देवार का दर्द (विमुक्त जाति-देवार)

देवार का दर्द

(साक्षात्कार पर आधारित शोध आलेख)

-रमेशकुमार सिंह चौहान

साक्षात्कार पर आधारित शोध आलेख विमुक्त जाति-देवार का दर्द
साक्षात्कार पर आधारित शोध आलेख विमुक्त जाति-देवार का दर्द

मैं प्रतिदिन पौ फटने के पूर्व सैर करने जाता हूँ । सैर करने जाते समय प्रतिदिन मैं कुछ बच्चों को देखता -इन बच्चों पर कुछ कुत्ते भौंकते और ये बच्चे वहां से किसी तरह कुत्तों को हकालते-भगाते स्वयं भागते बचकर निकलते और सड़क किनारे पड़े कूड़े-कर्कट से अपने लिये कुछ उपयोगी कबाड़ एकत्रित करते । इन बच्चों में 6 वर्ष से 13 वर्ष तक के लड़के-लड़कियां हुआ करती हैं । यह घटना कमोबेश आज भी प्रतिदिन घट रही हैं । एक दिन मैंने सोचा कि इन बच्चों से बात करूँ, इन लोगों से पूछूँ ये बच्चे स्कूल जाते भी हैं कि नहीं ? मैंने बच्चों के सामने जा कर कुछ पूछना ही चाहा कि वे सारे बच्चे उसी प्रकार भाग खड़ हुये जैसे ये कुत्तों के भौंकने से भाग खड़े होते हैं । तब से ये बच्चे मुझे देखकर दूर से चले जाते कोई पास ही नहीं आता । एक दिन करीब 12 वर्ष की एक लड़की जो बच्चों के उस समूह से कुछ दूरी पर कबाड़ चुन रही थी उनके सामने मैंने अपना प्रश्न दाग ही दिया-

‘बिटिया, क्या पढ़ती हो ?
उसने सहजता से जवाब दिया- मैं नहीं पढ़ती
मतलब तुम स्कूल नहीं जाती -मैंने आश्चर्य से पूछा ।
उसने उतनी ही सहजता से जवाब दिया- नहीं, मैं स्कूल नहीं जाती ।
फिर मैंने पूछा-‘ये सारे बच्चे ?‘
उसने जवाब नहीं में दिया -इनमें से कोई स्कूल नहीं जाते ।
मैंने पूछा- क्यों ???
जवाब आया- हमलोग देवार हैं साहब !
तो क्या हुआ ? क्या देवारों को स्कूल जाना वर्जित है या स्कूल वाले मना करते हैं ?
नहीं साहब, स्कूल वाले मना नहीं करते बल्कि इनमें से कुछ बच्चों का नाम स्कूल में दर्ज है ।
तो फिर क्यों स्कूल नहीं जाते आप लोग ?
इस काम से पैसा जो मिलता है साहब ।
क्या तुम्हारे माँ-बाप तुमलोगों को स्कूल जाने नहीं कहते ?
नहीं ।

मैंने सोचा इन बच्चों के माँ-बाप से जाकर बात किया जाये । इस काम के लिये मैंने अपने एक पत्रकार मित्र से चर्चा की । उसने साथ जाना स्वीकार किया । कोई तीन दिन के योजना पश्चात हम दोनों का उनके निवास स्थल ‘देवार डेरा‘ जाना तय हुआ । मैंने उस समुदाय के एक लड़के जो कबाड़ बेचने जा रहा था, से बात किया आप लोगों के परिवार के मुखिया अभी घर पर मिलेंगे क्या ? उसने प्रति प्रश्न पूछा क्या काम है ? कबाड़ी का काम करना है क्या ? यदि कबाड़ी का काम करना है तो मैं ही बता दूँगा । मैंने कहा नहीं भाई मुझे कबाड़ी का काम नहीं करना है । मैं आपलोगों के जाति, इतिहास और बच्चों के संबंध में बात करना चाहता हूँ । वह लड़का चहक उठा शायद उसे लगा कि कोई तो है जो हमारे विषय में बात करना चाहता है । वह खुद से कहने लगा चलो मैं आपको ले चलता हूँ । मैंने कहा बेटा तू निकल मैं अपने मित्र के साथ आ रहा हूँ । मैंने अपने पत्रकार मित्र को सूचित किया फिर हम दोनों उनके निवास स्थल की ओर निकल पड़े । देवार डेरा कस्बे से लगभग 1.5 किमी की दूरी पर कस्बे से बाहर स्थित था । पिछली रात को कुछ बारिश हुई थी इसलिये कच्चे मार्ग पर कीचड़ पसरा था । जैसे-तैसे हम दोनों वहां तक पहुँचे । हमने वहां पहुँच कर देखा वह लड़का जिससे मेरी बातचीत हुई थी वह अपने बड़े-बुजुर्गों को एकत्रित कर लिया था । सभी हमारे लिये प्रतीक्षारत थे । उन लोगों ने दो कुर्सी की व्यवस्था कर हम लोगों को बैठने का आग्रह किया । कुर्सी देखकर लग रहा था कि कबाड़ का है । लग ही नहीं रहा था, था कबाड़ का ही । हम लोग चर्चा शुरू करते इनसे पूर्व ही वे लोग अपनी समस्याएं हमें बताने लगे । शायद उन लोंगो को लग रहा था कि हम लोग कोई सरकारी कर्मचारी हैं जो सरकारी दायित्व पूरा करने आये हैं । मित्र ने बतलाया कि हम लोग पत्रकार लेखक हैं, आप लोंगो से कुछ बातचीत करने आये हैं । चर्चा की शुरूआत मेरे मित्र ने की उनमें से जो सबसे बुजुर्ग लग रहा था उनसे उन्होंने पूछा-

आपका क्या नाम है ?
परमसुख ।
यहां कब से रह रहो हो ?
तीस-चालीस वर्ष से
इससे पहले कहां रहते थे ?
कवर्धा में ।
क्या आपके पूर्वज कवर्धा में ही रहते थे ?
नहीं साहब, रायगढ़ में ।
तो यहां कैसे आना हुआ ?
तीस-चालीस साल पहले यहां एक गाँव से दूसरे गाँव भीख मांगते हुये आये । पंचायत ने यहां डेरा लगाने के लिये स्थान दे दिया तब से यहीं रह रहे हैं । किन्तु साहब इन तीस वर्षों में दर्जनों स्थान से हमारा डेरा हटवाते रहे ।
इसी बीच मैंने पूछा- मैंने सुना है आपके पूर्वज एक स्थान पर नहीं रहते थे ?
हाँ, साहब हमारे बुर्जुग गाँव-गाँव घूमा करते थे ।
घूम-घुम कर क्या करथे थे ?
यही कबाड़ी का काम करते थे ।
पहले तो कबाड़ी का काम आज के जैसे तो नहीं चलता रहा होगा ? फिर ये लोग क्या करते थे ?
गोदना गोदते थे ।
ये काम तो आप लोगों की महिलाएं करती हैं ना ?
हां, महिलाएं करती थीं, अब ये काम कहां चलता है साहब ।
और पुरूष लोग क्या करते थे ?
हम लोग चिकारा बजाकर गीत गा-गाकर भीख मांगते थे ।
क्या कोई विशेष गीत गाते थे ?
ओडनिन-ओड़िया का ।
क्या अभी भी गाते हो ?
नहीं, हम लोग पहले जैसे घर-घर जाकर नहीं गाते । कभी-कभार अपने डेरा में गुनगुना लेते हैं, किन्तु हमारे समाज के रेखा देवार, चिंताराम देवार आदि गातें हैं, जो रेडियो, टी.वी. में भी प्रसारित होता है ।
और क्या काम करते थे ?
नाचते थे ?
महिलाएं भी ?
महिलाएं ही नाचती थीं ।
घर की सभी बहू-बेटी ?
हाँ-हाँ, घर की बहू-बेटी सभी ।
आज भी ये नाचती हैं क्या ?
जिसके माँ-बहन नाची हों उसकी बेटियां नहीं नाचेंगी साहब ? तो और क्या करेंगी ? नाचतीं है साहब आज भी नाचती हैं । सांस्कृतिक कार्यक्रम के रंगमंचों पर हमारी लड़कियां नाचने जाती हैं ।
पास में खड़े बच्चों की ओर इंगित करते हुये मित्र ने पूछा-ये बच्चे स्कूल जाते हैं ?
पास में खड़ा एक दूसरे व्यक्ति ने जवाब दिया- नहीं जाते सरजी ।
क्यों नहीं जाते ?
उसने झल्लाते हुये जवाब दिया-नहीं जाते ।
मैंने पूछा- क्या स्कूल वाले दाखिला नहीं लेते ?
लेते हैं सरजी, कुछ का नाम भी लिखा है ।
तो फिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते ।
इस बीच एक तीसरे व्यक्ति ने जवाब दिया-सड़क में कुछ लोग दारू पीकर गाड़ी चलाते हैं इस डर से हम अपने बच्चों को स्कूल नही भेजते । इसी बीच एक अन्य ने जवाब दिया हम अपने बच्चों को दुकान तक नही भेजते ।
मित्र ने कहा- इन बच्चों को तो हम प्रतिदिन सुबह सड़क किनारे कबाड़ चुनते हुये देखते हैं ।
मैंने भी सहमति जताते हुये कहा- आखिर ये लोग तो घर से बाहर जाते ही हैं ।
इसी बीच एक अन्य युवक ने बात काटते हुये कहा- ‘‘असली बात ये है सरजी, इन बच्चों को बचपन से खाने-पीने का आदत पड़ गयी है । ये बच्चे लोग प्रतिदिन चालीस-पच्चास रूपये कमा लेते हैं । अपने खाने-पीने के लिये । ’’
मित्र ने कहां- आप लोग तो अपने ही कथन को झूठला रहे हो । जब इस कबाड़ के व्यवसाय में बच्चे इतने कमा लेते हैं तो आप लोगों की आमदानी भी ठीक-ठाक होगा । फिर आप लोग अपना रहन-सहन, घर-द्वार को क्यों नहीं सुधारते ?
युवक ने जवाब दिया- हम लोगों को एक बुरा लत है । हम लोग दारू पीते हैं ।
इस लत में सुधार करना चाहिये ना ?
‘‘ ये पढ़ाई-लिखाई, दारू-वारू की बातें छोड़ो हम लोगों की समस्या देखो और जो आपसे जो बन पड़ता हो करो । ’’ एक अन्य युवक ने कर्कश आवाज में कहा ।
इसी बीच एक और दूसरा युवक अपने हाथ में मोबाइल लेकर सीधे मेरे पत्रकार मित्र के सम्मुख आकर मोबाइल से फोटो दिखाते हुये कहने लगा -इसको पेपर में जरूर छापना देखो हम लोगों का हाल पूरा डेरा पानी में डूबा है । उनके दखल से आप लोगों के बातचीत में विघ्न पड़ गया किन्तु उनके चित्र ने हम दोनों को उसे देखने पर जरूर विवश कर दिया । मित्र ने मुझसे कहा, इस फोटो का अपने मोबाइल में ले लो । मैंने देखा फोटो साफ नहीं आया था क्योंकि उनका मोबाइल का कैमरा उचित क्वालिटी का नहीं था । मैंने कहा ये फोटो सही नहीं आया है चलो दूसरा ले लेते हैं । अभी तक हम लोग उनके डेरे के समीप मैदान पर थे । फोटो लेने के लिये उनके डेरे के समीप जाते हुये हमने पाया कि उन लोगों के डेरे ढलान पर है, जहां वर्षा का पानी बह रहा है । समीप पहुँचाने पर हमने पाया कि घास-फूस से बने हुये छोटी-छोटी झोपड़ीयां हैं, झोपडी़ के बाहर टूटी-फूटी सायकल, कुछ बर्तन, कुछ कबाड़ बेतरतीब तरीके से बिखरे हुये हैं, पास ही कुछ सूअर के बच्चे भी हैं । सभी डेरों तक पानी भरा हुआ है । डेरे तक जाने के लिये केवल और केवल पानी और कीचड़ का ही एक मात्र रास्ता था । कुछ डेरों के अंदर तक पानी घुस आया है । डेरों से महिलायें बताने लगी कि अभी तो बरसात शुरू ही हुआ है, तो हम लोगों का ये हाल है अभी तो पूरी वर्षा शेष है राम जाने आगे क्या होगा ? एक युवक ने कहा- ये स्थिति देखिये सरजी यही स्थिति रहा तो हैजा आदि बीमारी से हम में से कुछ लोग जरूर मर जायेंगे । यह दशा देखकर हम लोगों के तन मन में एक सिहरन पैदा हो गई । वो लोग कहने लगे देख लो साहब हम इस दलदल में रहने मजबूर हैं । इस दशा को देखकर जवाब देने के लिये के हमारे पास कोई शब्द ही नही थे ना ही आगे कुछ पूछने के लिये ही । हमने उस भयावह दृश्य को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर वापस आना ही उचित समझा ।

