Posted in छंद, साहित्‍य रत्‍न

शिक्षक दिवस पर कुछ दोहे

दोहे-

Photo by Pexels.com
लगते अब गुरूपूर्णिमा, बिते दिनों की बात ।
मना रहे शिक्षक दिवस, फैशन किये जमात ।

शिक्षक से जब राष्ट्रपति, हुये व्यक्ति जब देश।
तब से यह शिक्षक दिवस, मना रहा है देश ।

कैसे यह शिक्षक दिवस, यह नेताओं का खेल ।
किस शिक्षक के नाम पर, शिक्षक दिवस सुमेल ।।

शिक्षक अब ना गुरू यहां, वह तो चाकर मात्र ।
उदर पूर्ति के फेर वह, पढ़ा रहा है छात्र ।

‘बाल देवो भव‘ है लिखा, विद्यालय के द्वार ।
शिक्षक नूतन नीति के, होने लगे शिकार ।

शिक्षक छात्र न डाटिये, छात्र डाटना पाप ।
सुविधाभोगी छात्र हैं, सुविधादाता आप ।।

कौन उठाये अब यहां, कागजात के भार ।
शिक्षक करे पुकार है, कैसे हो उद्धार ।।

हुये एक शिक्षक यहां, देश के प्रेसिडेंट ।
मना रहे शिक्षक दिवस, तब से यहां स्टुडेंट ।।

सारे शिक्षक साथ में, करें व्यवस्था देख ।
आज मनाने टीचर्स डे, नेता आये एक ।।

क्षिक्षा एक व्यपार है, शिक्षक कहां सुपात्र ।
प्रायवेट के नाम पर, शिक्षक नौकर मात्र ।।
-रमेश चौहान
Posted in गज़ल, साहित्‍य रत्‍न

गज़ल के मूलभूत परिभाषिक शब्‍द उदाहरण सहित (fundamental of gazal)

गजल से परिचय-

गजल लिखना सीखें

चाहे आप हिन्‍दी साहित्‍य की बात करें, चाहे उर्दू साहित्‍य की बात करें या फिल्‍मी गानों की या फिर कवि सम्‍मेलनों की ये सारे के सारे क्षेत्र गजल के बिना अधूरे ही लगते हैं । हालाकि गज़ल उर्दू साहित्‍य से प्रवाहित हुई धारा है किन्‍तु गंगा-जुमनी तहजिब के इस देश में हिन्‍दी साहित्‍य में आ मिली है ।  गंगा-यमुना के पावन संगम तट की भांति उर्दू साहित्‍य एवं हिन्‍दी साहित्‍य का संगम तट यह गज़ल ही है, जो केवल दो साहित्‍यों को ही परस्‍पर नहीं जोड़ती अपितु दो संस्‍कृति को आपस में जोड़ती हैं और अनेकता में एकता के नारे को बुलंद करती हैं । शब्‍द चाहे उर्दू के हों या हिन्‍दी के किन्‍तु हिन्‍दी देवनागरी लिपि में गजलों का प्रचलन हिन्‍दी साहित्‍य विकास के समान्‍तर चला आ रहा है । इस महत्‍वपूर्ण साहित्यिक विधा गजल के बारिकियों को जानने का प्रयास करतें हैा, गजल के छंद शिल्‍प, गज़ल रचना विधि को जानने का प्रयास करते हैं ।

गज़ल के कुछ परिभाषिक शब्‍द-

ग़ज़ल-

ग़ज़ल शेरों का एक ऐसा समूह है जिसके प्रत्‍येक शेर समान रदीफ (समांत), समान का़फिया (तुकांत) और समान वज्‍न (मात्राक्रम) मतलब बहर (स्‍केल) में होते हैं । गैरमुरद्दफ ग़ज़ल में रदीफ नहीं होता किन्‍तु बहर होना अनिवार्य है ।

शाईरी-

गजल लिखने के लिये अपने विचारों को गजल के पैमाने में पिरानो अर्थात ग़ज़ल लिखने की प्रक्रिया को शाईरी कहते हैं ।

शाइर या शायर-

गजल लिखने वाले को शइर या शायर कहते हैं ।

शेअर या शेर-

समान रदीफ (समांत), समान का़फिया (तुकांत) और समान वज्‍न (मात्राक्रम) मतलब बहर (स्‍केल) में लिखे दो पंक्ति को शेअर कहते हैं ।

उदाहरण-

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए 
  इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
          
मेरे  सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
    हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

मिसरा-

शेअर जो दो पंक्त्यिों का होता है, उसके प्रत्‍येक पंक्ति को मिसरा कहते हैं ।

मिसरा-ए-उला-

शेअर की पहली पंक्ति को मिसरा-ए-उला कहते हैं ।

मिसरा-ए-सानी-

शेअर की दूसरी पंक्ति को मिसरा-ए-सानी कहते हैं ।

जैसे-

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए  (पहली पंक्ति-मिसरा-उला)
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए (दूसरी पंक्ति-मिसरा-ए-सानी)
          
