे,
गंगा कै नीर गुन गाये
देसवा कै पीर गुन गाये।

    आदिकाल से आज पर्यंत साहित्य पर बोलियों का प्रभाव बना हुआ है भक्तिकाल भक्तिपरक तो स्वतंत्रता आंदोलन में आजादी के गीत तदुपरांत समाज के विभिन्न कुरीतियों पर कटाक्ष लोकजागरण के स्वर लोकभाशा से साहित्य तक संचरित हुये हैं ।  आजादी के पष्चात प्रचार-तंत्र टी.वी. मीडि़या, रेडि़यो, समचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाओं के विकास के साथ-साथ अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी हरियाणवी बोलियों में उच्चकोटि के रचनाएं गीत लोकगीत सामने आये । हबीब भारती की हरियाणवी रचना दृष्‍टव्य है-

हे दुनिया जिसनै हीणा समझै उसकी गैल पडै़ सै।
हे बान बैठणा ब्याह करवाणा हे बस मैं मेरै कडै़ सै।
हे ना बूज्झैं करैं सगाई, टोह कै ठोड़-ठिकाणा
हे घाल जेवड़ा गेल्यां कर दें, पडै़ लाजिमी जाणा
हे जिस दिन दे दें धक्का बेबे, आगै हुकम बजाणा
हे यो तो बेबे घर अपणा सै, आगै देश बिराणा
हे को दिन रहल्यूं मां धोरै या जितणै पार पडै़ सै

बोली और उपभाषा की अनेक ऐसी रचनाएं हैं, जिनके बल पर हिन्दी को आजअंतर्राष्‍ट्रीय पहचान प्राप्त हुआ । निष्‍कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से हिन्दी को उनके सहगामी बोलियां समृद्ध बनाने में सदा से महत्वपूर्ण योगदान देते आ रही हैं ।

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आलेख रत्‍न तकनीकी

विज्ञान एक परिचय

विज्ञान

परिचय-

प्रकृति को जानने समझने की जिज्ञासा प्रकति निर्माण के समान्तर चल रही है । अर्थात जब से प्रकृति का अस्तित्व है तब से ही उसे जानने का मानव मन में जिज्ञासा है । यह जिज्ञासा आज उतनी ही बलवती है, जितना कल तक थी । जिज्ञासा सदैव असंतृप्त होती है । क्यों कैसे जैसे प्रश्‍न सदैव मानव मस्तिक में चलता रहता है । इस प्रश्‍न का उत्तर कोई दूसरे से सुन कर शांत हो जाते हैं तो कोई उस उत्तर को धरातल में उतारना चाहता है । अर्थात करके देखना चाहता, इसी जिज्ञासा से जो जानकारी प्राप्त होती है, वही विज्ञान है । विज्ञान कुछ नही केवल जानकारियों का क्रमबद्ध सुव्यवस्थित होना है, केवल ज्ञान का भण्ड़ार होना नही । गढ़े हुये धन के समान संचित ज्ञान भी व्यर्थ है, इसकी सार्थकता इसके चलायमान होने में है ।

प्रकृति के सार्वभौमिक नियमों को क्यों? और कैसे? जैसे प्रश्नों में विभक्त करके विश्लेषण करने की प्रक्रिया से प्राप्त होने वाले तत्थों या आकड़ों के समूह को विशिष्ट ज्ञान या संक्षिप्त में विज्ञान कहते हैं।

दुनियो के विशिष्‍ठ ज्ञानों के समूह को ही विज्ञान कहा जाता है ।

आईये प्राकृति के किसी सार्वभौमिक नियम का विश्लेषण करके जाने-

प्रकृति का सार्वभौमिक नियम-धूप में गीले कपड़े सूख जाते हैं। क्यों? और कैसे?’

विश्लेषण- सूरज की किरणों में कई तरह के अवरक्त विकिरण होते हैं। जो तरंग के रूप में हम तक पहुंचते हैं। इन अवरक्त विकिरणों में बहुत अधिक ऊर्जा होती है। ये ऊर्जा कपड़े में मौजूद पानी के अणुओं द्वारा सोख ली जाती है। जिसकी वजह से वो कपड़े की सतह को छोड़कर वायुमण्डल में चले जाते हैं। पानी के सारे कण जब कपड़े की सतह को छोड़ देते हैं तो कपड़ा सूख जाता है।

विशिष्ट ज्ञान या विज्ञान- अणु अपनी ऊर्जा स्तर के आधार पर अपनी स्थिती में बदलाव कर लेते हैं तथा एक नई संरचना धारण कर लेते हैं।

जैसे-
  • लोहे के अणुओं को बहुत अधिक ऊर्जा दे दी जाय तो वो पिघल कर द्रव में बदल जाते हैं।
  • मिट्टी की ईटों को बहुत अधिक ऊर्जा देने पर वो पहले से ज्यादा ठोस हो जाता हैं।
  • पानी के अणुओं की ऊर्जा अवशोषित करने पर वो जमकर बर्फ में बदल जाते हैं।

सिद्धांत क्या है ?