उक्त साक्षात्कार का चिंतन करते हुये मैने प्राथमिक निष्कर्ष के रूप में पाया कि – ‘‘इन लोगों की स्थिति ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई रोगी रोग से मुक्त तो होना चाहता है किन्तु उपचार के लिये औषधि उपलब्ध ना हो और औषधि उपलब्ध होने पर भी औषधि सेवन नहीं करना चाहता । ’’

एक सभ्य समाज की प्राथमिक आवश्यकता जीवन जीने की स्वतंत्रता है, किन्तु यह स्वतंत्रता तभी संभव है जब समाज में समानता हो । यह समानता एक हाथ से बजने वाली ताली नहीं है । भारत की आजादी के पश्चात भी सामाजिक समानता का असार अभी दूर-दूर तक नहीं दिख रहा है । भारतीय इतिहास की केन्द्रिय विषय-वस्तु एवं वर्तमान समस्याओं का मूल ‘जाति ’ ही है । धर्म, वर्ण, जाति लोकतंत्र में राजनेताओं का हथियार बन चुका है । विभिन्न सरकारों द्वारा विभिन्न जाति समुदाय जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति बनाकर इन जातियों के जीवनशैली में परिवर्तन करने का सतत् प्रयास किया जा रहा है, चाहे वह केवल वोट बैंक के लिये ही क्यो ना हो । किन्तु इन जातियों के बीच एक ऐसी वंचित उपेक्षित जाति बची रह गयी जिन्हें इनमें से किसी वर्ग में नहीं रखा गया है यदि किसी राज्य में रखा भी गया तो भी ये लोग उन सुविधाओं से वंचित ही हैं । ऐसे वंचित समाज को आज हम विमुक्त जाति कहते हैं । विमुक्त जाति आज भी समाज के मुख्यधारा से अछूती रह गयी हैं । ऐसा नही है कि किसी सरकार द्वारा विमुक्त जाति के लिये कुछ भी नहीं किया गया है, किया गया है किन्तु जो भी हुआ है वह-नगण्य है ।

विमुक्त जातियां उन कबिलों और समुदाय को कहा जाता है जिसे 1952 के पूर्व अपराधी प्रवृत्ति की जातियां कहा जाता था । अंग्रेजी शासन के समय 1871 के अधिनियम के अनुसार कुछ जातियों की सूची बनाई गई, जिसे अपराधशील जाति की संज्ञा दी गई, इन जातियों को अपराधी प्रवृत्ति का माना गया । देशा की आजादी पश्चात 31 अगस्त 1952 को इस सूची को असम्बद्ध सूची करते हुये इन्हे नई संज्ञा दी गई -विमुक्त जाति ।

इसी विमुक्त जाति में एक जाति है देवार । देवार भारत की एक घुमंतु जनजाति है। यह मुख्यतः छत्तीसगढ़ में पायी जाती है। ये प्रायः गाँवों के बाहर तालाब, नदी या नहर के किनारे अपने अस्थायी निवास बनाते हैं। देवार स्वयं को गोंड जनजाति की ही एक उपजाति मानते हैं। संभवतः देवी की पूजा करने के कारण ही इन्हें देवार कहा गया हो, ऐसा कई विद्वान भी मानते हैं। परन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि- दिया जलाने वाले से देवार शब्द की उत्पत्ति हुई हैं। कहा जाता है कि- ये लोग टोना-टोटका आदि के लिए दिया जलाते थे । पश्चिमी विद्वान स्टीफन कुक्स इन्हें भूमियां जनजाति से विकसित एक अलग जातीय समुदाय मानते हैं परन्तु ये स्वयं ऐसा नहीं मानते।

‘छत्तीसगढ़ की जनजातियां और जातियां‘ ग्रन्थ में डॉ संजय अलंग लिखते हैं -‘‘देवार जाति का मुख्य कार्य व्यवसाय भिक्षा मांगना है । ये लोग सुअर भी पालते हैं । इस जाति की महिलाएं हस्तशिल्प में गोदना गोदने में निपुण होती हैं । यह उनका व्यवसाय है । छत्तीसगढ़ के लोग उनसे गोदना गुदवातें हैं, जो यहां जनजातियों एवं जाति के स्थाई आभूषण या गहना माना जाता है । देवार लोग अत्यधिक गरीब हैं । यह लोग छत्तीसगढ़ के समस्त क्षेत्र में हैं । रायपुर संभाग में इनका संकेन्द्रण अधिक हैं । देवार लोग हिन्दू धर्म के वैष्णव को मानने वाले हैं । हिन्दू देवी-देवाताओं के पूजा करते हैं और हिन्दू त्यौहारों को मानते हैं ।’’
‘गुरतुगोठ’ के संपादक श्री संजीव तिवारी लिखते है कि- ‘‘वाचिक परम्परा में सदियों से दसमतकैना लाकेगाथा को छत्तीसगढ के घुमंतु देवार जाति के लोग पीढी दर पीढी गाते आ रहे हैं । वर्तमान में इस गाथा को अपनी मोहक प्रस्तुति के साथ जीवंत बनाए रखने का एकमात्र दायित्व का निर्वहन श्रीमति रेखा देवार कर रही हैं । छत्तीसगढ के इस गाथा का प्रसार अपने कथानक में किंचित बदलाव के साथ, भारत के अन्य क्षेत्रों में अलग अलग भाषाओं में भी हुआ है । गुजरात, राजस्थान एवं मेवाड में प्रचलित ’जस्मा ओडन’ की लोक गाथा इसी गाथा से प्रभावित है । राजस्थानी – ’मांझल रात’, गुजराती ’ ’सती जस्मा ओडन का वेश’ इसके प्रिंट प्रमाण हैं जबकि छत्तीसगढ में अलग अलग पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशित लेखों के अतिरिक्त प्रिट रूप में संपूर्ण गाथा का एकाकार नहीं नजर आता ।‘‘

देवार छत्तीसगढ़ के परम्परागत लोकगाथा गायक हैं। छत्तीसगढ़ के रायपुरिया देवार की विशेषता है कि ये लोकगाथाओं को सारंगी की संगत पर गाते हैं। रतनपुरिया देवार की विशेषता है कि ये लोकगाथाओं के ढुंगरू वाद्य के साथ गाते हैं। इनके पारंपरिक गाथा गीत हैं – चंदा रउताइन, दसमत, सीताराम नायक, नगेसर कैना, गोंडवानी और पंडवानी। अनेक देवार बंदर के खेल भी दिखाते हैं। देवार स्त्रियां परम्परागत रुप से गोदना का काम करती रही हैं।

यद्यपि देवार हस्तशिल्प गोदना, लोकगायन, लोकनृत्य में पारंगत होते हैं तथापि इनका जीवन स्तर अति निम्न है । कबाड़ी के कार्य से रोजी-मजूरी भी औसत है किन्तु अशिक्षा एवं मदिरा व्यसन इनके विकास मार्ग के मुख्य बाधक हैं । इन जातियों को राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार के उन समस्त योजनाओं का लाभ जैसे खद्यान योजना, शिक्षा स्वास्थ आदि का समान रूप से उपलब्ध हैं किन्तु ये लोग केवल राशन लेने में ही ज्यादा रूचि लेते हैं । शिक्षा और स्वास्थ संबंधी सुविधा में इनकी कोई विशेष रूचि परिलक्षित नहीं हो रही है; यही कारण है कि बच्चों के स्कूल दाखिला होने के पश्चात भी बच्चों को स्कूल नहीं भेजते यहां तक इस विषय में चर्चा करने पर भी उदासीन बने रहते हैं ।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़, विमुक्त जातियों का आधे से ज़्यादा हिस्सा ग़रीबी की रेखा से नीचे पाया गया है। इनकी प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे नीची रहती है।