मेरे  सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही  (पहली पंक्ति-मिसरा-ए-उला)
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए (दूसरी पंक्ति-मिसरा-ए-सानी)

मतला-

ग़ज़ल के पहले शेर जिसके दोनों मिसरे में रदीफ और काफिया हो उसे मतला कहते हैं ।

जैसे-

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए  (रदीफ-चाहिये, काफिया- अलनी)
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए  (रदीफ-चाहिये, काफिया- अलनी)

मक्‍ता-

गजल के आखरी शेर को मक्‍ता कहते हैं, इस शेर में प्राय: शायर का नाम आता है ।

जैसे-

मैंने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है

गजल के प्रकार- गजल दो प्रकार के होते है-

  1. मुरद्दफ ग़ज़ल-जिसके शे़रों में रदीफ होता है ।
  2. गैर मुरद्दफ ग़ज़ल-जिसके शे़रों में रदीफ नहीं होता ।

रदीफ-

रदीफ एक समांत शब्‍द होता है जो मतला (गजल के पहले शेर की दोनों पंक्ति) और सभी शेर के मिसरा-ए-सानी मतलब शेर की दूसरी पंक्ति में आता है ।

रदीफ का उदाहरण-

इस गजल मतला पर दूसरे शेर के मिसरा-ए-सानी पर चाहिये समांत शब्‍द है –

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए        
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए 
          
मेरे  सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही        
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

काफिया-

रदीफ के ठीक पहले आने वाले समतुकांत शब्‍द को काफिया कहते हैं ।

काफिया का उदाहरण-

इसी उदाहरण में चाहिये रदीफ के पहले ‘अलनी’ समतुकांत शब्‍द आया है-

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए        
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए 
          
मेरे  सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही        
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए 

वज्‍़न-

किसी शब्‍द के मात्रा भार या मात्रा क्रम को वज्‍़न कहते हैं ।

वज्‍़न का नाम और उदाहरण-

वज्‍़न का नाममात्रा भारउदाहरण शब्‍द
फअल12असर, समर, नज़र ऩबी, यहॉं आदि
 फैलुन22राजन, राजा, बाजा, इसको आदि
फाअ21राम, राज, आदि
वज्‍़न -उदाहरण सहित

वज्‍़न तय करना-

शब्‍दों को बालेने में जो समय लगता है उस आधार पर शब्‍दों का वज्‍़न तय किया जाता है । इसके लिये प्रत्‍येक अक्षर का दो भार दिया गया है एक लाम दूसरा गाफ ।

लाम-

जिन अक्षरों के उच्‍चारण में कम समय लगता है लाम कहते हैं । यह हिन्‍दी के लघु मात्रा ही है और इसी समान इसका वर्ण भार 1 होता है ।

हिन्‍दी वर्ण माला के अ, इ, उ स्‍वर और इनसे बने व्‍यंजन एक मात्रिक मतलब लाम होते हैं ।

जैसे- अ -1, इ-1, उ-1, क-1, कि-1, कु-1 इसी प्रकार आगे......
चँन्‍द्र बिन्‍दु युक्‍त व्‍यंजन भी लाम होते हैं जैसे कँ-1, खँ-1 आदि

गाफ-

जिन वर्णे के उच्‍चारण में लाम से ज्‍यादा समय लगता उसे गाफ कहते हैं या हिन्‍दी का दीर्घ मात्रिक ही है जिसका भार 2 होता है ।

हिन्‍दी वर्णमाला के आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं स्‍वर और स्‍वरों से बनने वाले व्‍यंजन गाफ होते है ।

जैसे- आ-2, ई-2, ऊ-2, ए-2 आदि
का-2, की-2 कू-2 के-2  आदि
 
इसके अतिरिक्‍त जिन दो लाम या लघु वर्णो का उच्‍चारण एक साथ होता है उसे शाश्‍वत गुरू या गाफ कहते हैं । यही उर्दू साहित्‍य में हिन्‍दी साहित्‍य के मात्रा गणना के भिन्‍न नियम है ।
 
जैसे- घर, जल,  शब्‍द हिन्‍दी 1,1 है जबकि उर्दू साहित्‍य में यह 2 है क्‍योंकि इसका उच्‍चारण एक साथ हो रहा है ।
 
'अजर' शब्‍द हिन्‍दी में 111 है जबकी उर्दू साहित्‍य में अजर- अ-1 और जर-2 है ।

रूकन-

जिस प्रकार हिन्‍दी छंद शास्‍त्र में ‘यमाताराजभानसलगा’ गण लघु गुरू का क्रम होता है उसी प्रकार उर्दू साहित्‍य में लाम और गाफ के समूह रूकन और बहुवचन इसे अरकान कहते हैं ।

रूकन के भेद-

  1. सालिम रूकन
  2. मुजाहिफ रूकन

सालिम रूकन –

उर्दू साहित्‍य में मूल रूकन को सालिम रूकन कहते हैं इनकी संख्‍या 7 होती है ।  ये इस प्रकार है-

