Posted in आलेख रत्‍न, धर्म-कर्म-अध्‍यात्‍म

प्रथम पूज्‍य गणपति-मंगलमूर्ति गणराज

भारत का बच्‍चा-बच्‍चा जानता है कि भगवान गणेश प्रथम पूज्‍य है । चाहे वह गृहस्‍थी हो, चाहे वह सन्‍यासी हो, चाहे वह शैव हो, चाहे वह वैष्‍णव हो सभी व्‍यक्तियों, संप्रदायों के द्वारा गणेशजी की प्रथम पूजा की जाती है । चाहे घर का कोई मांगलिक, धार्मिक अनुष्‍ठान हो, चाहे व्‍यपार का प्रारंभ करना हो चाहे अन्‍य कामों का प्रारंभ करना हो हर काम, हर आयोजन के प्रारंभ गणेश जी के पूजन से ही करते हैं यही कारण है कि हमारे समाज में किसी कार्य को प्रारंभ करने के लिये ‘श्रीगणेश करें’  कहा जाता है । इस प्रकार कोई पूजा-पाठ का आयोजन हो या न हो किन्‍तु गणेशजी का नाम हर कार्य के पहले लिया ही जाता है ।

गणेशजी का वैदिक महत्‍व-

हमारे वेद-पुराणों में  गणेशजी की पूजा-अराधना को सबसे पहले ही नहीं सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍वीकार किया गया है । इन्‍ पावन ग्रंथों के अनुसार महागणपति गणराज को कारणब्रह्म अर्थात सृष्टि के सभी प्रकार के कार्यो एवं रचनाओं का कारण और कार्यब्रह्म अर्थात सृष्टि के सभी प्रकार कार्यो एवं रचनाओं को करनेवाल स्‍वीकार किया गया है । इस गणेशजी को ही उत्‍पत्‍ती, स्थिाति और प्रलय का कारण और करण के रूप माना गया है । शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव () कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है।

गणेशजी का जन्‍म की कथा-

श्रीगणेशजी अजन्‍मा है । गणेशजी मॉं के गर्भ से जन्‍म नहीं लिया है । भगवान गणेश के जन्‍म के संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार भी भगवान गणेश का जन्‍म नहीं हुआ है अपितु माता पार्वती ने गणेशजी की देह की रचना अपने शरीर के हरिद्रलेप से की हैं । इस कथा के अनुसार एकबार माता पार्वती स्‍नान करते समय  शरीर में चंदन-हल्‍दी  आदि का उबटन लगाई हुई थी । इसी समय अपने पहरेदारी की कामना से एक मानवाकृति की रचना कर उसे अपने आद्य शक्ति से प्राणवान कर दिये । गणेश जी जो पहले गजमुख नहीं थे, को अपने पहरेदारी का दायित्‍व दिया । बालक गणेश अपने मॉं के के पहरेदारी में द्वार के बाहर खड़े हो गये । उनकी परीक्षा लेने सभी देवता आकर अंदर जाने की चेष्‍टा करने लगे किन्‍तु बालगणेश सभी को पराजीत करते चले गये । अंत में भगवान भोलेनाथ आये उन्‍हें भी बालगणेण द्वार ही रूकने कहा किन्‍तु भोलेनाथ ने कहा यह घर मेरा है मुझे अंदर जाने दो । बालगणेश के नहीं मानने पर भोलेनाथ उनका सिर धड़ से अलग कर दिया । इस माता बहुत ही रूष्‍ट हुई, उनके क्रोध से बचने के लिये इस बालक पुनर्जीवित किया गया इसके उसके धड़ पर हाथी का सिर जोड़ दिया गया । तब गणेश गजानन कहलाने लगे । इस घटना के विद्वानों ने बालक गणेश की रचना पर माता-पिता दोनों की सहयोग से जोड़कर देखते हैं, इस घटना के पहले वह बालक केवल माता की रचना थी, भगवान भोलेनाथ द्वारा उस बालक के धड़ में सिर जोड़ जाने से वह पिता की भी रचना हो गया । इस प्रकार गणेशजी के माता पार्वती एवं पिता भगवान भोलेनाथ को स्‍वीकार किया गया । यह घटना भादो मास के शुक्‍ल चतुर्थी को हुआ था । इस कारण इसी दिन भादो मास के शुक्‍ल चतुर्थी को गणेशजयंती  के रूप में जाना जाता है ।

