हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव
हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

अंग्रेजीभाषी भारतीय अंग्रेजी बोलें तो इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं किन्‍तु हिन्‍दी भाषीय भारतीय यदि बातचीत हिन्‍दी में ही कर रहे होते हैं किन्‍तु उनके हिन्‍दी को सुनकर अंग्रेजी बोलने का आभास होने लगे तो यह हिन्‍दी बोलचाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव ही है । आज कल हिन्‍दी संभाषण में अंग्रेजी का पुट इतना अधिक होता है कि हिन्‍दी का हड्डी-पसली टूटा जा रहा है । तकनीकी शब्‍दों जिनके लिए हिन्‍दी शब्‍द नहीं है अथवा क्लिष्‍ट है उसके विकल्‍प के रूप में अंग्रेजी शब्‍दों का प्रयोग किया जाना ही चाहिए किन्‍तु हिन्‍दी के छोटे-छोटे और सरल शब्‍दों को भी अंग्रेजी शब्‍दों से प्रतिस्‍थापित किया जाना सही नहीं है । समान्य बोल चाल में जो हिन्दी बोली जा रही है उसमें 20 प्रतिशत शब्द अंग्रेजी के प्रयोग होने लगे हैं ।

परिवर्तन इतना हो कि उनकी आत्‍मा जीवित रह सके-

परिवर्तन सृष्टि का नियम है समय में परिवर्तन होता ही है  किन्‍तु मोटे तौर पर देखा जाए तो प्रकृति का मूल स्‍वरूप वहीं बना रहता है वही दिन, वही रात, वही सूरज, वही चांद । प्रकृति का परिवर्तन भी मूल स्‍वरूप से छेड़खानी नहीं करता किन्‍तु मनुष्‍य अपने बोल-चाल अपने चाल-चलन में ऐसा परिवर्तन करने लगता है कि उसके मूल स्‍वरूप में ही परिवर्तन का खतरा मंडराने लगता है । हमारे बोलचाल की भाषा में लचिलापन तो होना चाहिए किन्‍तु इस बात का भी ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि इस लचिलेपन से परिवर्तन इतना हो कि उनकी आत्‍मा जीवित रह सके ।

हिन्‍दी भाषा का बिगड़ता स्‍वरूप-

हिन्‍दी की अपनी लिपि अपने शब्‍द है किन्‍तु विडम्‍बना देखिए आज के बोलचाल की हिन्‍दी और सोशल मीडिया की हिन्‍दी के लिपि न तो देवनागरी रहे है न ही शब्‍द हिन्‍दी के । देवनागरी लिपि को रोमन लिपि से प्रतिस्‍थापित करने और हिन्‍दी बोलचाल में अधिक से अधिक अंग्रेजी शब्‍दों के प्रयोग करने का एक अघोषित प्रतिस्‍पर्धा चल पड़ा है । इसके दु:परिणाम का एक उदाहरण देखिए आज के बच्‍चे हिन्‍दी देवनागरी लिपि के गिनती भी नहीं पहचानते क्‍योंकि हिन्‍दी में हिन्‍दी अंको के स्‍थान पर अंग्रेजी अंको ने ले लिया है । कुछ प्रकार यदि लिपि बदलने का यह उपक्रम अनवरत जारी रहा तो हमारे देवनागरी लिपि पर गहरा संकट आ जाएगा ।

हिन्‍दी में कुछ विदेशी भाषाओं को स्‍वीकार किया जाना तो स्‍वभाविक है, किया भी जाना चाहिए, किया भी गया और किया भी जा रहा है जैसे अंग्रेजी स्‍वयं करती है किन्‍तु अंग्रेजी समर्थक ध्‍यान दे अंग्रेजी दूसरे भाषा को अपने ही लिपि में स्‍वीकार करती है । अंग्रेजी लिखने के लिए किसी दूसरे लिपि का प्रयोग नहीं करते जैसे हिन्‍दी में देखा जा रहा हिन्‍दी को देवनागरी में न लिख कर रोमन में लिखने की परम्‍परा विकसित हो रही है । ग्लोबल के नाम पर जो उदारीकरण का दौर चल रहा है इसका सबसे अधिक प्रभाव भाषा संस्कृति पर दिखाई दे रहा है ।