एक सिद्धांत एक वैज्ञानिक आधार, मजबूत सबूत और तार्किक तर्क पर सुझाव के रूप में परिभाषित किया जाता है। एक सिद्धांत को सिद्ध नहीं जाता, लेकिन एक वैज्ञानिक मुद्दे को एक सत्य प्रतीत होने वाला स्पष्टीकरण होने का विश्वास होता है।

वैज्ञानिक विधि-

  • क्रमबद्धप्रेक्षण
  • परिकल्पना निर्माण
  • परिकल्पना का परीक्षण
  • सिद्धांत कथन

दैनिक जीवन में विज्ञान-

जीवन के हर क्षेत्र उपयोगी प्राचीन भारतीय विज्ञान तथा तकनीक को जानने के लिये पुरातत्व और प्राचीन साहित्य का सहारा लेना पडता है। प्राचीन भारत का साहित्य अत्यन्त विपुल एवं विविधतासम्पन्न है। इसमें धर्म, दर्शन, भाषा, व्याकरण आदि के अतिरिक्त गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, रसायन, धातुकर्म, सैन्य विज्ञान आदि भी वर्ण्यविषय रहे हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में प्राचीन भारत के कुछ योगदान निम्नलिखित हैं-

हमारे देश के स्‍वर्णिम इतिहास जब हमारा भारत विश्‍व गुरू हआ करता था, उस प्राचीन काल में बौधायन, चरक, कौमरभृत्य, सुश्रुत, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, वाग्भट, नागार्जुन एवं भास्कराचार्य जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिक हुए । जब पश्चिमी वैज्ञानिक चिंतन ने इस देश की धरती पर पुनः कदम रखा, तो हमारे देश की सोई हुई मेधा जाग उठी और देश को जगदीश चंद्र बसु, श्रीनिवास रामानुजन, चंद्रशेखर वेंकट रामन, सत्येन्द्र नाथ बसु आदि जैसे महान वैज्ञानिक प्राप्त हुए, जिन्होंने असुविधाओं से लड़कर अपनी खोजीप्रवृत्ति का विकास किया और एक बार फिर सारी दुनिया में भारत का झण्डा लहराया ।

प्राचीन भारत में विज्ञान-

  • गणित – वैदिक साहित्य शून्य के कांसेप्ट, बीजगणित की तकनीकों तथा कलन-पद्धति, वर्गमूल, घनमूल के कांसेप्ट से भरा हुआ है।
  • खगोलविज्ञान – ऋग्वेद (2000 ईसापूर्व) में खगोलविज्ञान का उल्लेख है।
  • भौतिकी – ६०० ईसापूर्व के भारतीय दार्शनिक ने परमाणु एवं आपेक्षिकता के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख किया है।
  • रसायन विज्ञान – इत्र का आसवन, गन्दहयुक्त द्रव, वर्ण एवं रंजकों (वर्णक एवं रंजक) का निर्माण, शर्करा का निर्माण
  • आयुर्विज्ञान एवं शल्यकर्म – लगभग ८०० ईसापूर्व भारत में चिकित्सा एवं शल्यकर्म पर पहला ग्रन्थ का निर्माण हुआ था।
  • ललित कला – वेदों का पाठ किया जाता था जो सस्वर एवं शुद्ध होना आवश्यक था। इसके फलस्वरूप वैदिक काल में ही ध्वनि एवं ध्वनिकी का सूक्ष्म अध्ययन आरम्भ हुआ।
  • यांत्रिक एवं उत्पादन प्रौद्योगिकी – ग्रीक इतिहासकारों ने लिखा है कि चौथी शताब्दी ईसापूर्व में भारत में कुछ धातुओं का प्रगलन (स्मेल्टिंग) की जाती थी।
  • सिविल इंजीनियरी एवं वास्तुशास्त्र – मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से प्राप्त नगरीय सभयता उस समय में उन्नत सिविल इंजीनियरी एवं आर्किटेक्चर के अस्तित्व को प्रमाणित करती है।

आधुनिक भारत का विज्ञान में योगदान-

  • होमा जहाँगीर भाभा – भाभा को भारतीय परमाणु का जनक माना जाता है इन्होने ही मुम्बई में भाभा परमाणु शोध संस्थान की स्थापना की थी
  • विक्रम साराभाई – भाभा के बाद वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष बने वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान  राष्ट्रीय समिति के प्रथम अघ्यक्ष थे थुम्बा में स्थित इक्वेटोरियल रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र के वे मुख्य सूत्रधार थे
  • एस . एस . भटनागर – इन्हें विज्ञानं प्रशासक के रूप में अपने शानदार कार्य के लिये जाना जाता है इन्होंने देश में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं की स्थापना की थी
  • सतीश धवन  – सतीश धवन को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा, सन 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया थाध्वनि के तेज रफ्तार (सुपरसोनिक) विंड टनेल के विकास में इनका प्रयास निर्देशक रहा है
  • जगदीश चंद्र बसु- ये भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्त्ता थे 1917 में जगदीश चंद्र बोस को ष्नाइटष् की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए श्रॉयल सोसायटी लंदनश् के फैलो चुन लिए गए इन्होंने ही बताया कि पौंधों में जीवन होता है
  • चंद्रशेखर वेंकट रमन – इन्होने स्पेक्ट्रम से संबंधित रमन प्रभाव का आविष्कार किया था जिसके कारण इन्हें 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था
  • बीरबल साहनी -बीरबल साहनी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पुरावनस्पति वैज्ञानिक थे इन्हें भारत का सर्व श्रेष्ठ पेलियो-जियोबॉटनिस्ट माना जाता है
  • सुब्रमण्यम चंद्रशेखर  – 1983 में तारों पर की गयी अपनी खोज के लिये इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
  • हरगोविंद खुराना – इन्होने जीन की संश्लेषण किया जिसके लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
  • ए.पी.जे. अब्दुल कलाम -जिन्हें मिसाइल मैन और जनता के राष्ट्रपति के नाम से जाना जाता है इन्होंने अग्नि एवं पृथ्वी जैसे प्रक्षेपास्त्रों को स्वदेशी तकनीक से बनाया था भारत सरकार द्वारा उन्हें 1981 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण का सम्मान प्रदान किया गया ।