गणेशजी के प्रथम पूज्‍य होने की कथा-

  • त्रिदेव ब्रह्मा,विष्‍णु और महेश ने देवों में सबसे पहले किसकी पूजा की जाये यह तय करने के लिये देवताओं के मध्‍य एक स्‍वस्‍थ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । प्रतियोगिता का शर्त था कि जो देवता पृथ्‍वी के सात प्रदक्षिणा करके वापस आयेगा वही प्रथम पूज्‍य होंगे । सभी देवताओं ने अपने-अपने वाहनों से पृथ्‍वी प्र‍दक्षिण प्रारंभ कर दी किन्‍तु गणेशजी अपने मूषक वाहन में बैठकर अपने माता-पिता भगवान भोले नाथ एवं माता गौरी के प्रदक्षिणा प्रारंभ कर दी । उनसे ऐसा करने का कारण पूछने पर उसने बताया कि माता स्‍वयं धरती की प्रतीक होती हैं और पिता आकाश का प्रतीक होता है । इस प्रकार मैनें धरती और आकश का सात प्रदक्षिण पूरा कर ली है । उनके इस तर्क से त्रिदेव बहुत प्रसन्‍न हुये और गणेशजी को बुद्धि का देवता स्‍वीकार अग्र पूजा के अधिकारी नियुक्‍त किये तब से गणेशजी की सबसे पहले पूजा की जाती है ।

गणेशजी को प्रथम पूज्‍य मानकर सभी कार्यो के प्रारंभ में गणेशजी की पूजा की जाती है । गणेशजी को बुद्धि के देवता के रूप स्‍वीकार किया जाता है । गणेशजी को विघ्‍नविनाशक के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ हर बाधाओं और कष्‍टों से रक्षा करने वाला होता है । गणेशजी की पत्‍नी रिद्धी और सिद्धी हैं जो धन-धान्‍य और यश-कीर्ति की प्रतीक हैं । इस प्रकार गणेशजी की अराधना से ही रिद्धी-सिद्धी प्राप्‍त किये जा सकते हैं । शुभ और लाभ गणेशजी के पुत्र हैं जो सफलता एवं प्रगति के परिचायक हैं । इसप्रकार मानवजीवन के भौतिक जीवन एवं अध्‍यात्मिक दोनों जीवन के लिये गणेशजी का अराधना सुख-शांति, सफलता-प्रगति, धन-धान्‍य, यश-कीर्ति और मुक्ति का साधन है ।

पूजन पद्यति स्‍वयं में वृहद और जटिल भी होता है किन्‍तु यथाशक्ति पूजन करने का विधान बनाया गया है । इसलिये अपने शारीरिक और आर्थिक शक्ति-सामर्थ्‍य के अनुसार भगवान की पूजा जाती है । इसके संक्षेप में दो विधियां प्रचलित है-

  1. पंचोपचार पूजन- इस पूजन पॉंच प्रकार के पूजन सामाग्री से भगवान की पूजा की जाती है । इसके लिये पहले चंदन, गंध, कुंकुम, हल्‍दी आदि मे से कोई एक या सभी, दूसरा पुष्‍प-पल्‍लव भेट करना, तीसरा धूप देना, चौथा दीप और पॉंचवा नैवेद्य चढ़ाना होता है ।
  2. षोडशोपचार पूजन – इस पूजन पद्यति में सोलह प्रकार से भगवान की पूजा की जाती है । इसका क्रमा इसप्रकार है- 1.आव्‍हान करना 2.आसन देना 3. पाद्य देना 4.अर्घ देना 5;आचवन करना 6. स्‍नान कराना 7.वस्‍त्र चढ़ाना 8. उपवस्‍त्र और यज्ञोपवित 9.चंदन, गंध, कुंकुम, हल्‍दी आदि मे से कोई एक या सभी 10.पुष्‍प-पल्‍लव भेट करना 11..धूप देन. 12..दीप 13.नैवेद्य चढ़ाना 14.ध्‍यान-प्रणाम 15. आरती-परिक्रमा और 16. पुष्‍पांजली-क्षमाप्रार्थना ।

गणेश जी मंत्राष्‍टक (आठ मंत्र)-

  1. गणेशजी का बीज मंत्र -”गं”
  2. कामनापूर्ति मंत्र- ‘ॐ गं गणपतये नमः’
  3. षडाक्षर मंत्र -”ॐ वक्रतुंडाय हुम”
  4. उच्छिष्‍ट मंत्र- ”ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वा”
  5. विघ्‍ननिवारण मंत्र-”गं क्षिप्रप्रसादनाय नम”
  6. हेरम्‍ब गणपति मंत्र – ‘ॐ गं नमः’
  7. लक्ष्‍मीविनायक मंत्र- ”ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा”
  8. त्रैलोक्‍य मोहन गणेश मंत्र -”ॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।’

Author:

A Hindi content writer.A article writer, script writer, lyrics or song writer and Hindi poet. Specially write Indian Chhand, Navgeet, rhyming and nonrhyming poem, in poetry. Articles on various topics. Especially on Ayurveda, Astrology, and Indian Culture. Educated based on Guru-Shishya tradition on Ayurveda, astrology and Indian culture.

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