क्रमांकरूकन काप्रकाररूकन का नाममात्रा भारउदाहरण शब्‍द/वाक्‍यांश
1.फईलुनमुतकारिब122हमारा
2.फाइलुनमुतदारिक212रामजी
3.मुफाईलुनहज़ज1222 चलो यारा
4.फाइलातुनरम़ल2122रामसीता
5.मुस्‍तफ्यलुनरज़ज2212आओ सभी
6.मुतफाइलुनकामिल11212घर में नहीं
7.मुफाइलतुनवाफिर12112कबीर कहे
रूकन उदाहरण सहित

मुजाहिफ रूकन-

सालिम रूकन या मूल रूकन  की मात्रा को कम करने से रूकन बनता है ।

जैसे-
सालिम रूकन-मुफाईलुन- 1222 के तीसरी मात्रा 2 को घटा कर 1 करने पर मुफाइलुन 1212 बनता है ।
इसी प्रकार- मुस्‍तफ्यलुन- 2212 रूकन से मफाइलुन 1212, फाइलुन 212, मफऊलुन 222 बनाया जाता है ।

अरकान-

रूकन के समूह को अरकान कहते हैं, इससे ही बहर का निर्माण होता है ।

जैसे- फाइलातुन मूल रूकन की पुनरावृत्ति करने पर
फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलातुन/

बहर-

जिस लय पर गज़ल कही जाती है या जिस अरकान पर गज़ल लिखी जाती है उसे बहर कहते हैं ।

जैसे- बहर-ए-रमल में रमल मजलब फाइलातुन की चार बार आवृती होती है-
फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलातुन/फाइलातुन/

तक्‍तीअ करना-

शेर में बहर को परखने के लिये जो मात्रा गणाना किया जाता है उसे तक्‍तीअ करना कहते हैं । यह वास्‍तव में किसी शब्‍द में लाम और गाफ का क्रम लिखना होता है जिससे निश्चित रूप से कोई न कोई रूकन फिर अरकान से बहर बनता है ।

जैसे - 
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए        
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

हो गई है/ पीर पर्वत/ सी पिघलनी / चाहिए 
2122/    2122/     2122/     212
फाइलातुल/ फाइलातुन/ फाइलातुन/ फाइलुन

मात्रा गिराना-

गज़ल के बहर के अनुसार किसी गाफ मतलब दीर्घ मात्रा को घटाकर लाम मतलब लघु जैसे बोला जाये, जो लिखा दीर्घ है किन्‍तु उसका उच्‍चारण लघु जैसा हो तो तक्‍ती करते समय उस दीर्घ को लघु लिखा जाता है माना जाता है । 

जैसे- कोई जिसका वज्‍़न फैलुन 22 है को फअल वज्‍़न से कुई 12 या फालु वज्‍़न से कोइ 21 पढ़ा जा सकता है ।
 
जैसे - 
इस हिमालय/ से कोई गं/गा निकलनी/ चाहिए
2122/    2122/     2122/     212
फाइलातुल/ फाइलातुन/ फाइलातुन/ फाइलुन
यहाँ दूसरे रूकन में 'से काेई गं' को 'से कुई गं' पढ़े जाने पर इसका रूकन 2122 हुआ ।
-रमेश चौहान
Posted in छंद, साहित्‍य रत्‍न

मतगयंद सवैया-“सुंदर से अति सुंदर श्यामा”

मतगयंद सवैया-

भारतीय छंद विधा में सवैया का अपना विशेष महत्व होता है । अनेक कवियों ने सवैया में अपनी रचनाएं किये हैं । इसमें दो प्रसिद्ध रचनाओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहूंगा । एक नरोतम दास की प्रसिद्ध रचना सुदामा चरित-

शीश पगा न झगा तन में प्रभु जाने को आहि बसे केहि ग्रामा

दूसरा बाबा तुलसीदास के हनुमान अष्टक-

को नहीं जानत है जग में प्रभु संकट मोचन नाम तिहारो

यह दोनों ही उदाहरण मतगयंद सवैया से हैं । मतगयंद सवैया में चार पद होते हैं, प्रत्येक पद में सात भगन (गुरु लघु लघु-211) के बाद दो गुरु आता है और चारों पद के अंत में समतुकांत होता है।

इसी मतगयंद सवैया पर मैंने भी प्रयास किया है । अपने इस प्रयास को आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए आपके सुझावों की कामना करता हूं-

सुंदर से अति सुंदर श्यामा (मत्तगयंद सवैया)