वर्तमान में भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने 1973 से ही नए तथा पुनरोपयोगी ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने के लिए अनुसंधान और विकास कार्य आरंभ कर दिए थे। परन्तु, एक स्थायी ऊर्जा आधार के निर्माण में पुनरोपयोगी ऊर्जा या गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के उपयोग के उत्तरोत्तर बढ़ते महत्व को तेल संकट के तत्काल बाद 1970 के दशक के आरंभ में पहचाना जा सका।

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आलेख रत्‍न सांस्‍कृतिक

परिवार का महत्व

       परिवार का अस्तित्व

हम बाल्यकाल से पढ़ते आ रहे हैं की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं और समाज का न्यूनतम इकाई परिवार है । जब हम यह कहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं तो इसका अर्थ क्या होता है ?  किसी मनुष्य का जीवन समाज में  उत्पन्न होता है और समाज में ही विलीन हो जाता है । सामाज का नींव परिवार है ।

परिवार क्या है  ?

कहने के लिये हम कह सकते हैं-“वह सम्मिलित वासवाले रक्त संबंधियों का समूह, जिसमें विवाह और दत्तक प्रथा स्वीकृत व्यक्ति  सम्मिलित होता है परिवार कहलाता है ।” इस परिभाषा के अनुसार परिवार में रक्त संबंधों के सारे संबंधी साथ रहते हैं जिसे  आजकल संयुक्त परिवार कह दिया गया । और व्यवहारिक रूप से पति पत्नी और बच्चों के समूह को ही परिवार में माना जा रहा है ।

 परिवार का निर्माण 

  परिवार का निर्माण  तभी संभव है  जब अलग अलग-अलग रक्त से उत्पन्न  महिला-पुरुष  एक साथ रहें । भारत में पितृवंशीय परिवार अधिक प्रचलित है । इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि परिवार में नारी का स्थान कमतर है वस्तुतः परिवार का अस्तित्व ही नारी पर निर्भर है । नारी अपना जन्म स्थान छोड़कर पुरुष के परिवार का निर्माण करती है । व्यक्ति की सामाजिक मर्यादा परिवार से  निर्धारित होती है। नर-नारी के यौन संबंध परिवार के दायरे में निबद्ध होते हैं। यदि नारी पुरुष के साथ रहने से इंकार कर दे तो परिवार का निर्माण संभव ही नहीं है,  इसी बात को ध्यान में रखकर लड़की की माता-पिता अपनी बेटी को बाल्यावस्था से इसके लिये मानसिक रूप तैयार करती है । परिवार में पुरुष का दायित्व परिवार का भरण-पोषण करना और परिवार को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने का दायित्व दिया  गया है । पुरूष इस दायित्व का निर्वहन तभी न करेंगे जब परिवार का निर्माण होगा । परिवार का निर्माण नारी पर ही निर्भर है ।

विवाह का महत्व

        परिवार विवाह से उत्पन्न होता है और इसी संबंध पर टिका रहता है । भारतीय समाज में विवाह को केवल महिला पुरुष के मेल से नहीं देखा जाता । अपितु  दो परिवारों, दो कुटुंबों के मेल से देखा जाता है । परिवार का अस्तित्व तभी तक बना रहता है जब तक नारी  यहां नर के साथ रहना स्वीकार करती है जिस दिन वह नारी पृथक होकर अलग रहना चाहती है उसी दिन परिवार टूट जाता है यद्यपि परिवार नर नारी के संयुक्त उद्यम से बना रहता है तथापि पुरुष की तुलना में परिवार को बनाने और बिगाड़ने में नारी का महत्व अधिक है । यही कारण है कि विवाह के समय बेटी को विदाई देते हुए बेटी के मां बाप द्वारा उसे यह शिक्षा दी जाती है के ससुराल के सारे संबंधियों को अपना मानते हुए परिवार का देखभाल करना ।
 बुजुर्ग लोग यहां तक कहा करते थे कि बेटी मायका जन्म स्थल होता है और ससुराल जीवन स्थल ससुराल में हर सुख दुख सहना और अपनी आर्थी ससुराल से ही निकलना । किसी भी स्थिति में मायका में जीवन निर्वहन की नहीं सोचना । इसी शिक्षा को नारीत्व की शिक्षा कही गयी ।

परिवारवाद पर ग्रहण

        नारीत्व की शिक्षा ही परिवार के लिये ग्रहण बनता चला गया । ससुराल वाले कुछ लोग इसका दुरूपयोग कर नारियों पर अत्याचार करने लगे । यह भी एक बिड़बना है कि परिवार में एक नारी के सम्मान को पुरूष से अधिक एक नारी ही चोट पहुँचाती है । सास-बहूँ के संबंध को कुछ लोग बिगाड़ कर रखे हैं । अत्याचार का परिणाम यह हुआ कि अब परिवार पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगने लग गया है । नारी इस नारीत्व की शिक्षा के विरूद्ध होने लगे ।  परिणाम यह हुआ कि आजकल कुछ उच्च शिक्षित महिलाएं आत्मनिर्भर होने के नाम पर परिवार का दायित्व उठाने से इंकार करने लगी हैं । 