दरअसल, शिक्षा ही दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है । इसके द्वारा ही व्यापक परिवर्तन संभव है । यदि देवार समुदाय को अपने हितों का संरक्षण करना है और अपनी अस्मिता बचानी है तो उनका शिक्षित होना अनिवार्य है । इसके लिये इनमें शिक्षा के प्रति जागृति लाने के लिये विशेष संपर्क बनाये रखने की आवश्यकता है । किन्तु आश्चर्य की बात है कि समाजसेवा के नाम पर मोटी-मोटी चंदा उगाही करने वाली संस्थाएं भी ऐसे तबको पर ध्यान नही दे पाते । व्यसन मुक्ति और शिक्षा के लिये इन जातियों में जागृति लाने के लिये सरकार के अतिरिक्त समाज सेवी संस्था को भी आगे आने की आवश्यकता है ।

मैंने जिस देवार बस्ती का निरिक्षण किया वहां मैंने पाया कि ये लोग जिस स्थिति में रह रहे हैं उस स्थिति के अभ्यासी हो गये हैं, इस स्थिति को आत्मसात कर बैठे हैं इस स्थिति से उबरने के लिये उनमें कोई ललक प्रत्यक्षतः परिलक्षित नहीं हो रहा है । हां, यह उत्कंठा जरूर दिख रही है कि कोई बाहर का व्यक्ति इन्हें सहयोग करता रहे, समस्याओं से निजात दिलाता रहे, किन्तु स्वयं दो कदम आगे बढ़ कर इस स्थिति से उबरने का प्रयास करते नहीं दिखता । सूक्ष्मविश्लेषण करते हुये मैंने पाया कि शायद एक लंबे समय से समाज की उपेक्षा, तिरस्कार झेलते हुये ये मान बैठे हैं कि हम मुख्यधारा से पृथ्क ही हैं और हमारा अस्तित्व पृथ्क रहने में ही है । लेकिन वास्तविक धरातल पर इस समाज के प्रति अस्पृश्यता में निश्चित रूप से कमी देखने को मिल रहा है ।

देवार जाति के उत्थान के लिये सबसे पहले इनके आवास पर ध्यान देना चाहिये । वर्तमान सरकार के महत्वाकांक्षी योजना ‘प्रधनमंत्री आवास योजना’’ के अंतर्गत इनके आवास बनने चाहिये । किन्तु इस आवास योजना का प्राथमिक शर्त स्वयं का आवासी भूमि होना, इनके लिये रोड़ा साबित हो रहा है । जीवन के प्राथमिक आवश्यकता ‘रोटी-कपड़ा-मकान’ के पूर्ति में इनके ‘रोटी-कपड़ा’ की पूर्ति ऐन-केन प्रकार से हो रहा है किन्तु मकान की पूर्ति होना नितान्त आवश्यक है ।

सभ्य समाज में जीवन की आवश्यकता रोटी, कपड़ा, मकान के अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा है । देवार समुदाय के लिये प्राथमिक आवश्यकता रोटी, कपड़ा, मकान के पूर्ति होने के ही पश्चात ही शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं सुरक्षा पर ध्यान दिया जा सकता है । इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का एक मात्र साधन शिक्षा है । यदि नौनिहालों को शिक्षा का साधन दे दिया जाये तो निश्चित रूप से आने वाले कुछ समय पश्चात आने वाली पीढ़ी समाज के मुख्यधरा के अभिन्न अंग होगें ।


-रमेशकुमार सिंह चौहान
‘मेलन निवास’, मिश्रापारा
नवागढ़, जिला-बेमेतरा
छत्तीसगढ़, पिन- 491337
मोबाइल-9977069545,
8839024871

नारी का बहू रूप (कुण्‍डलियॉं)

नारी का बहू रूप

नारी का बहू रूप
नारी का बहू रूप

महिला से परिवार

नर के सारे काम में, दक्ष हुई अब नार ।
नारी के हर काम को, करने नर तैयार ।।
करने नर तैयार, काम में अंतर कैसे ।
गढ़ना घर परिवार, पुरुष ना नारी जैसे ।
सुन लो कहे ‘रमेश’, सभी नारी घर के ।
महिला से परिवार, नहीं हो सकता नर के ।।

बहू रूप में सार

नारी नाना रूप में, बहू रूप में सार ।
मां तो बस संतान की, पत्नी का पति प्यार ।
पत्नी का पति प्यार, मात्र पति को घर जाने ।
बेटी पन का भाव, मायका बस को माने ।।
सास-ससुर परिवार, बहू करती रखवारी ।
बहू मूल आधार, समझ लो हर नर नारी ।।

-रमेश चौहान

जनता जनार्दन !

जनता जनार्दन ! (चोका)

-रमेश चौहान

जनता जनार्दन
जनता जनार्दन

वाह करते
वाह करते है लोग
नेताओं पर
जब कटाक्ष होवे
व्यवस्थाओं की
कलाई खोली जाए
वही जनता
बंद कर लेते हैं
आँख, कान व मुॅंह
अपनी गलती में
क्या ऐ जनता
व्यवस्था का अंग है?
लोकतंत्र में
नेताओं का जनक?
खुद सुधरेंगे
व्यवस्था सुधरेगी
खुद से प्रश्न
पूछिए भला आप
भ्रष्टाचार लौ
धधकाया नहीं है
आहुति डाल
नियम खूंटी टांग
काम नहीं किए हो
सेंध लगाए
सरकारी योजना
नहीं डकारे
सकरी गली
किसके कारण हैं
नदी-नालों का
डगर कौन रोके
कुॅंआ-बावली
घासभूमि तालब
कहां लुप्त है
जंगल और खेत
किसके घर
लाख उपाय ढूँढ़े
टैक्स बचाने
कमर कस कर
तैयार कौन?
व्यवस्था को हराने
अकेले नेता?
केवल कर्मचारी??
जनता जनार्दन !

-रमेश चौहान

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव
हिन्‍दी बोल-चाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव

अंग्रेजीभाषी भारतीय अंग्रेजी बोलें तो इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं किन्‍तु हिन्‍दी भाषीय भारतीय यदि बातचीत हिन्‍दी में ही कर रहे होते हैं किन्‍तु उनके हिन्‍दी को सुनकर अंग्रेजी बोलने का आभास होने लगे तो यह हिन्‍दी बोलचाल में अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव ही है । आज कल हिन्‍दी संभाषण में अंग्रेजी का पुट इतना अधिक होता है कि हिन्‍दी का हड्डी-पसली टूटा जा रहा है । तकनीकी शब्‍दों जिनके लिए हिन्‍दी शब्‍द नहीं है अथवा क्लिष्‍ट है उसके विकल्‍प के रूप में अंग्रेजी शब्‍दों का प्रयोग किया जाना ही चाहिए किन्‍तु हिन्‍दी के छोटे-छोटे और सरल शब्‍दों को भी अंग्रेजी शब्‍दों से प्रतिस्‍थापित किया जाना सही नहीं है । समान्य बोल चाल में जो हिन्दी बोली जा रही है उसमें 20 प्रतिशत शब्द अंग्रेजी के प्रयोग होने लगे हैं ।

परिवर्तन इतना हो कि उनकी आत्‍मा जीवित रह सके-

परिवर्तन सृष्टि का नियम है समय में परिवर्तन होता ही है  किन्‍तु मोटे तौर पर देखा जाए तो प्रकृति का मूल स्‍वरूप वहीं बना रहता है वही दिन, वही रात, वही सूरज, वही चांद । प्रकृति का परिवर्तन भी मूल स्‍वरूप से छेड़खानी नहीं करता किन्‍तु मनुष्‍य अपने बोल-चाल अपने चाल-चलन में ऐसा परिवर्तन करने लगता है कि उसके मूल स्‍वरूप में ही परिवर्तन का खतरा मंडराने लगता है । हमारे बोलचाल की भाषा में लचिलापन तो होना चाहिए किन्‍तु इस बात का भी ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि इस लचिलेपन से परिवर्तन इतना हो कि उनकी आत्‍मा जीवित रह सके ।

हिन्‍दी भाषा का बिगड़ता स्‍वरूप-

हिन्‍दी की अपनी लिपि अपने शब्‍द है किन्‍तु विडम्‍बना देखिए आज के बोलचाल की हिन्‍दी और सोशल मीडिया की हिन्‍दी के लिपि न तो देवनागरी रहे है न ही शब्‍द हिन्‍दी के । देवनागरी लिपि को रोमन लिपि से प्रतिस्‍थापित करने और हिन्‍दी बोलचाल में अधिक से अधिक अंग्रेजी शब्‍दों के प्रयोग करने का एक अघोषित प्रतिस्‍पर्धा चल पड़ा है । इसके दु:परिणाम का एक उदाहरण देखिए आज के बच्‍चे हिन्‍दी देवनागरी लिपि के गिनती भी नहीं पहचानते क्‍योंकि हिन्‍दी में हिन्‍दी अंको के स्‍थान पर अंग्रेजी अंको ने ले लिया है । कुछ प्रकार यदि लिपि बदलने का यह उपक्रम अनवरत जारी रहा तो हमारे देवनागरी लिपि पर गहरा संकट आ जाएगा ।

हिन्‍दी में कुछ विदेशी भाषाओं को स्‍वीकार किया जाना तो स्‍वभाविक है, किया भी जाना चाहिए, किया भी गया और किया भी जा रहा है जैसे अंग्रेजी स्‍वयं करती है किन्‍तु अंग्रेजी समर्थक ध्‍यान दे अंग्रेजी दूसरे भाषा को अपने ही लिपि में स्‍वीकार करती है । अंग्रेजी लिखने के लिए किसी दूसरे लिपि का प्रयोग नहीं करते जैसे हिन्‍दी में देखा जा रहा हिन्‍दी को देवनागरी में न लिख कर रोमन में लिखने की परम्‍परा विकसित हो रही है । ग्लोबल के नाम पर जो उदारीकरण का दौर चल रहा है इसका सबसे अधिक प्रभाव भाषा संस्कृति पर दिखाई दे रहा है ।

चैटिंग के नाम पर हिन्‍दी को विकृत करना-

सोशल मीडिया का प्रचलन जब से बढ़ा है हिन्‍दी की दुर्गति हो रही है । नए जमाने के बच्‍चे हिन्‍दी से दो प्रकार से खिलवाड़ कर रहे हैं एक तो ऐसे लोग हिन्‍दी को देवनागरी लिपि में लिखने के स्‍थान पर रोमन लिपि में लिख रहे हैं ।  ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि हिन्‍दी की अपनी एक लिपि है जिसे देवनागरी लिपि कहते हैं । यह भी पता होना चाहिए कि लोग घूमने-फिरने बाहर जा सकते हैं, बड़े-बड़े होटलों में रह सकते हैं किन्‍तु लौटकर उसे अपने ही घर आना होगा अपना घर अपना होता है, यही बात भाषा पर भी लागू है आप अपना बिस्‍तर दूसरों के खाट में कब तक लगाते रहेंगे । हां यदि सोशल मीडिया के उपकरण पर हिन्‍दी देवनागरी लिपि का विकल्‍प नहीं होता तो यह एक बार स्‍वीकार भी था किन्‍तु वहां हिन्‍दी देवनागरी कीबोर्ड का विकल्‍प उपलब्‍ध है, फिर भी उसका प्रयोग नहीं करना किसी भी स्थिति में स्‍वीकार्य नहीं है ।