सुंदर केशव की छबि सुंदर, सुंदर केश किरीटहि सुंदर
सुंदर कर्णहि कुण्डल सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।
सुंदर मस्तक चंदन सुंदर, सुंदर घ्राण कपोलहि सुंदर ।
सुंदर लोचन भौं अति सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर मोहन का मुख सुंदर, सुंदर ओष्ठ हँसी अति सुंदर
सुंदर भाषण बोलिय सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।
सुंदर गर्दन सुंदर भूषण, सुंदर है पट अम्बर सुंदर ।
सुंदर है उर बाहुहि सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर माधव का पग सुंदर, सुंदर है चलना गति सुंदर ।
सुंदर ठाड़ भये अति सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर है मुरली मुख सुंदर, सुंदर नृत्यहि प्रीतहि सुंदर ।
सुंदर संगत रंगत सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर गोकुल ब्रज सुंदर, सुंदर है यमुना जल सुंदर ।
सुंदर गोप सखा सखि सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर हैं गउवें रज सुंदर, सुंदर पालन धावन सुंदर ।
सुंदर खेलहि मेलहि सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर कृष्णहि सृष्टिहि सुंदर, सुंदर लालन पालन सुंदर ।
सुंदर मारन धावन सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
सुंदर कृष्ण दयानिधि सुंदर, सुंदर कारज मारग सुंदर ।
सुंदर है चरित्र तन सुंदर, सुंदर से अति सुंदर श्यामा ।।
-रमेश चौहान
Posted in आयुर्वेद सेहत, आलेख रत्‍न

सब रोगों का मूल है कब्‍ज

कब्‍ज क्‍या है –

अधिकांश लोगों से हम प्राय: सुनते हैं कि आज मेरा पेट साफ नहीं हुआ । मल का साफ न होना ही कब्जियत है ।  कब्जियत से अधिकांश लोग परेशान है । कब्‍ज सभी रोगों का मूल है । कहा गया है- ‘सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मला:’ अर्थात सभी रोगों का कारण मल का कुपित होना ही है ।

कब्ज होने का कारण –

कब्‍ज होने का प्रमुख कारण अनियमित खान-पान एवं अनियमित रहन-सहन दिनचर्या है, इसके अतिरिक्‍त इसके कारण इसप्रकार हैं-

  1. शौच के वेग को रोकना ।
  2. पानी कम पीना ।
  3. समय पर भोजन न करना ।
  4. अच्‍छे से चबा कर भोजन न करना ।
  5. जल्द-जल्‍दी भोजन करना ।
  6. भूख से अधिक भोजन करना ।
  7. गरिष्‍ठ भोजन करना ।
  8. नींद की कमी होना ।
  9. मानसिक चिंता बना रहना ।

निदान

कहा जाता है कि –‘कारण ही निवारण’ है अर्थात जो जिस कारण से उत्‍पन्‍न हो, उस कारण को ही समाप्‍त कर दिया जाये तो उस समस्‍या का निदान अपने आप हो जाता है । इसलिये कब्‍ज से बचने के लिये सबसे पहले ये उपाय करना चाहिये-

  • अपनी दिनचर्या व्‍यवस्थित करें ।
  • नियत समय पर भोजन करें ।
  • शौच के वेग को कभी न रोकें ।
  • प्रतिदिन कम से कम आठ गिलास अर्थात 2 लिटर पानी अवश्‍य पीयें ।
  • भोजन अच्छे से चबा कर करें एवं भोजन करते समय पानी न पीयें ।
  • गरीष्‍ठ भोजन न करें ।
  • नींद अच्‍छे से लें ।
  • प्रयास करें मानसिक चिंता न हो ।

घरेलू उपचार-

  • कब्‍ज दूर करने का सर्वोत्‍तम उपाय बेल का सेवन है । मौसम अनुकूल यदि पका हुआ बेल उपलब्‍ध हो तो इसका सेवन कब्‍ज का रामबाण औषधी है । पक्‍के बेल के गुदे का सीधा-सीधा सेवन कर सकते हैं अथवा बेल के शरबत का भी सेवन कर सकते हैं । जिस समय पका बेल नहीं मिलता उस समय बेल का मुरब्‍बा अथवा सूखे बेल का चूर्ण भी अत्‍यंत लाभकारी है ।
  • कब्‍ज दूर करने में भुने हुये चने का सत्‍तू बहुत ही कारगर होता है । इसके लिये चने को पहले अच्‍छे से भुन ले फिर भुने हुये चने का पीसकर आटा बना लें । स्‍वादानुसार काला नमक मिले लें और इसे नित्‍य सुबह-शाम 50 ग्राम के अनुमान से सेवन करें ।
  • कब्‍ज अधिक हो तो हर्रा एवं ईसबगोल का मिश्रण सर्वोत्‍तम है ।  इसके लिये सबसे पहले हर्रे को एरण्‍ड़ के तेल में भुन लें, फिर भुनें हुये हरें का चूर्ण बना लें । इस हर्रे का चूर्ण एवं ईसबगोल की भूसी को बराबर मात्रा में मिला लें ।  इस मिश्रण को प्रतिदिन सोने के पूर्व एक या दो चम्‍मच पानी के साथ लें ।

योगासान से कब्‍ज दूर करना-

योगासान ही तन एवं मन से स्‍वस्‍थ रहने का एक सर्वोत्‍तम साधन है । भिन्‍न-भिन्‍न व्‍याधी के भिन्‍न-भिन्‍न योगासान कहे गये हैं । कब्‍ज को दूर करने के लिये निम्‍न आसन सुझाये गये हैं-