परिवार का अपघटन

       परिवार का अर्थ पति-पत्नि और बच्चे ही कदापि नहीं हो सकता । परिवार में जितना महत्व पति-पत्नि का है उससे अधिक महत्व सास-ससुर और बेटा-बहू का है । आजकल के लोग संयुक्त परिवार से भिन्न अपना परिवार बसाना चाहते हैं । यह चाहत ही परिवार को अपघटित कर रहा है ।
पति-पत्नि के इस परिवार को देखा जाये तो बहुतायत यह दिखाई दे रहा है कि महिला पक्ष के संबंधीयों से इनका संबंध तो है किन्तु पुरूष के संबंधियों से इनका संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं ।
कोई बेटी अपने माँ-बाप की सेवा करे इसमें किसी को कोई आपत्ती नहीं, आपत्ति तो इस बात से है कि वही बेटी अपने सास-ससुर की सेवा करने से कतराती हैं ।
 हर बहन अपने भाई से यह आपेक्षा तो रखती हैं कि उसका भाई उसके माँ-बाप का ठीक से देख-रेख करे किन्तु वह यह नहीं चाहती कि उसका पति अपने माँ-बाप का अधिक ध्यान रखे ।
यही सोच आज परिवार के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा कर रहा है ।   शतप्रतिशत महिलायें ऐसी ही हैं  यह कहना नारीवर्ग का अपमान होगा, ऐसा है भी नहीं किन्तु यह कटु सत्य इस प्रकार की सोच रखनेवाली महिलाओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ रहीं हैं ।
कुछ पुरूष नशाखोरी, कामचोरी के जाल में फँस कर अपने परिवारिक दायित्व का निर्वहन करने से कतरा रहे हैं, यह भी परिवार के विघटन का एक बड़ा कारण है ।

परिवार का संरक्षण

संयुक्त परिवार से भिन्न अपना परिवार बसाने की चाहत पर यदि  अंकुश नहीं लगाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय परिवार की अभिधारणा केवल इतिहास की बात होगी ।  हमें इस बात पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है कि-महिलाओं पर अत्याचार क्यों ? महिलाओं का अपमान क्यों ? जब परिवार की नींव ही महिलाएं हैं तो  महिलाओं का सम्मान क्यों नही ? इसके साथ-साथ इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि महिला अपने ससुराल वालों का सम्मान क्यों नहीं कर सकती ? क्या एक आत्मनिर्भर महिला परिवार का दायित्व नहीं उठा सकती ?  चाहे वह महिला सास हो, बहू हो, ननद हो, भाभी हो या देरानी-जेठानी । पत्नि और बेटी के रूप एफ सफल महिला अन्य नातों में असफल क्यों हो रही हैं ? इन सारे प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर ही परिवार को संरक्षित रख सकता है ।

-रमेश चौहान

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आयुर्वेद सेहत आलेख रत्‍न

दीर्घायु जीवन का रहस्य

इस जगत ऐसा कौन नहीं होगा जो लंबी आयु, सुखी जीवन न चाहता हो । प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह सुखी रहे, जीवन आनंद से व्यतित हो और वह पूर्ण आयु को निरोगी रहते हुये व्यतित करे । मृत्यु तो अटल सत्य है किंतु असमायिक मृत्यु को टालना चाहिये क्योंकि अथर्ववेद में कहा गया है-‘‘मा पुरा जरसो मृथा’ अर्थात बुढ़ापा के पहले मत मरो ।

बुढ़ापा कब आता है ?

  • वैज्ञानिक शोधों द्वारा यह ज्ञात किया गया है कि जब तक शरीर में सेल (कोशिकाओं) का पुनर्निमाण ठीक-ठाक होता रहेगा तब तक शरीर युवावस्था युक्त, कांतियुक्त बना रहेगा । यदि इन सेलों का पुनर्निमाण किन्ही कारणों से अवरूध हो जाता है तो समय के पूर्व शरीर में वृद्धावस्था का लक्षण प्रकट होने लगता है ।

मनुष्य की आयु कितनी है? 

  • वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय शोधों के अनुसार वर्तमान में मनुष्य की औसत जीवन प्रत्याशा 60 से 70 वर्ष के मध्य है । इस जीवन प्रत्यशा को बढ़ाने चिकित्सकीय प्रयोग निरंतर जारी है ।
  • किन्तु श्रृति कहती है-‘शतायुवै पुरूषः’ अर्थात मनुष्यों की आयु सौ वर्ष निर्धारित है । यह सौ वर्ष बाल, युवा वृद्ध के क्रम में पूर्ण होता है । 

क्या कोई मरना चाहता है ?

  • महाभारत में विदुर जी कहते हैं- ‘अहो महीयसी जन्तोर्जीविताषा बलीयसी’ अर्थात हे राजन जीवन जीने की लालसा अधिक बलवती होती है । 
  • आचार्य कौटिल्य कहते हैं- ‘देही देहं त्यकत्वा ऐन्द्रपदमपि न वांछति’ अर्थात इन्द्र पद की प्राप्ति होने पर भी मनुष्य देह का त्याग करना नहीं चाहता ।
  • आज के समय में भी हम में से कोई मरना नहीं चाहता, जीने का हर जतन करना चाहता है। वैज्ञानिक अमरत्व प्राप्त करने अभीतक कई असफल प्रयास कर चुके हैं और जीवन को सतत् या दीर्घ बनाने के लिये अभी तक प्रयास कर रहे हैं ।

अकाल मृत्यु क्यों होती है ?