चैटिंग के नाम पर हिन्‍दी को विकृत करना-

सोशल मीडिया का प्रचलन जब से बढ़ा है हिन्‍दी की दुर्गति हो रही है । नए जमाने के बच्‍चे हिन्‍दी से दो प्रकार से खिलवाड़ कर रहे हैं एक तो ऐसे लोग हिन्‍दी को देवनागरी लिपि में लिखने के स्‍थान पर रोमन लिपि में लिख रहे हैं ।  ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि हिन्‍दी की अपनी एक लिपि है जिसे देवनागरी लिपि कहते हैं । यह भी पता होना चाहिए कि लोग घूमने-फिरने बाहर जा सकते हैं, बड़े-बड़े होटलों में रह सकते हैं किन्‍तु लौटकर उसे अपने ही घर आना होगा अपना घर अपना होता है, यही बात भाषा पर भी लागू है आप अपना बिस्‍तर दूसरों के खाट में कब तक लगाते रहेंगे । हां यदि सोशल मीडिया के उपकरण पर हिन्‍दी देवनागरी लिपि का विकल्‍प नहीं होता तो यह एक बार स्‍वीकार भी था किन्‍तु वहां हिन्‍दी देवनागरी कीबोर्ड का विकल्‍प उपलब्‍ध है, फिर भी उसका प्रयोग नहीं करना किसी भी स्थिति में स्‍वीकार्य नहीं है ।

दूसरा यह कि कुछ लोग हमें हिन्‍दी देवनागरी लिपि लिखा तो दिखा रहे होते हैं किन्‍तु मूलत: वह एल्‍फाबेटिक की बोर्ड के सहारे से रोमन में लिख कर देवनागरी दिखा रहे होते हैं । यह दोनों ही स्थिति अच्‍छी नहीं है । आप हिन्‍दी में सोच रहे होते हैं, हिन्‍दी में बात कर रहे होते तो आखिर ऐसी क्‍या विवशता है कि आप हिन्‍दी में नहीं लिख पा रहे हैं । कुछ बच्‍चे तर्क देते हैं हिन्‍दी कीबोर्ड में लिखना कठीन होता है ऐसे बच्‍चों से प्रश्‍न है कि स्‍कूल की पढ़ाई भी कठीन होती तो क्‍या आप इस डर से पढ़ाई छोड़ देते हैं, आपके माता-पिता भी आपकी भलाई के लिए कभी-कभी आप से कठोरता से प्रस्‍तुत होते हैं, तो क्‍या आप उन्‍हें छोड़ देते हैं । युवा शक्ति संघर्षो से जूझ कर नए रास्‍ते निकालने के लिए जाने जाते हैं और आप  इस छोटी से कठिनाई से पार नहीं पा रहें हैं ।

हिन्‍दी का खाने वाले ही हिन्‍दी की उपेक्षा कर रहे हैं-

यह विडम्‍बना नहीं तो और क्‍या है जिनका पेट हिन्दी के नाम पर ही भरता है चाहे वह वालीहुड हो या हिन्दी समाचार चैनल यूट्यूब चैनल हो या फिर हिन्‍दी ब्‍लॉग हिन्दी में अंग्रेजी को घुसाने में अपनी शान समझने लगे हैं । जिन नायक-नायिका को हिन्दी फिल्मों के नाम शोहरत हासिल मिली हैं वे ही जब भी साक्षात्कार देते है या किसी टीवी कार्यक्रम में आते हैं तो 50 प्रतिशत से अधिक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं । हिन्दी समाचार चैनल तो हिन्दी के कुछ प्रचलित और साधारण शब्दों को लुप्त करने में लगे है जैसे बचाव के लिए rescue, सम के लिए even, विषम के लिए odd , भगदड़ के लिए panic आदि । ऐसे सैंकड़ों हिन्दी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्द प्रतिस्थापित कर है । ऐसे में आने वाली पीढ़ी इन हिन्दी शब्दों को भूल जाएंगी । ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि हिन्दी फिल्मों, हिन्दी यूट्यूब चैनल या समाचार चैनल की पटकथा, संवाद और गाने भी या तो रोमन लिपि हिन्दी में लिखे जा रहे हैं या शुद्ध अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं । यह हिन्‍दी की उपेक्षा नहीं तो और क्‍या है?