पश्चिमोत्‍तासन- इसके लिये दोनों पॉंवों को लम्‍बा सीधा फैलावें, फिर दोनों हाथों की अंगुलियों से दोनों पैरों के अंगुलियों को खींचकर पकड़ें, अब धीरे-धीरे अपने माथे को अपने घुटने पर लगाने का प्रयास करें । उसी क्रम में विलोम करते हुए वापस आवें ।

वज्रासन- इसके लिये घुटने के बल बैठकर, दोनों पैर के अँगूठे को जोड़ते हुये एडि़यों को फैला ले फिर फैले हुये एडि़यों के मध्‍य अपने नितम्‍भ को रखें ।

उत्‍तानपादासन- इसके लिये सीधे लेटकर शरीर के संपूर्ण स्‍नायु को ढीले कर ले, फिर दोनों पैरों को धीरे-धीरे यथा शक्ति ऊपर उठावें । प्रयास करते हुये भूमि और उठे हुये पैरों के मध्‍य 60 अंश का कोण बनाने का प्रयास करें । फिर उठे हुये पैर को धीरे-धीरे भूमि पर वापस रखें । यह क्रिया तीन-चार बार दोहरावें ।

जानुशिरासन – इसके लिये पहले दायें पैर को सीधा फैलायें फिर बाये पैर को की एड़ी को गुदा और अंडकोष के बीच लगायें, बायें पाद-तल से फैले हुये पैर के रान को दबावें, फिर दोनों हाथ से फैले हुये पैर की अंगुलियों को खींचें और धीरे-धीरे झुककर माथे को घुटने से लगाने का प्रयास करें । फिर इसका विलोम दूसरे पैर से यही क्रिया करें ।

पवनमुक्‍तासन- इसके लिये पहले एक पैर को पसार कर रखें, दूसरे पैर को घुटने से मोड़कर पेट पर लगाकर दोनों हाथों से अच्‍छी प्रकार दबायें । नाक को घुटनों पर लगाने का प्रयास करें । यही क्रिया दूसरे पैर से करें तत्‍पश्‍चात दोनों पैरों से यही क्रिया करें ।

मल साफ तो तन साफ

‘मल साफ तो तन साफ’ यदि कब्‍ज को दूर कर लिया गया तो शरीर निश्चित रूप से स्‍वस्‍थ होगा मन भी स्‍वस्‍थ रहेगा । इसलिये हमें कब्‍ज न हो इसके लिये गंभीर प्रयास करना ही चाहिये ।

Posted in साहित्‍य रत्‍न, हाइकु-तॉंका-चोका

चोका- “जीवन- ढलती शाम दिन का अवसान

चोका

चोका – जपानी कविता करने की हाइकु जाति की काव्य शिल्प विधा है । हिन्दी साहित्य में हाइकु का प्रचलन अब बढ़ रहा है । हाइकु सबसे छोटी कविता कहने का शिल्प है । हाइकु जैसे ही चोका भी होता है अंतर केवल यह है कि हाइकु 5,7,5 क्रम की तीन ही पंक्ति होती है जबकि चोका 5, 7 क्रम में अनंत पंक्तियों में हो सकती है । अंतिम दो पंक्ति में 7, 7 का दुहराव होता है ।

भारतीय दृष्टिकोण से यह एक वार्णिक छंद है । जिसमें 5 वर्ण, 7 वर्ण, फिर 5 वर्ण के बाद 7 वर्ण इसी क्रम में कई पंक्तियां हो सकती है । इसका अंत 7 वर्ण से होता है । अर्थात अंत की दो पंक्तियों में सात-सात वर्ण होते हैं । इस कला पक्ष के साथ भाव के प्रवाह में रची गई कविता चोका कहलाती है ।

जीवन, ढलती शाम दिन का अवसान

ढलती शाम
दिन का अवसान
देती विराम
भागम भाग भरी
दिनचर्या को
आमंत्रण दे रही
चिरशांति को
निःशब्द अव्यक्त
बाहें फैलाय
आंचल में ढक्कने
निंद में लोग
होकर मदहोश
देखे सपने
दिन की घटनाएं
चलचित्र सा
पल पल बदले
रोते हॅसते
कुछ भले व बुरे
कुछ तो होते
वांछित अवांछित
आधे अधूरे
नयनों के सपने
हुई सुबह
फिर भागम भाग
अंधड़ दौड़
जीवन का अस्तित्व
आखिर क्या है
मृत्यु की शैय्या पर
सोच रहा मानव
गुजर गया
जीवन एक दिन
आ गई शाम
करना है आराम
शरीर छोड़ कर ।
-रमेश चौहान
Posted in आलेख रत्‍न, विविध

मानसून का मनोहारी दृश्य, जीवन को मनोहर बनाता है

मानसून का मनोहारी दृश्य-

मानसून की फुहारों से धरती की सतह नाच उठी है । चिड़िया घोसले में फुदकने में लगे हैं । मेंढक और झींगुरा मैं क्यूट कंपटीशन हो रहा है। छोटी-छोटी घास धरती की छाती से लिपटने लगे हैं । पतझड़ के पौधे फिर हरियाने लगे हैं । सुखी नदी तालाब अपनी प्यास बुझा रहे हैं ।