  • यद्यपि मनुष्य का जीवन सौ वर्ष निर्धारित है तथापि सर्वसाधारण का शतायु होना दुर्लभ है । विरले व्यक्ति ही इस अवस्था तक जीवित रह पाते हैं 100 वर्ष के पूर्व अथवा जरा अवस्था के पूर्व मृत्यु को अकाल मृत्यु माना जाता है ।
  • सप्तर्षि में से एक योगवसिष्ठ के अनुसार-

मृत्यों न किचिंच्छक्तस्त्वमेको मारयितु बलात् ।मारणीयस्य कर्माणि तत्कर्तृणीति नेतरत् ।।

  • अर्थात ‘‘हे मृत्यु ! तू स्वयं अपनी शक्ति से किसी मनुष्य को नही मार सकती, मनुष्य किसी दूसरे कारण से नहीं, अपने ही कर्मो से मारा जाता है ।’’ इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि मनुष्य अपनी मृत्यु को अपने कर्मो से स्वयं बुलाता है । जिन साधनों, जिन कर्मो से मनुष्य शतायु हो सकता है उन कारणों के उल्लंघन करके अपने मृत्यु को आमंत्रित करता है ।

दीर्घायु होने का क्या उपाय है ?

  • विज्ञान के अनुसार जब तक शरीर में कोशिकाओं का पुनर्निमाण की प्रक्रिया स्वस्थ रूप से होती रहेगी तब तक शरीर स्वस्थ एवं युवावस्था युक्त रहेगा । 
  • कोशिकाओं की पुनर्निमाण की सतत प्रक्रिया से वृद्धावस्था असमय नहीं होगा । सेल के पुनर्निमाण में विटामिन ई, विटामिन सी, और कोलिन ये तीन तत्वों का योगदान होता है । इसकी पूर्ती करके दीर्घायु बना जा सकता है ।
  • व्यवहारिक रूप से यदि देखा जाये तो एक साधन संपन्न धनवान यदि इसकी पूर्ती भी कर ले तो क्या वह शतायु बन जाता है ? उत्तर है नहीं तो शतायु कैसे हुआ जा सकता है ।
  • श्री पी.डी.खंतवाल कहते हैं कि -‘‘श्रमादि से लोगों की शक्ति का उतना ह्रास नहीं होता, जितना आलस्य और शारीरिक सुखासक्ति से होता है ।’’ यह कथन अनुभवगम्य भी है क्योंकि अपने आसपास वृद्धों को देखें जो जीनका जीवन परिश्रम में व्यतित हुआ है वह अरामपरस्त व्यक्तियों से अधिक स्वस्थ हैं । इससे यह प्रमाणित होता है कि दीर्घायु जीवन जीने के लिये परिश्रम आवश्यक है ।
  • देखने-सुनने में आता है कि वास्तविक साधु-संत जिनका जीवन संयमित है, शतायु होते हैं इससे यह अभिप्रमाणित होता है कि शतायु होने के संयमित जीवन जीना चाहिये ।

धर्मशास्त्र के अनुसार दीर्घायु जीवन-

  • महाभारत के अनुसार- ‘‘आचारश्र्च सतां धर्मः ।’’ अर्थात आचरण ही सज्जनों का धर्म है । यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि धर्म कोई पूजा पद्यति नहीं अपितु आचरण है, किये जाने वाला कर्म है । 
  • ‘धर्मो धारयति अति धर्मः’’ अर्थात जो धारण करने योग्य है वही धर्म है । धारण करने योग्य सत्य, दया साहचर्य जैसे गुण हैं एवं धारण करने का अर्थ इन गुणों को अपने कर्मो में परणित करना है ।
  • महाराज मनु के अनुसार- ‘‘आचाराल्लभते ह्यायुः ।’’ अर्थात आचार से दीर्घ आयु प्राप्त होती है ।
  • आचार्य कौटिल्य के अनुसार- ‘‘मृत्युरपि धर्मष्ठिं रक्षति ।’’ अर्थात मृत्यु भी धर्मपरायण लोगों की रक्षा करती है ।
  • ऋग्वेद के अनुसार- ‘न देवानामतिव्रतं शतात्मा च न जीवति ।’’ अर्थात देवताओं के नियमों को तोड़ कर कोई व्यक्ति शतायु नहीं हो सकता । यहाँ देवताओं के नियम को सृष्टि का, प्रकृति का नियम भी कह सकते हैं । 
  • समान्य बोलचाल में पर्यावरणीय संतुलन का नियम ही देवाताओं का नियम है, यही किये जाना वाला कर्म है जो आचरण बन कर धर्म का रूप धारण कर लेता है । अर्थात प्रकृति के अनुकूल आचार-व्यवहार करके दीर्घायु जीवन प्राप्त किया जा सकता है ।

जीवन की सार्थकता-

  • एक अंग्रेज विचारक के अनुसार- ‘‘उसी व्यक्ति को पूर्ण रूप से जीवित माना जा सकता है, जो सद्विचार, सद्भावना और सत्कर्म से युक्त हो ।’’
  • चलते फिरते शव का कोई महत्व नहीं होता थोडे़ समय में अधिक कार्य करने वाला मनुष्य अपने जीवनकाल को बढ़ा लेता है । आदि शांकराचार्य, स्वामी विवेकानंद जैसे कई महापुरूष अल्प समय में ही बड़ा कार्य करके कम आयु में शरीर त्यागने के बाद भी अमर हैं ।
  • मनुष्यों की वास्तविक आयु उनके कर्मो से मापी जाती है । धर्म-कर्म करने से मनुष्य की आयु निश्चित रूप से बढ़ती है ।

‘‘धर्मो रक्षति रक्षितः’’ यदि धर्म की रक्षा की जाये अर्थात धर्म का पालन किया जाये तो वही धर्म हमारी रक्षा करता है । यही जीवन का गुण रहस्य है । यही दीर्घायु का महामंत्र है ।

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आलेख रत्‍न ज्‍योतिष

क्‍या आप ज्‍योतिषशास्‍त्र पर विश्‍वास करते हैं ?