दूसरा यह कि कुछ लोग हमें हिन्‍दी देवनागरी लिपि लिखा तो दिखा रहे होते हैं किन्‍तु मूलत: वह एल्‍फाबेटिक की बोर्ड के सहारे से रोमन में लिख कर देवनागरी दिखा रहे होते हैं । यह दोनों ही स्थिति अच्‍छी नहीं है । आप हिन्‍दी में सोच रहे होते हैं, हिन्‍दी में बात कर रहे होते तो आखिर ऐसी क्‍या विवशता है कि आप हिन्‍दी में नहीं लिख पा रहे हैं । कुछ बच्‍चे तर्क देते हैं हिन्‍दी कीबोर्ड में लिखना कठीन होता है ऐसे बच्‍चों से प्रश्‍न है कि स्‍कूल की पढ़ाई भी कठीन होती तो क्‍या आप इस डर से पढ़ाई छोड़ देते हैं, आपके माता-पिता भी आपकी भलाई के लिए कभी-कभी आप से कठोरता से प्रस्‍तुत होते हैं, तो क्‍या आप उन्‍हें छोड़ देते हैं । युवा शक्ति संघर्षो से जूझ कर नए रास्‍ते निकालने के लिए जाने जाते हैं और आप  इस छोटी से कठिनाई से पार नहीं पा रहें हैं ।

हिन्‍दी का खाने वाले ही हिन्‍दी की उपेक्षा कर रहे हैं-

यह विडम्‍बना नहीं तो और क्‍या है जिनका पेट हिन्दी के नाम पर ही भरता है चाहे वह वालीहुड हो या हिन्दी समाचार चैनल यूट्यूब चैनल हो या फिर हिन्‍दी ब्‍लॉग हिन्दी में अंग्रेजी को घुसाने में अपनी शान समझने लगे हैं । जिन नायक-नायिका को हिन्दी फिल्मों के नाम शोहरत हासिल मिली हैं वे ही जब भी साक्षात्कार देते है या किसी टीवी कार्यक्रम में आते हैं तो 50 प्रतिशत से अधिक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं । हिन्दी समाचार चैनल तो हिन्दी के कुछ प्रचलित और साधारण शब्दों को लुप्त करने में लगे है जैसे बचाव के लिए rescue, सम के लिए even, विषम के लिए odd , भगदड़ के लिए panic आदि । ऐसे सैंकड़ों हिन्दी शब्दों के स्थान पर अंग्रेजी शब्द प्रतिस्थापित कर है । ऐसे में आने वाली पीढ़ी इन हिन्दी शब्दों को भूल जाएंगी । ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि हिन्दी फिल्मों, हिन्दी यूट्यूब चैनल या समाचार चैनल की पटकथा, संवाद और गाने भी या तो रोमन लिपि हिन्दी में लिखे जा रहे हैं या शुद्ध अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं । यह हिन्‍दी की उपेक्षा नहीं तो और क्‍या है?

प्रश्‍न अंग्रेजी विरोध का नहीं अपितु हिन्‍दी के अस्तित्‍व का है-

प्रश्‍न अंग्रेजी के विरोध का नहीं है अंग्रेजी भाषा के काम लिए अंग्रेजी का प्रयोग किया जाना चाहिए किन्‍तु हिन्दी के स्वरूप को बिगाड़ने के लिए अत्यधिक मात्रा में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कहां तक उचित है । यह बहुत विरोधाभाष लग रहा है एक ओर जहां  इंटरनेट में हिन्दी प्रयोग करने वालों की संख्या में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है चाहे वह हिन्दी ब्लाॅग हो चाहे हिन्दी यूट्यूब चैनल हिन्दी का ही बोल-बाला दिख रहा है किन्तु उसमें प्रयुक्त हिन्दी को देख कर रोना आता है । हिन्दी को हिन्दी स्वरूप में लिखने-पढ़ने-बोलने में या तो दिक्कत आ रही है या लोग शर्म महसूस कर रहे है।

अनावश्‍यक अंग्रेजी प्रयोग को शान समझना दुखद स्थिति है-

दूर के ढोल सुहाने होते हैं, चमक के प्रति आकर्षण होता है इस आभासी चमक के कारण जब कोई छत्तीसगढ़िया छत्तीसगढ़ी बोले तो उसे गंवार शब्द से विभूषित किया जाता है, जब कोई हिन्दी भाषी 85-90 प्रतिशत भी शुद्ध हिन्दी बोले तो उसे पुराने विचारधरा का आदमी कह कर उसकी उपेक्षा की जाती है । यह स्थिति तो हिन्दी बोलचाल की है । यदि हिन्दी लेखन में ध्यान दें  इसकी स्थिति और अधिक दयनीय है । इंटरनेट और मोबाइल के इस युग में ज्‍़यादतर लोग हिन्दी को हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखने के बजाय रोमन लिपि के माध्यम से हिन्दी लिख रहे है । आश्‍यर्च है इस शर्मसार स्थिति को भी लोग अपनी शान समझते हैं । यही कारण है लोग अनावश्‍यक अंग्रेजी शब्‍दों का प्रयोग करने को ही अपना शान समझने लग गए हैं ।

भाषा की रक्षा के लिए अपनत्व की आवश्यकता है-

बात केवल हिन्दी में अंग्रेजी की घुसपैठ बस की नहीं है हिन्दी में उर्दू के शब्द भी घालमेल किए हुए है । हिन्‍दी शब्‍दकोश में अन्य भाषाओं के जो शब्द स्वीकार किए गए वे तो स्वीकार्य है किन्तु अनावश्यक रूप से अंग्रेजी या उर्दू शब्‍दों को हिन्दी में प्रयोग करना दासता का प्रतीक दिखता है, अपनी भाषा के प्रति स्नेह का न होना दर्शाता है । किसी को अपना मान लिया जाए तो अपनों के दोष नहीं दिखते । आप हिन्‍दी को अपना मान कर तो देखिए सारी कठिनाई धीरे-धीरे ही सही लेकिन अपने आप ही दूर हो जाएंगी । प्रश्‍न केवल इतना ही कि आप हिन्‍दी को हृदय से स्‍वीकार कीजिए बस ।

नेताओं से बड़ा कौन ?

नेताओं से बड़ा कौन ? (कुण्‍डलियां)

नेताओं से बड़ा कौन ? (कुण्‍डलियां)
नेताओं से बड़ा कौन ? (कुण्‍डलियां)

नेता से तो हैं बड़े, उनके चम्मच भक्त ।
साथ न हो यदि ये सभी, नेता रहे अशक्त ।।
नेता रहे अशक्त, बिना पानी ज्यों मछली ।
नेता अगर मशीन, भक्त चम्मच है बिजली ।।
सुन लो कह रमेश, भ्रष्ट भी अगर चहेता ।
सोचे दोषी कौन, भक्त चम्मच या नेता ।।

गाली नेता को दिए, देकर नाहक दोष ।
नेता खुद पैदा किए, और बजाए घोष ।।
और बजाए घोष, गलत हैं नेता सारे ।
अपने अंदर झाक, एक ना दोष तुम्हारेे ।।
सुन लो कहे रमेश, बाग के हो तुम माली ।
गंदी डाली छांट, दो ना नाहक गाली ।।

नेता मुकुर समाज का, लख लो निज प्रतिरूप ।
नेता जने समाज ही, नहीं गर्भ से भूप ।।
नहीं गर्भ से भूप, काम सब हमसे सिखते ।
कारण कौन विशेष, भिन्न वह हमसे दिखते ।।
सुन लो कहे रमेश, आप ही आप जनेता ।।
सोचे सकल समाज, बने कैसे शुभ नेता ।।
(जनेता-जन्म देने वाला)

जल संकट का कारण और निदान जल स्रोत ही है

जल संकट का कारण और निदान जल स्रोत ही है
जल संकट का कारण और निदान जल स्रोत ही है Photo by Ben Mack on Pexels.com

जल संकट का कारण और निदान जल स्रोत ही है । आवश्‍यकता के अनुरूप जलस्रोत  का न होना, जल स्रोतों में अतिक्रमण, जलस्रोतों को गंदा करके नष्‍ट करना, बांधों की कमी से वर्षा जल संरक्षित करने में कठिनाई आ रही है, इसी से जल संकट है । इसका निदान भी केवल और केवल जलस्रोत पर ही निर्भर है ।

आज का यक्ष प्रश्न है कि गांव-गांव, शहर-शहर में ‘जल संकट से कैसे निपटा जाये‘ ?  जहॉं देखो पानी के लिये मारा-मारी चल रहा है । लोग कुछ गुण्‍डी पानी लेने के लिये  आपस में गुत्‍थम-गुत्‍थी कर रहे हैं । स्थिति इतनी भयावह कि ऐसा पहिली बार हो रहा है कि पानी के लिये पहरा  लगाया जा रहा है । जल वितरण पुलिस के पहरेदारी में हो रहा है  । इस स्थिति को देखकर हर कोई यही कहता है- पानी का उपयोग कम करो यार, पानी की बचत करो ।  

 कोई  समस्या तत्कालिक पैदा नहीं होता न  ही उसका तत्कालिक निदान होता । तत्कालिक की गई  उपाय केवल समस्या को  कम कर सकता है । उसका समूल निदान नहीं कर सकता ।  उसके समूल विनाश के लिये उसके कारण को जान कर, उस कारण को दूर करने का दीर्घकालिक योजना पर काम करना होता है । समस्‍या है तो उसका निदान भी अवश्‍य होगा । हमें उसी उपाय पर काम करने की जरूरत है ।

सभी जीव जन्तु और  वनस्पती का जीवनयापन पानी के बिना सम्भव नहीं है ।इसलिये प्रकृति  ने भूमि में अथाह जल दिया  है। भूमि में पानी की मात्रा लगभग 75 प्रतिशत है । मात्रा के आधार पर भूमि में  पानी करीब 160 करोड़ घन कि0मी0 उपलब्ध है। लगभग 97.5 प्रतिशत पानी नमकीन है। केवल 2.5 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है  उसमें इसी पानी का एक बहुत बड़ा भाग बर्फीली क्षेत्र में बर्फ के रूप में होने के कारण सिर्फ 0.26 प्रतिशत पानी ही नदियाें, झीलों, में  मनुष्‍य के उपयोग हेतु उपलब्ध है। 0.26 प्रतिशत जल को यदि मात्रा में देखा जाये तो दुनिया की आबादी करीब 700 करोड़ के आधार पर प्रति व्यक्ति 6,00,000 घन मी0 पानी उपलब्ध है। पानी की इतनी मात्रा एक आदमी के नहाने-धोने, पीने-खाने  के लिये पर्याप्‍त है यहां तक पानी बच भी जाये। फिर यह जल संकट क्‍यों ?