हमारे बच्चे चिड़ियों की तरह चहकने लगे हैं । गांव की गलियों में बच्चों का गुंजन हो रहा है। किसानों का मन मयूर की तरह नाच उठें हैं । खेतों में बीज छिटकते हुए किसानों के गीत सुनने लायक है । अभी खेतों में बुवाई का काम जोरों पर है जिधर देखो किसान के हल, ट्रैक्टर बुवाई में लगे हुए हैं ।

मानसून का महत्व-

भारतीय कृषि मानसून पर आधारित है । चाहे हजारों लाखों सिंचाई के साधन हो जाएं किंतु मानसून में वर्षा ना हो तो कृषि में सम्मत नहीं हो सकता । इस प्रकार मानसून भारतीय कृषि का बैकबोन है ।

अच्छी कृषि हो इसके लिए आवश्यक है अच्छे मानसूनी बारिश हो । मानसून की सक्रियता एटमॉस्फेयर प्रेशर पर डिपेंड करता है । इसके लिए पेड़ पौधे सहायक होते हैं । जितने ज्यादा पेड़ पौधे होंगे उतनी ही अच्छी बारिश होगी ।

अच्छी मानसून के लिए वृक्षारोपण और वृक्षों का संरक्षण आवश्यक-

मानसून का महत्व स्वयं सिद्ध है । मानसून जहां कृषि की रीढ़ है, वहीं भू-गर्भ जल स्तर को बनाए रखने के आवश्यक है । जहां हमारे लिए “जल ही जीवन है” वहीं जल के लिए मानसून जीवन है । मानसूनी वर्षा भू-सतही जल और भू-गर्भी जल दोनों के लिए  ईंधन के समान है ।

मानसून के लिए हरे-भरे पेड़-पौधों का होना आवश्यक है । इसलिए केवल दिखावा के वृक्षारोपण करने से काम नहीं चलने वाला है अपितु वृक्षों का संरक्षण भी आवश्यक है । केवल जंगलों का घना होना ही आवश्यक नहीं है अपितु बसाहटों के आसपास भी अच्छी संख्या में पेड़-पौधों का होना भी आवश्यक है ।

उपसंहार-

मानसून का यह दृश्य हर व्यक्ति को आह्लादित कर रहा है । कभी रिमझिम-रिमझिम फुहारों से घर का आंगन आनंदित हो रहा है तो कभी तेज बारिश से छप्पर से पानी अंदर आ रहे हैं । क्‍या मनोरम दृश्‍य है । चारो ओर संतोष का भाव देखकर मन में संतोष हो रहा है । आखिर वर्षा से अन्‍न की प्राप्ति है, वर्षा से ही जल, और वर्षा से ही जीवन सुलभ है । इस बार अच्‍छी बारिश हो यही शुभकामना है ।

Posted in गीत-लोकगीत, छंद, साहित्‍य रत्‍न

गणेशजी की आरती

श्रीशमी गणेश, नवागढ़

(‘ओम जय जगदीश हरे’ के तर्ज पर)

Singer-Dileep Jaiswal
Singer-Naina Thaukur
ओम जय श्री गणराजा, स्वामी जय श्री गणराजा ।
बंधु षडानन पितु शिव, मातु हिंगुलाजा ।।
रिद्धि सिद्धि के स्वामी,  सुत शुभ अरु लाभे  ।
सकल संपदा के दाता, हमरे भाग जागे ।
मूषक वाहन साजे, कर मुद्रा धारी ।
मोदक भोग सुहाये, भगतन शुभकारी ।।
प्रथम पूज्य गणनायक, गौरी सुत प्यारे ।
विकटमेव भालचंद्र, अतिप्रिय नाम तुम्हारे ।।
वक्रतुंड धूम्रवर्ण, गजमुख इकदंता ।
गजानन श्री लंबोदर, विघ्नहरण सुखकंता ।।
विघ्न-विनाशक वर सुखदायक, ज्ञान ज्योति दाता ।
सकल कुमति के नाशक, सुमति सुख लाता ।
अष्टविनायक अति जीवंता, हिन्द भूमि राजे ।
श्रद्धा सहित पुकारत, भगतन हिय साजे ।।
तनमन करके अर्पण, श्रद्धा सहित  ध्‍यावो ।
कहत भक्‍त कवि 'रमेशा, मनवांछित फल पावो
-रमेश चौहान
Posted in गीत-लोकगीत, छंद, साहित्‍य रत्‍न, साहित्यिक चर्चा

भजन-‘संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी’

सार छंद-

प्रस्‍तुत भजन सार छंद में लिखि गई है । भारतीय संस्‍कृति और साहित्‍य का विशेष महत्‍व है । हिन्‍दी साहित्‍य स्‍वर्ण युग के कवि तुलसीदास, सूरदास, कबीर दास जैसे संतों ने अपनी रचनायें छंदों में ही लिखी हैं । इसके बाद भी छंदों का प्रचलन बना हुआ है । ‘सार छंद में चार पद होते हैं, प्रत्‍येक पद में 16,12 पर यति होता है । दो-दो पदों के अंत में समतुकांत होता है ।‘ सार छंद गीत और भजन लिखने के लिये सर्वाधिक प्रयोग में लाई जाती है ।