प्रश्‍न अंग्रेजी विरोध का नहीं अपितु हिन्‍दी के अस्तित्‍व का है-

प्रश्‍न अंग्रेजी के विरोध का नहीं है अंग्रेजी भाषा के काम लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाना चाहिए किन्‍तु हिन्दी के स्वरूप को बिगाड़ने के लिए अत्यधिक मात्रा में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कहां तक उचित है । यह बहुत विरोधाभाष लग रहा है एक ओर जहां  इंटरनेट में हिन्दी प्रयोग करने वालों की संख्या में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है चाहे वह हिन्दी ब्लाॅग हो चाहे हिन्दी यूट्यूब चैनल हिन्दी का ही बोल-बाला दिख रहा है किन्तु उसमें प्रयुक्त हिन्दी को देख कर रोना आता है । हिन्दी को हिन्दी स्वरूप में लिखने-पढ़ने-बोलने में या तो दिक्कत आ रही है या लोग शर्म महसूस कर रहे है।

अनावश्‍यक अंग्रेजी प्रयोग को शान समझना दुखद स्थिति है-

दूर के ढोल सुहाने होते हैं, चमक के प्रति आकर्षण होता है इस आभासी चमक के कारण जब कोई छत्तीसगढ़िया छत्तीसगढ़ी बोले तो उसे गंवार शब्द से विभूषित किया जाता है, जब कोई हिन्दी भाषी 85-90 प्रतिशत भी शुद्ध हिन्दी बोले तो उसे पुराने विचारधरा का आदमी कह कर उसकी उपेक्षा की जाती है । यह स्थिति तो हिन्दी बोलचाल की है । यदि हिन्दी लेखन में ध्यान दें  इसकी स्थिति और अधिक दयनीय है । इंटरनेट और मोबाइल के इस युग में ज्‍़यादतर लोग हिन्दी को हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखने के बजाय रोमन लिपि के माध्यम से हिन्दी लिख रहे है । आश्‍यर्च है इस शर्मसार स्थिति को भी लोग अपनी शान समझते हैं । यही कारण है लोग अनावश्‍यक अंग्रेजी शब्‍दों का प्रयोग करने को ही अपना शान समझने लग गए हैं ।

भाषा की रक्षा के लिए अपनत्व की आवश्यकता है-

बात केवल हिन्दी में अंग्रेजी की घुसपैठ बस की नहीं है हिन्दी में उर्दू के शब्द भी घालमेल किए हुए है । हिन्‍दी शब्‍दकोश में अन्य भाषाओं के जो शब्द स्वीकार किए गए वे तो स्वीकार्य है किन्तु अनावश्यक रूप से अंग्रेजी या उर्दू शब्‍दों को हिन्दी में प्रयोग करना दासता का प्रतीक दिखता है, अपनी भाषा के प्रति स्नेह का न होना दर्शाता है । किसी को अपना मान लिया जाए तो अपनों के दोष नहीं दिखते । आप हिन्‍दी को अपना मान कर तो देखिए सारी कठिनाई धीरे-धीरे ही सही लेकिन अपने आप ही दूर हो जाएंगी । प्रश्‍न केवल इतना ही कि आप हिन्‍दी को हृदय से स्‍वीकार कीजिए बस ।

Published by कवि रमेश चौहान

A Hindi content writer.A article writer, script writer, lyrics or song writer and Hindi poet. Specially write Indian Chhand, Navgeet, rhyming and nonrhyming poem, in poetry. Articles on various topics. Especially on Ayurveda, Astrology, and Indian Culture. Educated based on Guru-Shishya tradition on Ayurveda, astrology and Indian culture. I am also write in Chhatisgarhi.

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