परिचय

भारतीय संस्‍कृति को वैदिक संस्‍कृति भी कहते हैं क्‍योंकि प्राय: हर बातों का संबंध किसी न किसी रूप में वेदों से जुड़ा होता है । यही कारण है कि कुछ विद्वान यह मानते हैं कि विश्‍व में जो भी ज्ञान है या भविष्‍य में जो भी ज्ञान होने वाला वह सभी ज्ञान वेदों पर ही अवलंबित है अवलंबित रहेंगे । ज्‍योतिष को भी वेदों का ही अंग माना गया है ।

वेदों के अँग- वेदों के 6 प्रमुख अंग माने गये हैं । ये हैं- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त,ज्योतिष और छन्द । ज्‍योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है । नेत्र का कार्य देखना होता है इस लिये ज्‍योतिष का कार्य भविष्‍य को देखना है  ।

ज्‍योतिष क्‍या है ?

ज्‍योतिष का शाब्दिक अर्थ ज्‍योति या प्रकाश करने वाला होता है । वेदो के अनुसार- ”ज्‍योतिषां सूर्यादि ग्रहाणं बोधकं शास्‍त्रम्” अर्थात ज्‍योतिष सूर्य आदि ग्रहों का बोध कराने वाला शास्‍त्र है । वर्तमान भारतीय ज्‍योतिषाचार्यो के अनुसार -‘ज्‍योतिष  ग्रह आदि (राशि, नक्षत्र) और समय का ज्ञान कराने वाला वह विज्ञान है, जो जीवन-मरण के रहस्‍यों और सुख-दुख के संबंध को एक ज्‍योति अर्थात ज्ञान के रूप में प्रस्‍तुत करता है । वास्‍तव ज्‍योतिष गणित विज्ञान का अँग है जो समय और अक्षांश-देशांश के जटिल काल गणानों से प्राप्‍त हाने वाली एक सारणी है जिस सारणी का अर्थ करना फलादेश कहलाता है ।

क्‍या ज्‍योतिष पर विश्‍वास करना चाहिये ?

‘दूर के ढोल सुहाने’ और घर की मुर्गी दाल बराबर’  ये दो कथन हमारे भारतीय समाज में सहज में ही सुनने को मिल जाते हैं । यह अनुभवगम्‍य भी लगता है नई पीढ़ी को  वैचारिक स्‍वतंत्रता के नाम पर विदेशी संस्‍कृती ‘दूर के ढोल सुहाने’ जैसे रूचिकर लगते हैं और भारतीय संस्‍कृति ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ लगती है । इस संदर्भ में ऐसे वैचारिक लोगों को अपने आप से एक प्रश्‍न पूछना चाहिये कि Western astrology प्रचलन में क्‍यो है ? Western astrology भी ग्रहों की गणना पर आधरित है जो गणना से अधिक फलादेश कहने पर विश्‍वास करती है । आप पर कोई दबाव नहीं है कि आप ज्‍योतिष पर विश्‍वास करें । हॉं इतना आग्रह जरूर है कि जो ज्‍योतिष पर विश्‍वास करते हैं उनकी आप अवहेलना भी न करें ।

पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष एवं वैदिक ज्‍योतिष में अंतर-

दोनों में पहला अंतर तो समय का ही है । जहॉं वैदिक ज्‍योतिष वैदिक कालिन है वहीं पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष को ग्रीस के बौद्धिक विकास से जोड़ कर देखा जाता है ।  दूसरा प्रमुख अंतर इनके दृष्टिकोण का है जहॉं पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष व्‍यक्ति के व्‍यक्तित्‍व एवं मनोविज्ञान पर जोर देता है वहीं वैदिक ज्‍योतिष जीवन-मृत्‍यु दोनों का सर्वांग चित्रण करता है । पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष सायन सिद्धांत पर आधारित सूर्य प्रधान है जबकि वैदिक  ज्‍योतिष निरयन सिद्धांत पर आधारित नवग्रह, 12 राशि और 27 नक्षत्रों पर विचार करती है । 

वैदिक ज्‍योतिष का महत्‍व-

पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष केवल संभावित घटनाओं का प्रत्‍यक्ष चित्रण करने में विश्‍वास करती हैं वही वैदिक ज्‍योतिष  जीवन और जीवन के बाद मृत्‍यु के बारे में सटिक व्‍याख्‍या करने पर जोर देती है । वैदिक ज्‍योतिष में दशा प्रणाली अंतरदशा, महादशा आदि को अपने आप सम्मिलित करती है जो सटिक भविष्‍यवाणी करने में मदद करती है । वेदिक ज्‍योतिष भविष्‍य के उजले पक्ष के साथ-साथ स्‍याह पक्ष को भी उजागर करती है । सबसे बड़ी विशेषता वैदिक ज्‍योतिष समस्‍या को  बतलाने के साथ-साथ उस समस्‍या से निपटने का उपाय भी सुझाती है ।

ज्‍योतिष पर प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह क्‍यों ?