भजन का भवार्थ-

प्रस्‍तुत भजन में भगवान कृष्‍ण के मनोहर लालित्‍यमयी बालचरित्र का वर्णन सहज सुलभ और सरल भाषा में व्‍यक्‍त किया गया है । भगवान कृष्‍ण अपने बाल्‍यकाल में कैसे अपने भक्‍त गोपियों के साथ वात्‍सल्‍य भाव प्रदर्शित करते हुये उनके घर माखन खाते तो ओ भी चोरी-चोरी । भगवान के बालचरित्र की चर्चा हो और माखन चोरी की बात न हो, ऐसा कहॉं संभव है । प्रस्‍तुत भजन में भगवान के इन्‍हीं माखन चोरी लीला का चित्रात्‍मक अभिव्‍यक्ति प्रस्‍तुत किया गया है ।

बाल कृष्‍ण का माखन चोरी
बाल कृष्‍ण

माखन चोरी की कथा-

मूलरूप से श्रीमद्भागवत के दशम् स्‍कन्‍ध में भगवान के बाल चरित्र के साथ माखन चोरी का मनोहारी चित्रण किया गया है । इसे ही आधार मानकर हिन्‍दी साहित्‍य आदिकालिन कवियों से लेकर हम जैसे आज के कवि उसी भाव को अपने शब्‍दों में अपनी भावना को व्‍यक्‍त करते आ रहे हैं ।

मूल कथा के अनुसार भगवान कृष्‍ण अपने बाल्‍यकाल में अपने ग्‍वाल सखाओं के साथ खेल-खेल में गोकुल के ग्‍वालिनीयों के यहाँ माखन चुराने जाये करते थे । उनके सखा मानव पिरामिड बना कर कृष्‍ण को अपने कंधों में उठा लिया करते थे । भगवान कृष्‍ण ऊपर टांगे गये शिके (रस्सी में बंधे हुये मटके, जिसमें माखन रखा जाता था) को उतार लेते थे और स्‍वयं माखन तो खाते ही थे साथ-साथ ही हँसी-ठिठोली के साथ अपने बाल सखाओं को भी माखन खिलाते थे ।

अचरज की बात है इस माखन चोरी से वे ग्‍वालिनीयें आत्‍मीय रूप से बहुत आनंदीत होती थी जिनके यहॉं माखन चोरी होता था, वे ग्‍वालिनी बाहर से कृष्‍ण को डांटती थी किन्‍तु मन ही मन अपने भाग्‍य को सराहती थी कि कृष्‍ण उनके हाथों से बनाये माखन को खा रहे हैं ।

इससे अधिक अचरज की बात यह थी कि जिस ग्‍वालिन के घर माखन चोरी नहीं होता था, वह ग्‍वालिन बहुत दुखी हो जाती थी, उनके मन में एक हिनभावना आ जाता था कि उसकी सखी के यहॉं माखन चोरी हुआ किन्‍तु स्‍वयं उनके यहॉं नही हुआ और वे मन ही भगवान कृष्‍ण से प्रार्थना करने लगती कि हे माखन चोर, मेरे माखन का भी भोग लगाइये, मेरे घर को भी पावन कीजिये ।

इन्‍हीं भावनाओं को मैनें अपने इस काव्‍य भजन में पिरोने का प्रयास किया है-

संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
मेरो घर कब आयेंगे वो, राह तके सब छोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
मेरो घर कब आयेंगे वो, राह तके सब छोरी ।
सुना-सुना घर वो जब देखे, पहुँचे होले-होले ।
शिका तले सब ग्वाले ठाँड़े, पहुँचे खिड़की खोले ।।
ग्वाले कांधे लिये कृष्ण को, कृष्णा पकड़े डोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
माखन मटका हाथ लिये प्रभु, बिहसी माखन खाये ।
कछुक कौर ग्वालों पर डारे, ग्वालों को ललचाये ।।
माखन मटका धरे धरा पर, लूटत सब बरजोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
ग्वालन छुप-छुप मुदित निहारे, कृष्ण करे जब लीला ।
अंतस बिहसी डांट दिखावे, गारी देत चुटीला ।।
कृष्ण संग गोपी ग्वालन, करते जोरा-जोरी ।
संग लिये प्रभु ग्वाल बाल को, करते माखन चोरी ।
-रमेश चौहान
Posted in छंद, साहित्‍य रत्‍न