पानी की उपलब्धता दो प्रकार से होती है  एक भूमि के ऊपर भूतलीय जल के रूप में और  दूसरा भूमि के भीतर भू-गर्भी जल के रूप में । यदि इस उपलब्धता में कमी आये अथवा उलब्ध जल उपयोग के लिये उपयुक्‍त न हो तो जल संकट होगा ही होगा । पानी के संग्रहण और संरक्षण में  कमी होने पर जल संकट होगा ही ।  प्राकृतिक जल प्रकृति के जीव जंतु के जीवन के लिये पर्याप्त है ।  पानी की कमी का अनुभव तब हो रहा है  जब इसका उपयोग औद्योगिक रूप में और  कृषि  में आवश्यकता से अधिक होने लग गया है ।

व्‍यवसाय में जिस प्रकार आय-व्यय के लेखा-जोखा किया जाता है ठीक उसी प्रकार उलब्धता और उपयोग को समझने की आवश्‍यकता है । जल की उपलब्धता भूतलीय और भूगर्भी हे । भूमि के ऊपर पानी संरक्षित रहने से भूगर्भी जल स्तर संरक्षित होता है । भूतलीय जल  का स्रोत नदी, नाले तालाब, पोखर, कुँआ आदि है । इन प्राकृतिक एवं कृत्रिम स्रोतों में ही वर्षा के जल को संरक्षित किया जाता है। बच्‍चे-बच्‍चे जानते हैं कि  वर्षा के पानी यदि रोको न जाये तो वह बह कर सागर में  समा जाता है जो हमरे  लिये किसी प्रकार से उपयोगी नहीं होता  । 

आजकल मनुष्‍य दैनिक जीवन यापन के लिये  भूतलीय जल से अधिक भूगर्भी जल पर निर्भर होने लगे हैं ।  घर-घर  में बोरवेल्‍स है, और पानी पम्‍प की सहायता से भू-गर्भी  जल का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं  । वैज्ञानिक  बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि भूभर्गी जल  स्तर लगातार गिर रहा है । इस  बेतहासा जल दोहन से जल की उपलब्‍धता में कमी  आ रही है ।  बस्‍ती के गंदे जल और कारखानों के अपशिष्‍ट जल, जल स्रोतों में जाकर मिल रहे हैं, जिससे उपयोगी जल की मात्रा में कमी आ रही है । पानी का उपयोग जीव जंतु के जीवनयापन के साथ अब औद्योगिक रूप में  और उन्नत कृषि में हो रहा है । एक अनुमान के अनुसार उद्योग और कृषि में  70 प्रतिशत भू-गर्भ के जल का दोहन होने लगा है । केवल अनुभव करके देखिये एक एकड़ कृषि के लिये जितने जल का उपयोग किया जाता है, उस जल से एक गॉंव की प्‍यास बूझाई जा सकती है ।

जल स्तर गिरता क्‍यों है, यदि इसके कारणों पर विचार करते हैं तो हम पाते हैं इसका मुख्‍य कारण  भूसतही जल और भूगर्भी  जल  में अनुपातिक अंतर आना है, इसमें असंतुलन उत्‍पन्‍न होना है ।  भूगर्भी जल  का स्‍तर भू सतही जल पर निर्भर करता है और भूसतही जल  का स्‍तर जल के प्राकृतिक और कृत्रिम स्रोताों पर । जल स्रोत नदी-नाले, जलाशय, पोखर, बांध, तालाब आदि हैं, जो वर्षा के जल को संरक्षित करते है  ।  इस संरक्षण से भूसतही जल संतुलित रहता है और इसके संतुलन से भू-गर्भी जल संतुलित होता है । यह एक चक्रिय प्रक्रम है ।  इस प्रक्रम का मुख्‍य घटक जल स्रोत ही है । इसलिये जल स्रोत का संरक्षण आवश्‍यक है ।

अपने चारो ओर देखिये तो भला  जल स्रोतो  की क्‍या स्थिति है ?  एक तो  जल स्रोत की स्थिति बुरी है और दूसरी ओर पर्यावरणीय असंतुलन के कारण औसत वर्षा में कमी दर्ज की जा रही है। यही जल की कमी का मुख्‍या कारण ।

इस जल संकट का मूख्‍य कारण जल स्रोतों का संरक्षण न होना और आवश्‍कता से अधिक भूगर्भी जल का अधिक दोहन करना है ।  इसी कारण जल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है । यदि हमको इस जल संकट से उबरना है तो इन जल स्रोतो को बचना ही होगा और साथ ही साथ नये जल स्रोत विकसित करने होंगे । भूगर्भी जल पर निर्भरता को कम करके भूसतही जल पर निर्भरता को बढ़ाना होगा ।

 इंसान  नदियों, नालो,तालाबों, बांधों में अतिक्रमण करके कोई खेती कर रहा है तो कोई वहां मकान बना कर बैठ गया है । सोचिये इस अतिक्रमण से कितने जल स्रोत नष्‍ट हो रहे हैं ?  जिन जल स्रोतों पर अतिक्रमण नहीं है वहां अधिकांश में मनुष्‍य  उसमें कचड़े फेक-फेंक कर कचड़ाखना बना दिये हैं ।   औद्योगिक कचड़े का निपटारा भी इन्‍ही जलस्रोतो पर किया जा रहा है । इस समस्या के मूल में इंसानों का बेपरवाह और लालची होना है ।  जब सभी के सभी किसी न किसी रूप में इन जल स्रोतों को नष्‍ट करने पर तुले हुये हैं तो अच्‍छे परिणाम की आशा किस से किया जाये ?

‘पानी बचाओ‘ के नारों को हम गलत ढंग से समझ और समझा रहे हैं । ‘ पानी बचाओं’ नारा से प्रभावित होकर यदि हम सचमुच कुछ लीटर पानी बचा रहे हों किन्‍तु  हजारों-लाखों क्‍यूबिक मीटर जल के जल स्रोत को नष्‍ट कर रहे हो तो क्‍या समचमु हम पानी बचा रहे हैं ?  क्‍या इस तरह जल संरक्षण संभव है ? क्‍या आप जानते हैं बड़े-बड़े शहरों को पीने का पानी किसी न किसी नदी से ही कराया जाता है । यदि नदियों पर अंधाधुंध अतिक्रमण किया जाये तो नदियों का अस्तित्‍व शेष रहेगा ? तालाबों का जल जो पेय भी होता था कम से कम गैरपेयजल के रूप में उपयोग में तो लाया जा सकता है ? उन तालाबों पर बस्‍ती बसते जा रहे हैं । कुँओं का तो अस्तित्‍व पहले से समाप्‍त हो चुँका है । नहर-बांध की संख्‍या सीमित है । ऐसे में आप ही सोचिये आपके कुछ लीटर पानी बचाने से पानी बचेगा कि जल स्रोत बचाने से पानी बचेगा । इस लिये ‘पानी बचाओं’ के नारा को परिवर्तित करके ‘जलस्रोत बचाओ’ कर देना चाहिये ।

जल संरक्षण तभी संभव है जब जल स्रोतों का संरक्षण किया जाये । वैज्ञानिक रूप से वर्षा के जल को संरक्षित करने पर जोर दे रहे हैं प्रश्‍न तो यही है यह वर्षा का  जल कहां संरक्षित हो । इसके लिये या तो हमें पुराने जल स्रोतों को संरक्षित करना होगा और इसके साथ ही नये जल स्रोता का विकास भी करना होगा । इसलिये आवश्‍यक है कि जल स्रोतों को अतिक्रमण मुक्‍त करके साफ किया जाये  और उपयोग के लायक बनाया जाये । हमारे पूर्वज इस बात से परिचित थे कि जल स्रोतो का संरक्षण आवश्‍यक है इसलिये जल स्रोतों के विकास के लिये तालाब, कुँआ और बांध बनवाने को आस्‍था से जोड़कर रखें थे । जल स्रोत बनवाने से पुण्‍य की प्राप्ति होती है, इस आस्‍था से लोग नये जल स्रोत बनवाते थे पुराने जल स्रोता का संरक्षण भी करते थे, इससे जल स्रोत अक्षुण बना रहता था  किन्‍तु  आस्था में गिरावट आने के कारण हम लोग नये जल स्रोत बनवाने की बात सोचना तो दूर, बचे हुये जल स्रोतों को ही नष्‍ट कर रहे हैं । 

बिना पेड़ लगाये फल प्राप्‍त नहीं किया जा सकता यह जानते हुये भी हम बिना जल संरक्षण के जिम्‍मेदारी लिये केवल भूगर्भी जल का दोहन किये जा रहे हैं।  इस समस्या का निदान वैज्ञानिक तरीकों के साथ-साथ नैतिकता की भी आवश्‍यकता है । जल संकट से उबरने के प्रयासों में जब तक जनभागीदारी नही होगी पूर्ण सफलता संदिग्‍ध ही रहेगा ।  यदि हर इंसान अपनी नैतिक जिम्मेदारी को मान ले तभी प्रकृति इंसानों को साथ दे सकती है । आम तौर पर हम मान लेते हैं यह सब कार्य सरकार का है, इससे हमें क्‍या ? यह सोच जब तक बना रहेगा तब तक यह समस्‍या बनी रहेगी । यदि इस संकट का निदान करना हे तो हर आदमी को अपने सामर्थ्‍य के अनुसार सहयोग देना ही होगा । इस बात को समझ कर जल स्रोतों अतिक्रमण मुक्‍त करें, जल स्रोतों को गंदा करने से बचें । उपलब्‍ध जल स्रोतों का संरक्षण करें और नये जल स्रोतों विकास के बारे में सोचें इसी सी जल संकट का स्‍थायी निदान संभव है ।