किसी भी बात पर प्रश्‍न तभी उठााया जाता है जब वह उसके अनुकूल न हो ।  लेकिन ज्‍योतिष के संदर्भ अधिकांश प्रश्‍न ज्‍योतिष के मूल्‍यांकन किये बिना ही उठा दिया जाता है कि यह अंधविश्‍वास है । अंधविश्‍वास वही न होगा जिसका बिना परीक्षण के उस पर विश्‍वास कर लिया जाये । इसी संदर्भ में यह भी तो कहा जाता है जो इसे ज्‍योतिष को अंधविश्‍वास कह रहे हैं वह स्‍वयं तो अंधविश्‍वासी नहीं है किसी न कहा ज्‍योतिष अंधविश्‍वास है और वह बिना परिक्षण किये उसके राग में अपना राग मिला दिये । पहले परीक्षण किया जाना चाहिये फिर परिणाम कहा जाना चाहिये । ज्‍योतिष विज्ञान है या अंध विश्‍वास आपके परीक्षण पर निर्भर करता है ।

दूसरी बात जैसे किसी व्‍यक्ति से कहा जाये इस विज्ञान के युग में आप आक्‍सीजन और हाइड्रोजन से पानी बनाकर दिखाओं तो हर कोई पानी बनाकर नहीं दिखा सकता । यदि कोई इससे पानी नहीं बनापाया तो क्‍या विज्ञान झूठा हो गया । जिसप्रकार एक कुशल विज्ञानी ही प्रयोगशाला में आक्‍सीजन और हाइड्रोजन के योग से पानी बना सकता है ठीक उसी प्रकार केवल और केवल एक कुशल ज्‍योतिषाचार्य ही ज्‍योतिष ज्ञान के फलादेश ठीक-ठाक कह सकता है ।

-रमेश चौहान

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आलेख रत्‍न धर्म-कर्म-अध्‍यात्‍म

प्रथम पूज्‍य गणपति-मंगलमूर्ति गणराज

भारत का बच्‍चा-बच्‍चा जानता है कि भगवान गणेश प्रथम पूज्‍य है । चाहे वह गृहस्‍थी हो, चाहे वह सन्‍यासी हो, चाहे वह शैव हो, चाहे वह वैष्‍णव हो सभी व्‍यक्तियों, संप्रदायों के द्वारा गणेशजी की प्रथम पूजा की जाती है । चाहे घर का कोई मांगलिक, धार्मिक अनुष्‍ठान हो, चाहे व्‍यपार का प्रारंभ करना हो चाहे अन्‍य कामों का प्रारंभ करना हो हर काम, हर आयोजन के प्रारंभ गणेश जी के पूजन से ही करते हैं यही कारण है कि हमारे समाज में किसी कार्य को प्रारंभ करने के लिये ‘श्रीगणेश करें’  कहा जाता है । इस प्रकार कोई पूजा-पाठ का आयोजन हो या न हो किन्‍तु गणेशजी का नाम हर कार्य के पहले लिया ही जाता है ।

गणेशजी का वैदिक महत्‍व-

हमारे वेद-पुराणों में  गणेशजी की पूजा-अराधना को सबसे पहले ही नहीं सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍वीकार किया गया है । इन्‍ पावन ग्रंथों के अनुसार महागणपति गणराज को कारणब्रह्म अर्थात सृष्टि के सभी प्रकार के कार्यो एवं रचनाओं का कारण और कार्यब्रह्म अर्थात सृष्टि के सभी प्रकार कार्यो एवं रचनाओं को करनेवाल स्‍वीकार किया गया है । इस गणेशजी को ही उत्‍पत्‍ती, स्थिाति और प्रलय का कारण और करण के रूप माना गया है । शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव () कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है।

गणेशजी का जन्‍म की कथा-

श्रीगणेशजी अजन्‍मा है । गणेशजी मॉं के गर्भ से जन्‍म नहीं लिया है । भगवान गणेश के जन्‍म के संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार भी भगवान गणेश का जन्‍म नहीं हुआ है अपितु माता पार्वती ने गणेशजी की देह की रचना अपने शरीर के हरिद्रलेप से की हैं । इस कथा के अनुसार एकबार माता पार्वती स्‍नान करते समय  शरीर में चंदन-हल्‍दी  आदि का उबटन लगाई हुई थी । इसी समय अपने पहरेदारी की कामना से एक मानवाकृति की रचना कर उसे अपने आद्य शक्ति से प्राणवान कर दिये । गणेश जी जो पहले गजमुख नहीं थे, को अपने पहरेदारी का दायित्‍व दिया । बालक गणेश अपने मॉं के के पहरेदारी में द्वार के बाहर खड़े हो गये । उनकी परीक्षा लेने सभी देवता आकर अंदर जाने की चेष्‍टा करने लगे किन्‍तु बालगणेश सभी को पराजीत करते चले गये । अंत में भगवान भोलेनाथ आये उन्‍हें भी बालगणेण द्वार ही रूकने कहा किन्‍तु भोलेनाथ ने कहा यह घर मेरा है मुझे अंदर जाने दो । बालगणेश के नहीं मानने पर भोलेनाथ उनका सिर धड़ से अलग कर दिया । इस माता बहुत ही रूष्‍ट हुई, उनके क्रोध से बचने के लिये इस बालक पुनर्जीवित किया गया इसके उसके धड़ पर हाथी का सिर जोड़ दिया गया । तब गणेश गजानन कहलाने लगे । इस घटना के विद्वानों ने बालक गणेश की रचना पर माता-पिता दोनों की सहयोग से जोड़कर देखते हैं, इस घटना के पहले वह बालक केवल माता की रचना थी, भगवान भोलेनाथ द्वारा उस बालक के धड़ में सिर जोड़ जाने से वह पिता की भी रचना हो गया । इस प्रकार गणेशजी के माता पार्वती एवं पिता भगवान भोलेनाथ को स्‍वीकार किया गया । यह घटना भादो मास के शुक्‍ल चतुर्थी को हुआ था । इस कारण इसी दिन भादो मास के शुक्‍ल चतुर्थी को गणेशजयंती  के रूप में जाना जाता है ।