प्रेम के दोहे

Photo by Philip Justin Mamelic on Pexels.com
दुनिया की यह रीत है, होते सबको प्रीत ।
समझे जिसको हार तू, होती तेरी जीत ।।
मेहंदी तेरे नाम की, रचा रखी है हाथ ।
जीना मरना है मुझे, अब तो तेरे साथ ।।
रूठी हुई थी भाग्य जो, मोल लिया अब शूल ।
तेरे कारण जगत को, मैंने समझी धूल ।।
तेरे मीठे बोल से, हृदय गई मैं हार ।
तेरे निश्चल प्रीत पर, तन मन जाऊँ वार ।।
देखा जब से मैं तुझे, सुध-बुध गई विसार ।
मीरा बन मैं श्याम पर, सब कुछ किया निसार ।।
खोले सारे भेद को, मेरे दोनों नैन ।
नहीं नुपुर भी मौन है, बोले मीठी बैन ।
प्रिये तुझे मैं क्या दूॅ , नित नूतन उपहार ।
सौंप दिया मैं तो तुझे, निज जीवन पतवार ।।
मूरत प्यारी चांद सम, श्याम मेघ सम केश ।
अधर पुष्प की पंखुड़ी, आंखों पर संदेश ।
अफसाना ये प्यार का, जाने ना बेदर्द ।
हम हँस हँस सहते रहे, बांट रही वह दर्द।।
लम्हा लम्हा इश्क में, बहाते रहे अश्क ।
इश्‍क इश्‍क है बेखुदी, इसमें कैसा रश्क ।।
वो तो खंजर घोपने, मौका लेती खोज ।
उनकी लंबी आयु की, करूं दुवा मैं रोज ।।
अश्क दिये आश्की सदा, तन्हा जीवन यार ।
जिगर लगे जब मोम का, कभी न करना प्यार ।।
-रमेश चौहान
Posted in आलेख रत्‍न, सांस्‍कृतिक

पहेलियां

परिचय

भारतीय संस्कृति में मानसिक विकास के लिए पहेली पूछना और पहेली बूझना संस्कृति विकास के प्रारंभिक काल से प्रचलन में है । किंतु इंटरनेट और सोशल मीडिया के तामझाम में नए बच्चे ऐसे खो गए हैं कि उनको इस प्रकार की संस्कृति का ज्ञान ही नहीं रह गया है । 

नए दौर में नयापन चाहिए-  

  • आज के बच्चे क्विज हल करना जानते हैं, वीडियो गेम खेलना जानते हैं, किंतुु पारंपरिक पहेलियों की ओर उनका ध्यान नहीं जाता । 
  • नया समय, नया दौर, नए बच्चे नयापन मांगते हैं । पारंपरिकता को यदि नए जमानेेेे तक पहुंचाना हो तो उसमें नयापन लाना होगा । इसी सिद्धांत के आधार पर मैंं आज प्राचीन विधा पहेली को नये परिधान में प्रस्तुत कर रहा हूं । 

पहेली कहते किसे हैं ?

इस बीच हम देखते हैं कि पहेली कहते किसे हैं ? प्रचलित पहेलियां काव्यात्म्म्मक रूप में शब्दों का ऐसा जाल होता है जिसमें उस वस्तु के प्रमुख गुणों को बुना जाता हैै जिससे उसका पहचान हो सके । 

पहेली बुझते कैसे हैं ? 

पहेली बुुझने केे लि पहले दिए गए पहेली को सावधानी पूर्वक बार-बार पढ़ते हैं और उस में उल्लेखित गुणोंं को समझने का प्रयास करते हैं । बार-बार ध्यान देने सेेे उस वस्तु की पहचान हो जाती है । 

प्रस्तुत है मेरे ही द्वारा रचित कुछ नई पहेलियांं- 

पीछा करता कौन वह, जब हों आप प्रकाश ।
तम से जो भय खात है, आय न तुहरे पास ।।
श्वेत बदन अरु शंकु सा, हरे रंग की पूंछ ।
सेहत रक्षक शाक है, सखा पहेली बूझ । 
काष्ठ नहीं पर पेड़ हूँ, बूझो मेरा नाम ।
मेरे फल पत्ते सभी, आते पूजन काम ।। 
बाहर से मैं सख्त हूँ, अंतः मुलायम खोल ।
फल मैं ऊँचे पेड़ का, खोलो मेरी पोल ।। 
कान पकड़ कर नाक पर, बैठा कौन महंत ।
दृष्टि पटल जो खोल कर, कार्य करे ज्यों संत ।। 
तरुण लड़कपन में हरी, और वृद्ध में लाल ।
छोटी लंबी तीक्ष्ण जो, करती खूब कमाल ।। 
फले कटीले वृक्ष पर, जिनकी खोल कठोर । 
बीज गुदे में है गुथे, करे कब्ज को थोर ।। 
-रमेश चौहान

जरा सोचिए, सोचने से मस्तिष्क का व्यायाम होता है । जिस प्रकार शारीरिक व्यायाम शरीर के लिए लाभदायक होता है ठीक उसी प्रकार पहेलियां भी मस्तिष्क के लिए लाभदायक होता है । अंत में इसका उत्तर दूंगा ।‌ अभी कुछ प्रयास कीजिए । ऐसे भी ये पहेलियां अत्यंत सहज सरल और सुलभ है । 

Photo by ThisIsEngineering on Pexels.com

दिए गए पहेलियों का उत्तर इस प्रकार है-

उत्तर- 1. परछाई 2. मूली 3. केला  4.नारियल 5. चश्मा (ऐनक), 6. मिर्च 7.बेल (बिल्व)