-रमेश चौहान

कोराना पर कुण्‍डलियॉं

कोराना पर कुण्‍डलियॉं

-रमेश चौहान

कोराना पर कुण्‍डलियॉं
कोराना पर कुण्‍डलियॉं

(1)

घृणा रोग से कीजिये, रोगी से तो नाहिं ।
रोगी को संबल मिलत, रोग देह से जाहिं ।
रोग देह से जाहिं, हौसला जरा बढ़ायें ।
देकर हिम्‍मत धैर्य, आत्‍म विश्‍वास जगायें ।।
सुन लो कहे रमेश, जोड़ भावना लोग से ।
दें रोगी को साथ, घृण हो भले रोग से ।।

(2)

तन से दूरी राखिये, मन से दूरी नाहिं ।
मन से दूरी होय जब, मन से प्रीत नसाहिं ।
मन से प्रीत नसाहिं, अगर कुछ ना बाेलो गे ।
करे न तुम से बात, तुमहिं सोचो क्‍या तौलो गे ।
सुन लो कहे ‘रमेश’, चाहिए साथी मन से ।
किया करें जी फोन, भले दूरी हो तन से ।।

(3)

कोरोना का है कहर , कंपित कुंठित लोग ।
सामाजिकता दांव पर, ऐसे व्यापे रोग ।
ऐसे व्यापे रोग, लोग कैदी निज घर में ।
मन में पले तनाव, आज हर नारी नर में ।।
सुन लो कहे रमेश, चार दिन का यह रोना ।
धरो धीर विश्वास, नष्ट होगा कोरोना ।

-रमेश चौहान

रामचरितमानस के 108 महत्वतपूर्ण दोहे

रामचरितमानस-

रामचरितमानस विश्व की प्रसिद्ध कृति है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी की जीवनी होने के साथ-साथ एक मानवतावादी पुरुष का कर्म प्रधान चित्रण है। रामचरितमानस बाबा तुलसीदास की अमर कृति है जिसे केवल ना केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है। रामचरितमानस के पूर्व भगवान राम की कथा संस्कृत भाषा में वाल्मीकि कृत रामायण ग्रंथ में कही गई है। रामचरितमानस रामायण की तुलना में कहीं अधिक प्रचलित हुआ इसके पीछे विद्वानों का मत है कि यह सहज सुबोध सरल और लोक भाषा प्रधान है। मैं मानता हूं कि यदि यह केवल भाषा की सहायता से हैं ग्राह्य होता तो विश्व की अनेक भाषाओं में इनका अनुवाद नहीं किए जाते न हीं इस पर असंख्य शोध पत्र लिखे जाते । मैं मानता हूं की श्रीरामचरितमानस भाषा के साथ साथ कथ्य की प्रस्तुतीकरण के कारण जनमानस में प्रचलित हुआ है। इस ग्रंथ के नायक को परमपिता परमात्मा के रूप में स्वीकार करते हुए भी एक कर्म वादी यथार्थवादी और मानवतावादी के रूप में प्रस्तुत किया जाना ही इस ग्रंथ की विशेषता है। श्री रामचंद्र जी का चरित्र विश्व के किसी भी व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है । एक पुत्र के रूप में, एक भाई के रूप में, एक मित्र के रूप में, एक पति के रूप में और यहां तक एक शत्रु के रूप में भी श्री राम एक आदर्श एवं मर्यादा के अनुकूल हैं। श्री रामचंद्र जी के चरित्र में कहीं भी अतिशयोक्ति रूप से चित्रण नहीं मिलता। श्री रामचंद्र जी के सारे चरित्र एक मानवीय देह के द्वारा किया जा सकता है । इसलिये श्रीराम का चरित्र अनुकरणीय है ।

गोस्वामी तुलसीदास-

श्री रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास आज ना केवल भारत के अपितु विश्व के जनमानस में रचे बसे हैं। तुलसीदास जी के संबंध में उनकी पत्नी रत्नावली के बारे में कहा जाता है कि एक बार जब तुलसीदास जी पत्नी वीरह से व्याकुल हुए तू रत्नावली उन्हें डांटते हुए ईश्वर के प्रति प्रेम करने को कहा इसके बाद तुलसीदास विरक्त होकर राम भक्ति में तल्लीन हो गए और हनुमान जी की आशीर्वाद से कई ग्रंथों की रचना की इन सभी ग्रंथों को जनमानस ने ना केवल स्वीकार किया अपितु इन ग्रंथों की पूजा भी की जो अनवरत आज भी जारी है चाहे वह हनुमान चालीसा हो चाहे हनुमान बाहुक हो चाहे वह रामाज्ञा हो चाहे वह रामचरितमानस हो सभी ग्रंथ अत्यंत पावन एवं मानव जीवन को सार्थक करने वाले हैं।

राम चरित मानस के 108 महत्‍वपूर्ण दोहे-

ऐसे तो संपूर्ण रामचरित मानस पठनीय एवं अनुकरणीय है । इस कर्म-ज्ञान सम्रद्र से कुछ बूँदे मोती के रूप में प्रस्‍तुत करने का प्रयास है-

राम चरित मानस के 108  महत्‍वपूर्ण दोहे
राम चरित मानस के 108 महत्‍वपूर्ण दोहे

बालकाण्‍ड के के महत्‍वपूर्ण दोहे-

संत सरल चित्र जगत हित, जानी सुभाउ सनेहु ।

बाल बाल विनय सुनि करी कृपा, राम चरण रति देहु ।।1।।

भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइही नीचु ।

सुधा सराहिअ अमरता, गरल सराहिअ यही मीचु ।।2।।

जड़ चेतन जग जीव जत, सकल राममय जानि ।

बंधउॅ सबके पद कमल, सदा जोरि जुग पानि ।।4।।

भाग छोट अभिलाषु बड, करउॅ एक विश्वास ।

पैहहि सुख सुनी सुजन, सब खल करिहहिं उपहास ।।5।।

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरण, बंदी कहउॅ कर जोरि ।

होइ प्रसन्न पुरवहु सकल, मंजू मनोरथ मोरी ।।6।।

राम नाम मनिदीप धरूँ, जीह देहरी द्वार ।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौ चाहसि उजियार ।।7।।

ब्रह्म जो व्‍यापक बिरज अज, अकल अनीह अभेद ।

सो कि देह धरि होइ नर, जाहि न जानत बेद ।।8।।

प्रभु समरथ सर्बग्‍य सिव, सकल कला गुन धाम ।

जोग ग्‍यान बैराग्‍य निधि, प्रनत कलपतरू नाम ।।9।।

असुर मारि थापहिं सुरन्‍ह, राखहिं निज श्रुति सेतु ।

जग बिस्‍तारहिं बिसद जस, राम जन्‍म कर हेतु ।।10।।

जोग लगन ग्रह बार तिथि, सकल भए अनुकूल ।

चरू अरू अचर हर्षजुत, राम जनम सुखमूल ।।11।।

बिप्र धेनु सुर संत हित, लीन्‍ह मनुज अवतार ।

निज इच्‍छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार ।।12।।

ब्‍यापक अकल अनीह अज, निर्गुन नाम न रूप ।

भगत हेतु नाना बिध, करत चरित्र अनूप ।।13।।

गौतम नारि श्राप बस, उपल देह धरि धीर ।

चरन कमल रज चाहती, कृपा करहुँ रघुबीर ।।14।।

राम लखनु दोउ बंधुबर, रूप सील बल धाम ।

मख राखेउ सबु साखि जनु, जिते असुर संग्राम ।।15।।

लताभवन तें प्रगट भे, तेहि अवसर दोउ भाइ ।

निकसे जनु जुग बिमल बिधु, जलद पटल बिलगाइ ।।16।।

मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब ।

महामत्‍त गजराज कहुँ, बस कर अंकुस खर्ब ।।17।।

राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि ।

चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेषि ।।18।।

तहॉं राम रघुबंस मनि , सुनिअ महा महिपाल ।

भंजेउ चाप प्रयास बिनु, जिमि गज पंकज नाल ।।19 ।।

रामु सीय सोभा अवधि, सुकृत अवधि दोउ राज ।

जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस, मिलि नर नारि समाज ।।20।।

मुदित अवधपति सकल सुत, बधुन्‍ह समेत निहारि ।

जनु पाए महिपाल मनि, कियन्‍ह सहित फल चारि ।।21।।

सुर प्रसून बरषहिं हरषि, करहिं अपछरा गान ।

चले अवधपति अवधपुर, मुदित बजाइ निसान ।।23।।

एहि सुख ते संत कोटि गुन, पावहिं मातु अनंदु ।

भइन्‍ह सहित बिआहिं घर, आए रघुकुलचंदु ।।24।।

मंगल मोद उछाह नित, जाहिं दिवस एहि भॉंति ।

उमगी अवध अनंद भरि, अधिक अधिक अधिकाति ।।25।।

अयोध्‍याकाण्‍ड के के महत्‍वपूर्ण दोहे-

श्री गुरू चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि ।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु, दो दायकु फल चारि ।।26।।