गणेशजी के प्रथम पूज्‍य होने की कथा-

  • त्रिदेव ब्रह्मा,विष्‍णु और महेश ने देवों में सबसे पहले किसकी पूजा की जाये यह तय करने के लिये देवताओं के मध्‍य एक स्‍वस्‍थ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । प्रतियोगिता का शर्त था कि जो देवता पृथ्‍वी के सात प्रदक्षिणा करके वापस आयेगा वही प्रथम पूज्‍य होंगे । सभी देवताओं ने अपने-अपने वाहनों से पृथ्‍वी प्र‍दक्षिण प्रारंभ कर दी किन्‍तु गणेशजी अपने मूषक वाहन में बैठकर अपने माता-पिता भगवान भोले नाथ एवं माता गौरी के प्रदक्षिणा प्रारंभ कर दी । उनसे ऐसा करने का कारण पूछने पर उसने बताया कि माता स्‍वयं धरती की प्रतीक होती हैं और पिता आकाश का प्रतीक होता है । इस प्रकार मैनें धरती और आकश का सात प्रदक्षिण पूरा कर ली है । उनके इस तर्क से त्रिदेव बहुत प्रसन्‍न हुये और गणेशजी को बुद्धि का देवता स्‍वीकार अग्र पूजा के अधिकारी नियुक्‍त किये तब से गणेशजी की सबसे पहले पूजा की जाती है ।

गणेशजी को प्रथम पूज्‍य मानकर सभी कार्यो के प्रारंभ में गणेशजी की पूजा की जाती है । गणेशजी को बुद्धि के देवता के रूप स्‍वीकार किया जाता है । गणेशजी को विघ्‍नविनाशक के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ हर बाधाओं और कष्‍टों से रक्षा करने वाला होता है । गणेशजी की पत्‍नी रिद्धी और सिद्धी हैं जो धन-धान्‍य और यश-कीर्ति की प्रतीक हैं । इस प्रकार गणेशजी की अराधना से ही रिद्धी-सिद्धी प्राप्‍त किये जा सकते हैं । शुभ और लाभ गणेशजी के पुत्र हैं जो सफलता एवं प्रगति के परिचायक हैं । इसप्रकार मानवजीवन के भौतिक जीवन एवं अध्‍यात्मिक दोनों जीवन के लिये गणेशजी का अराधना सुख-शांति, सफलता-प्रगति, धन-धान्‍य, यश-कीर्ति और मुक्ति का साधन है ।

पूजन पद्यति स्‍वयं में वृहद और जटिल भी होता है किन्‍तु यथाशक्ति पूजन करने का विधान बनाया गया है । इसलिये अपने शारीरिक और आर्थिक शक्ति-सामर्थ्‍य के अनुसार भगवान की पूजा जाती है । इसके संक्षेप में दो विधियां प्रचलित है-

  1. पंचोपचार पूजन- इस पूजन पॉंच प्रकार के पूजन सामाग्री से भगवान की पूजा की जाती है । इसके लिये पहले चंदन, गंध, कुंकुम, हल्‍दी आदि मे से कोई एक या सभी, दूसरा पुष्‍प-पल्‍लव भेट करना, तीसरा धूप देना, चौथा दीप और पॉंचवा नैवेद्य चढ़ाना होता है ।
  2. षोडशोपचार पूजन – इस पूजन पद्यति में सोलह प्रकार से भगवान की पूजा की जाती है । इसका क्रमा इसप्रकार है- 1.आव्‍हान करना 2.आसन देना 3. पाद्य देना 4.अर्घ देना 5;आचवन करना 6. स्‍नान कराना 7.वस्‍त्र चढ़ाना 8. उपवस्‍त्र और यज्ञोपवित 9.चंदन, गंध, कुंकुम, हल्‍दी आदि मे से कोई एक या सभी 10.पुष्‍प-पल्‍लव भेट करना 11..धूप देन. 12..दीप 13.नैवेद्य चढ़ाना 14.ध्‍यान-प्रणाम 15. आरती-परिक्रमा और 16. पुष्‍पांजली-क्षमाप्रार्थना ।

गणेश जी मंत्राष्‍टक (आठ मंत्र)-

  1. गणेशजी का बीज मंत्र -”गं”
  2. कामनापूर्ति मंत्र- ‘ॐ गं गणपतये नमः’
  3. षडाक्षर मंत्र -”ॐ वक्रतुंडाय हुम”
  4. उच्छिष्‍ट मंत्र- ”ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वा”
  5. विघ्‍ननिवारण मंत्र-”गं क्षिप्रप्रसादनाय नम”
  6. हेरम्‍ब गणपति मंत्र – ‘ॐ गं नमः’
  7. लक्ष्‍मीविनायक मंत्र- ”ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा”
  8. त्रैलोक्‍य मोहन गणेश मंत्र -”ॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।’