सब के उस अभिलाषु अस, कहहिं मनाइ महेसु ।

आप अछत जुबराज पद, रामहिं देउ नरेसु ।।27।।

राम राज अभिषेकु सुनि, हियँ हरषे नर पारि ।

लगे सुमंगल सजन सब, बिधि अनुकूल बिचारि ।।28।।

नामु मंथरा मंदमति, चेरि कैकइ केरि ।

अजस पेटारी ताहि करि, गई गिरा मति फेरि ।।29।।

काने खोरे कूबरे, कुटिल कुचाली जानि ।

तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि, भरतमातु मुसुकानि ।।30।।

कवनें अवसर का भयउ, गयउॅा नारि बिस्‍वास ।

जोग सिद्धि फल समय जिमि, जतिहि अविद्या नास ।।31।।

होत प्रातु मुनिबेष धरि, जौं न रामु बन जाहिं ।

मोर मरनु राउर अजस, नृप समुझिअ मन माहिं ।।32।।

बरष चारिदस बिपिन बसि, करि पितु बचन प्रमान ।

आइ पाय पुनि देखिहउँ, मनु जनि करसि मलान ।।33।।

मातु पिता गुरू स्‍वामि सिख, सिर धरि करहिं सुभायँ ।

लहेउ लाभु तिन्‍ह जनम कर, नतरू जनमु जग जायँ ।।35।।

सपने होइ भिखारी नृप, रंकु नाकपति होइ ।

जागे लाभु न हानि कछु, तिमि प्रपंच जियँ जोइ ।।36।।

तब गनपति सिव सुमिरि, प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ ।

सखा अनुज सिय सहित बन, गवनु कीन्‍ह रघुनाथ ।।37।।

स्‍यामल गौर किसोर बर, सुंदर सुषुमा ऐन ।

सरद सर्बरीनाथ मुखु, सरद सरोरूह नैन ।।38।।

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि, मग लोगन्‍ह सुख देत ।

जाहिं चले देखत बिपिन, सिय सौमित्रि समेत ।।39।।

राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम ।

तनु परिहरि रघुबर बिरहँ, राउ गयउ सुरधाम ।।40।।

भरतहि बिसरेउ पितु मरन, सुनत राम बन गौनु ।

हेतु अपनपउ जानि जियँ, थकित रहे धरि मौनु ।।41।।

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।

हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ ।।42।।

अवसि चलिअ बन रामु जहँ, भरत मंत्रु भल कीन्‍ह ।

सोक सिंधु बूड़त सबहिं, तुम्‍ह अवलंबनु दीन्‍ह ।।43।।

अरथ न धरम न काम रूचि, गति न चहउँ निरबान ।

जनम जनम रति राम पद, यह बरदानु न आन ।।44।।

बरबस लिए उठाद उर, लाए कृपानिधान ।

भरत राम की मिलनि लखि, बिसरे सबहि अपान ।।45।।

सब के उर अंतर बसहु, जानहु भाउ कुभाउ ।

पुरजन जननी भरत हित, होइ सो कहिअ उपाउ ।।46।।

मुखिया मुखु सो चाहिए, खान पान कहुँ  एक ।

पालइ पोषइ सकल अँग, तुलसी सहित बिबेक ।।47।।

नित पूजत प्रभु पॉंवरी, प्रीति न हृदयँ समाति ।

मागि मागि आयसु करत, राज काज बहु भॉंति ।।48।।

अरण्‍यकाण्‍ड के के महत्‍वपूर्ण दोहे-

कलिमल समन दमन मन, राम सुजस सुखमूल ।

सादर सुनहिं जे तिन्‍ह पर, राम रहहिं अनुकूल ।।49।।

सीता अनुज समेत प्रभु, नील जलद तनु स्‍याम ।

मम हियँ बसहु निरंतर, सगुनरूप श्रीराम ।।50।।

र्इश्‍वर जीव भेद प्रभु, सकल कहौ समुझाइ ।

जातें होइ चरन रति, सोक मोह भ्रम जाइ ।।51।।

लछिमन अति लाघवँ सो, नाक कान बिनु किन्हि ।

ताके कर रावन कहँ, मनौं चुनौती दीन्हि ।।52।।

क्रोधवंत तब रावन, लीन्हिसि रथ बैठाइ ।

चला गगनपथ आतुर, भयँ रथ हॉंकि न जाइ ।।53।।

जेहि बिधि कपट कुरंग सँग, धाइ चले श्रीराम ।

सो छबि सीता राखि उर, रटति रहति हरिनाम ।।54।।

सीता हरन तात जनि, कहहु पिता सन जाह ।

लौं मैं राम त कुल सहित, कहिहि दसानन आइ ।।55।।

अबिरल भगति मागि बर, गीध गयउ हरिधाम ।

तेहि की क्रिया जथोचित, निज कर कीन्‍ही राम ।।56।।

लोभ के इच्‍छा दंभ बल, काम कें केवल नारि ।

क्रोध कें परूष बचन बल, मुनिबर कहहिं बिचारि ।।57।।

काम क्रोध लाभादि मद, प्रबल मोह कै धारि ।

तिन्‍हँ महँ अति दारून दुखद, मायारूपी नारि ।।58।।

किष्किन्‍धाकाण्‍ड के महत्‍वपूर्ण दोहे-

तब हनुमंत उभय दिसि, की सब कथ सुनाइ ।

पावक साखी देइ करि, जोरी प्रीति दृढ़ाइ ।।59।।

राम चरन दृढ़ प्रीति करि, बालि कीन्‍ह तनु त्‍याग ।

सुमन माल जिमि कंठ ते, गिरत न जानइ नाग ।।60।।

भूमि जीव संकुल रहे, गए सरद रितु पाइ ।

सदगुर मिलें जाहिं जिमि, संसय भ्रम समुदाइ ।।61।।

निज इच्‍छॉं प्रभु अवतरइ, सुर महि गो द्विज लागि ।

सगुन उपासक संग तहँ, रहहिं मोच्‍छ सब त्‍यागि ।।62।।

भव भेषज रघुनाथ जसु, सुनहिं जे नर अरु नारि ।

तिन्‍ह कर सकल मनोरथ, सिद्ध करहिं त्रिसिरारि ।।63।।

सुंदरकाण्‍ड के महत्‍वपूर्ण दोहे-

हनुमान तेहि परसा, कर पुनि कीन्‍ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्‍हें बिना, मोहि कहॉं विश्राम ।।64।।

तात स्‍वर्ग अपबर्ग सुख, धरिअ तुला एक अंग ।

तुल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सतसंग ।।65।।

रामायुध अंकित गृह, सोभा बरनि न जाह ।

नव तुलसिका बृंद तहँ, देखि हरष कपिराइ।।66।।

तब हनुमंत कही सब, राम कथा निज नाम ।

सुनत जुगल तन पुलक मन, मगन सुमिरि गुन ग्राम ।।67।।

कपि के बचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्‍वास ।

जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिंधु कर दास ।।68।।

निसिचर निकर पतंग सम, रघुपति बान कृसानु ।

जननी हृदयँ धीर धरू, जरे निसाचर जानु ।।69।।

कपिहि बिलोकि दसानन, बिहसा कहि दुर्बाद ।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि, उपजा हृदयँ बिषाद ।।70।।

नाम पाहरू दिवस निसि, ध्‍यान तुम्‍हार कपाट ।

लोचन निज पद जंत्रित, जाहिं प्रान केहिं बाट ।।71।।

सचिव बैद गुर तीनि जौं, प्रिय बोलहिं भय आस ।

राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास ।।72।।

काम क्रोध मद लोभ सब, नाथ नरक के पंथ ।

सब परिहरि रघुबीरहि, भजहु भजहिं जेहि संत ।।73।।

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ, प्रभु भंजन भव भीर ।

त्राहि त्राहि आरति हरन, सरन सुखद रघुबीर ।।74।।

काटेहिं पइ कदरी फरइ, कोटि जतन कोउ सींच ।

बिनय न मान खगेस सुनु, डाटेहिं पइ नव नीच ।।75।।

सकल सुमंगल दायकहिं,  रघुनायक गुन गान ।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव, सिंधु बिना जलजान ।।76।।

लंकाकाण्‍ड के महत्‍वपूर्ण दोहे-

लव निमेष परमानु जुग, बरष कलप सर चंड ।

भजसि न मन तेहि राम को, कालु जासु कोदंड ।।77।।

श्री रघुबीर प्रताप ते, सिंधु तरे पाषान ।

ते मतिमंद जे राम तजि, भहिं जाइ प्रभु आन ।।78।।

बिस्‍वरूप रघुबंस मनि, करहु बचन बिस्‍वासु ।

लोक कल्‍पना बेद कर, अंग अंग प्रति जासु ।।79।।

भूमि न छॉंडत कपि चरन, देखत रिपु मद भाग ।

कोटि बिघ्‍न ते संत कर, मन जिमि नीति न त्‍याग ।।80।।

नानायुध सर चाप धर, जातुधान बल बीर ।

को‍ट कँगूरन्हि चढि़ गए, कोटि कोटि रनधीर ।।81।।

गिरिजा जासु नाम जपि, मुनि काटहिं भव पास ।

सो कि बंध तर आवइ, ब्‍यापक बिस्‍व निवास ।।82।।

दुहु दिसि जय जयकार करि, निज निज जोरि जानि ।

भिरे बीर इत रामहिं, उत रावनहि बखानि ।।83।।

तानेउ चाप श्रवन लगि, छॉंड़े बिसिख कराल ।

राम मारगन गन चले, लहलहात जनु ब्‍याल ।।84।।

खैंचि सरासन श्रवन लगि, छाड़े सर एकतीस ।

रघुनायक सायक चले, मानहुँ काल फनीस ।।85।।

अनुज जानकी सहित प्रभु, कुसल कोसलाधीस ।

सोभा देखि हरषि मन, अस्‍तुति कर सुर ईस ।।86 ।।

समर बिजस रघुबीर के, चरित जे सुनहिं सुजान ।

बिजय बिबेक बिभूति नित, तिन्‍हहि देहिं भगवान ।।87।।

उत्‍तरकाण्‍ड के महत्‍वपूर्ण दोहे-

रहा एक दिन अवधि कर, अति आतुर पुर लोग ।

जहँ तहँ सोचहिं नारि नर, कृस तन राम बियोग ।।88।।

आवत देखि लोग सब, कृपासिंधु भगवान ।

नगर निकट प्रभु प्रेरेउ, उतरेउ भूमि बिमान ।।89।।

वह सोभा समाज सुख, कहत न बनइ खगेस ।

बरनहिं सारद सेष श्रुति, सो रस जान महेस ।।90।।

बार बार बर मागउँ, हरषि देहु श्रीरंग ।

पद सरोज अनपायनी, भगति सदा सतसंग ।।91।।

निज उर माल बसन मनि, बालितनय पहिराइ ।

बिदा कीन्हि भगवान तब, बहु प्रकार समुझाइ ।।92।।

राम राज नभगेस सुनु, सचाराचर जग माहिं ।

काल कर्म सुभाव गुन, कृत दुख काहुहि नाहिं ।।93।।

बिधु महि पूर मयूखन्हि, रबि तप जेतनेहि काज ।

मागे बारिद देहि जल, रामचंद्र के राज ।।94।।

ग्‍यान गिरा गोतीत अज, माया मन गुन पार ।

सोइ सच्चिदानंद घन, कर नर चरित उदार ।।95।।

पर द्रोही पर दार रत, पर धन पर अपबाद ।

ते नर पॉंवर पापमय, देह धरें मनुजाद ।।96।।

औरउ एक गुपुत मत, सबहि कहउँ कर जोरि ।

संकर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि ।।97।।

नाथ एक बर मागऊँ, राम कृपा करि देहु ।

जन्‍म जन्‍म प्रभु पद कमल, कबहुँ घटै जनि नेहु ।।98।।

बिरति ग्‍यान बिग्‍यान दृढ़, राम चरन अति नेह ।

बायस तन रघुपति भगति, मोहि परम संदेह ।।99।।

बिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग ।

मोह गऍं बिनु राम पद, होइ न दृढ़ अनुराग ।।100।।

श्रोता सुमति सुसील सुचि, कथा रसिक हरि दास ।

पाइ उमा अति गोप्‍यमति, सज्‍जन करहिं प्रकास ।।101।।

ब्‍यापि रहेउ संसार महुँ, माया कटक प्रचंड ।

सेनापति कामादि भट, दंभ कपट पाषंड ।।102।।

रामचंद्र के भजन बिनु, जो चहपद निर्बान ।

ग्‍यानवंत अपि सो नर, पसु बिनु पूँछ बिषान ।।103।।

बिनु बिस्‍वास भगति नहिं, तेहि बिनुद्रवहिं न रामु ।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह बिश्रामु ।।104।।

कलिजुग सम जुग आन नहिं, जौं नर कर बिस्‍वास ।

गाइ राम गुन गन बिमल, भव तर बिनहिं प्रयास ।।105।।

कहत कठिन समुझत कठिन, साधत कठिन बिबेक ।

होइ घुनाच्‍छर न्‍याय जौं, पुनि प्रत्‍यूह अनेक ।।106।।

बारि मथे घृत होइ बरू, सिकता ते बरू तेल ।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धांत अपेल ।।107।।

मो सम दीन न दीन हित, तुम्‍ह समान रघुबीर ।

अस बिचारी रघुबंस मनि, हरहु बिषम भव भीर ।।108।।

आई होली आई होली

आई होली आई होली 

(सार छंद गीत)

आई होली आई होली
आई होली आई होली
आई होली आई होली, मस्ती भर कर लाई । 
झूम झूम कर बच्चे सारे, करते हैं अगुवाई ।

बच्चे देखे दीदी भैया, कैसे रंग उड़ाये ।
रंग अबीर लिये हाथों में, मुख पर मलते जाये ।
देख देख कर नाच रहे हैं, बजा बजा कर ताली ।
रंगो इनको जमकर भैया, मुखड़ा रहे न खाली ।
इक दूजे को रंग रहें हैं, दिखा दिखा चतुराई ।
आई होली आई होली…….

गली गली में बच्चे सारे, ऊधम खूब मचाये ।
हाथों में पिचकारी लेकर, किलकारी बरसाये ।।
आज बुरा ना मानों कहकर, होली होली गाते ।
जो भी आते उनके आगे, रंगों से नहलाते ।।
रंग रंग के रंग गगन पर, देखो कैसे छाई ।
आई होली आई होली…….
कान्हा के पिचका से रंगे, दादाजी की धोती ।

दादी भी तो बच ना पाई, रंग मले जब पोती ।
रंग गई दादी की साड़ी, दादाजी जब खेले ।
दादी जी खिलखिला रही अब, सारे छोड़ झमेले ।
दादा दादी नाच रहे हैं, लेकर फिर तरूणाई ।
आई होली आई होली…….

-रमेश चौहान

आदि शङ्कराचार्य रचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद

आदि शंकराचार्य रचित चर्पट पंचारिका स्‍त्रोत

आदि शंकराचार्य रचित चर्पट पंचारिका स्‍त्रोत ‘भज गोविन्‍द भज गोविन्‍द मूढ़ मते’ एक सुप्रसिद्ध कृति है, जो मूल रूप में देवभाषा संस्‍कृत में है । इस स्‍त्रोत में आदि शंकराचार्य ने मानव जीवन को नश्‍वर बतलाते हुुुये ईश्‍वर शरण मेें जाने की प्ररेणा दियेे हैं । इसी स्‍त्रोत का लावणी छंंद में भावपूर्ण अनुवाद किया गया है ।

चर्पट पंजारिका (हिन्‍दी में)-

आदि शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिका स्तोत्र का छंदबद्ध काव्‍यानुवाद

चर्पट-लावणी

(चर्पट पंजारिका लावणी छंद में)

ध्रुव पद- 
हरि का सुमरन कर ले बंदे,  नश्‍वर है दुनियादारी ।
छोड़ रहें हैं आज जगत वह,  कल  निश्चित तेरी बारी ।।

दिवस निशा का क्रम है शाश्‍वत, ऋतुऐं भी आते जाते ।
समय खेलता खेल मनोहर, खेल समझ ना तुम  पाते।।
आयु तुम्‍हारी घटती जाती, खबर तनिक ना  तुम पाये ।
हरि सुमरन छोड़ जगत से, तुम नाहक मोह बढ़ाये ।।1।।

वृद्ध देह की हालत सोचो, जाड़ा से कैसे  बचते ।
कभी पीठ पर सूर्य चाहिये, कभी अनल ढेरी रचते ।।
घुटनों के बीच कभी सिर रख, मुश्किल से प्राण बचाते ।
दीन दशा में देह पड़ा है, फिर भी  मन आस जगाते ।।2।।

तरूण हुये थे जब से तुम तो, जग में धन-धान्‍य बनाये ।
पूछ-परख तब परिजन करते, भांति-भांति तुम्‍हें रिझाये ।।
हुआ देह अब जर्जर देखो,  कुशल क्षेम भी ना वे पूछे ।
इधर-उधर अब भटकता बूढ़ा, जीवन जीने को ही जूझे ।।3।।

कोई-कोई जटा बढ़ाये,  कोई सिर केश मुढ़ाये ।
गेरूवा बाना कोई साजे, कोई अँग  भस्‍म रंगाये ।।
फिर भी दुनिया छोड़ न पाये,  मन जीवन आस जगाये ।।
सत्‍व तत्‍व खुद समझ न पाये, दुनिया को वह भरमाये ।।4।।

भगवत गीता जो लोग पढ़े, जो गंगाजल पान किये ।
कृष्‍ण मुरारी कृष्‍ण मुरारी, कृष्‍ण भजन का गान किये ।।
उनके अंंतिम  बेला पर तो, कष्‍ट हरण यमराज किये ।
अंतकाल में देखा जाता, जीवन में क्‍या काज किये ।।5।।

अंग शिथिल हो कॉंप रहा है,  श्‍वेत केश झॉंक रहा है ।
दंत विहिन मुख कपोल पिचका, रोटी भी फॉंक रहा है ।
लाठी हाथों में डोल रहा , जीवन रहस्‍य खोल रहा ।
इतने पर भी  हाय बुढ़ापा, मोह जगत से बोल रहा  ।।6।।

बचपन को तुम खेल बिताये, मित्र किशोरापन खाये ।
देह आर्कषण के फेर परे, तरूणाई तरूण गँवाये ।।
फिर जाकर परिवार बसाये,  धन दौलत प्रचुर बनाये ।
पाले नाहक चिंता अब तो, बैठ बुढ़ा हरि बिसराये ।।7।।

जन्‍म मरण का  आर्वत फिर फिर, जन्‍म लिये फिर मृत्‍यु गहे ।
अचल नहीं यह मृत्यु हमारी, मृत्‍यु बाद फिर जन्‍म पहे ।।
फिर फिर जग में पैदा होना, फिर फिर जग से है मरना ।
टूटे अब यह दुस्‍तर आर्वत, देव, कृपा ऐसी करना ।।8।।

फिर-फिर आती रहती रजनी, दिन भी तो फिर-फिर आते ।
पखवाड़ा भी फिरते रहते, अयन वर्ष भी फिर जाते ।।
मानव मन की अभिलाषा है, जो मुड़कर कभी न देखे ।
देह जरा होवे तो होवे, पागल मन इसे न लेखे ।।9।।

धन बिन क्‍या नाते-रिश्‍ते, जल विहिन जलाशय जैसे ।
देह आयु जब साथ न होवे, काम-इच्‍छा से प्रित कैसे ।।
अरे बुढ़ापा कुछ चिंतन कर, क्‍या है अब पास तुम्‍हारे ।
हरि सुमरन विसार कर तुम, क्‍यों माया जगत निहारे ।।10।।

 रूपसी का रूप निहारे क्‍यों,  अहलादित होता मन है ।
वक्ष-नाभि में दृष्टि तुम्‍हारी, मांस-वसा का ही तन है ।।
तन आकर्षण मिथ्‍या माया, विचलित तुमको करते हैं ।
अरे बुढ़ापा अंतकाल में, यह माया क्‍यो पलते हैं ।।11।।

सारहीन यह स्‍वप्‍न लोक है, जगत मोह को तुम त्‍यागो ।
गहरी निद्रा पड़े हुये हो, ऑख खोल कर अब जागो ।।
मैं कौन कहॉं से आया हूँ,  मातु-पिता कौन हमारो ।
आत्‍म तत्‍व पर चिंतन करते, अब अपने आप विचारो।।12।।

भगवत गीता पढ़ा करो कुछ, बिष्‍णु नाम जपा करो कुछ ।
ईश्‍वर स्‍वरूप का ध्‍यान धरो,  पुण्‍य कर्म किया करो कुछ ।
संतो की संगति किया करो, दान-धर्म किया करो कुछ ।
दीन-हीन की मदद करो कुछ, इसके आगे बाकी तुछ ।।13।।

प्राण देह में  होता जबतक, पूछ-परख है रे तेरा ।
प्राण विहिन काया को फिर, कहे न कोई रे मेरा ।
दूजे की तो बातें छोड़ों, अंतरंग जीवन साथी ।
भूत मान कर डरती रहती, यही जगत की परिपाटी ।।14।।

शारीरिक सुख के पीछे ही, भागता फिरता जवानी ।
स्‍त्री मोह मेंं है दीवाना,  पुरूष मोह में दीवानी ।।
देह वही अब जर्जर रोगी, अंत मृत्‍यु को ही पाये ।
देख-भालकर  भी दुनिया को, ईश्‍वर शरण न वह जाये ।।15।।

डगर पड़े चिथड़े की झोली,  लेकर फिरता सन्‍यासी ।
पाप-पुण्‍य रहित डगर पर वह, कर्म विहिन रहे उदासी ।।
समझ लिया  जो इस दुनिया में, न मैं हूँ न तू  न ही जगत ।
फिर भी क्‍यों वह शोकग्रस्‍त हो, डरता फिरता एक फकत ।।16।।

चाहे गंगासागर जावे, चाहे व्रत उपवास करे ।
चाहे सारे तीरथ घूमे,चाहे कुछ बकवास करे ।।
ज्ञानविहिन मुक्ति न संभव, आत्‍म तत्‍व को तो जाने ।
कर्म भोग जीवन का गहना, ज्ञान कर्म  में तानो ।।17।।

-रमेश चौहान

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